गीत सूंधा माता रो – दल़पत बारठ

स्वंय पिडं ब्रहमंड भुज डंड ईकवु सस,
दयतां डंड प्रचण्ड दाता।
सकल़ विहमंड चंड कुण कर सकै,
मंड ज्यां मंडी चामण्ड माता।।
आठ सिध थापणी थाल़ आसाएवां,
आपणी माल नवनिध अनूंधा।
रिधव रूक दे मूंघा न व्है रायहर,
सकत सूंधा तणी राय सूंधा।।[…]

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ગરબો-ખોડિયાર રમવા ને આવે-કવિ આપા ભાઈ કાળા ભાઈ બાળદા

કોઇ તાતણીયા ધરાથી તેડાવો મારી બેનુરે….
ખોડીયાર રમવા આવે…
કોઈ માટેલ જઇને મનાવો મારી બેનુ રે..
ખોડીયાર રમવા આવે…ટેક

હા…આસોના ઉજળા આવ્યા છે નોરતા મનડે કોડ નથી માતો..
માં ના તેહવારનો મહિમા છે મોટો સૃષ્ટીમાં નથી સમાતો..
હવે સૃષ્ટીની શોભા વધારો મારી બેનુ રે..
ખોડીયાર રમાવા આવે…[…]

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इश-महिमा-सवैया – कवियत्रि भक्तिमति समान बाई

।।सवैया।।
शत्रुन के घर सेन करो समसान के बीच लगाय ले डेरो।
मत्त गयंदन छेह करो भल पन्नग के घर में कर गेरो।
सिंह हकारि के धीर धरो नृप सम्मुख बादि के न्याय नमेरो।
जानकीनाथ सहाय करे तब कौन बिगार करे नर तेरो।।१

खग्ग उनग्गन बीच कढौ गिरी झांप गिरौ किन कूप अँधेरो।
ज्वाल करालन मध्य परो चढती सरिता पग ठेलि के गेरो।
राम सिया उर में धरि के प्रहलाद की साखि ते चित्त सकेरो।
जानकीनाथ सहाय करे तब, कौन बिगार सके नर तेरो।।२[…]

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घनश्याम मिले तो बताओ हमें -कवियत्रि भक्तिमति समान बाई

ऐसे घनस्याम सुजान पीया, कछु तो हम चिन्ह बतावें तुम्हें।
सखि पूछ रही बन बेलन ते घनश्याम मिलै तो बताओ हमें।।टेर।।

मनि मानिक मोर के पंखन में, जुरे नील जराव मुकट्टन में।
जुग कुण्डल भानु की ज्योति हरै, उरझाय रही अलके उनमें।
उन भाल पे केसर खौरि लसे रवि रेख दीपै मनु प्रात समै।
सखि पूछ रही बन बेलन ते घनश्याम मिलै तो बताओ हमें।।१[…]

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सिंधु-सौरभ – डॉ. शक्तिदान कविया

।।दूहा।।

दीवै सूं थांनक दिपै, पुसप सुगंध प्रमाण।
मोती ज्यूं दरियाव मझ, सिंध में त्यूं सोढाण।।1।।

पाळ धरम रण पौढियौ, खळ दळ जूंझे ख़ास।
सिंध में दाहिरसेन रौ, अमर हुवौ इतिहास।।2।।

धरा सिंध अवतार धिन, लीनौ झूलेलाल ।
चावौ ‘चेटी चंड’ रौ, सुभ उच्छब हर साल।।3।।

सिंधी भगतां में सिरै, राजै टेऊराम।
प्रेम प्रकासी सत्पुरुष, निकस्यौ चहुं दिस नाम।।4।।

साहू जांमां जमर सज, दोखी कर दहवाट।
हड़वेची बेहूं हमें, धर पूजीजै धाट।।5।।[…]

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मालण माताजी रा त्रिभंगी छंद – कवि डा. शक्तिदान कविया

।।दोहा।।
देवी दूलाईह, सुरराई शगत्यां शिरै।
मालण मंहमाईह, वसै विराई विसहथ।।

।।छंद – त्रिभंगी।।
देवी दूलाई, अंबे आई, परचां छाई प्रभुताई।
पावक प्रजाळाई, उठर आई, पग अरुणाई, प्रगटाई।
बाळापण बाई अम्ब उपाई पुनि पलटाई नींब प्रथी।
मालण महामाई, सदा सहाई, है सुरराई विशहथी।
जिय है वरदाई विशहथी॥1॥
टीकम टणकाई सुजस सवाई पह परणाई तिण पुलही।
गायां घेराई सिंध सराई वाहर धाई बिलकुल ही।
कव जीत कराई हुतब हलाई जमदढ खाई गळै जथी।
मालण महमाई सदा सहाई है सुरराई वीसहथी।
जिय है वरदाई वीसहथी॥2॥[…]

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सूर्यमल्ल मीसण: व्यक्तित्व एवं कृतित्व

१८५७ की आजादी की क्रांति के समय के बूंदी के महाकवि सूर्यमल्ल मीसण के जयन्ती सप्ताह के उपलक्ष्य में दिनांक २३-२४ अक्टूबर को कोटा-राजस्थान में साहित्य अकादमी नई दिल्ली की और से दो दिवसीय संगोष्टी आयोजित की गयी। इसमें कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़, चितौड़गढ़, उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर सहित अन्य जिलों के ५० से अधिक वरिष्ठ साहित्यकार शामिल हुए।

उदघाटन सत्र में मुख्य अतिथि रहे पद्मश्री डा. चन्द्र प्रकाश देवल ने महाकवि के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय में प्रजातंत्र होते हुए भी सत्ता पक्ष के खिलाफ बोलने में कवियों, साहित्यकारों को पांच बार सोचना पड़ता है लेकिन सूर्यमल्ल मिश्रण ने रियासतकाल में भी छत्र राज करने वाले हाडा वंश के राजाओं के विरोध में लिखने में कोई कसर नहीं छोडी। उन्होंने ५३ वर्ष में वंश भास्कर[…]

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राजल माताजी चराडवा वाळी री स्तुति – कवि जीवणदानजी डोसाभाइ झीबा (धांगध्रा)

॥छंद नाराच॥
मंदोर मस्त जोरका भरेल दैत मारणी।
प्रचंड दुष्ट झुंड पै त्रिशूल की प्रहारणी।
जिन्नात भूत प्रेत को हराणहार जोपियं
अखंड जोत रुप आई राजबाई ओपियं॥1॥

पहेलवान म्लेच्छ मार वार रूधिरं पिये।
करोर ब्रहम राखसां विलोकतां डरे हिये।
दहीत दास के तमाम नाश सब्ब है कियं।
अखंड जोत रुप आई राजबाई ओपियं॥2॥[…]

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परिचय: राजकवि खेतदान दोलाजी मीसण – प्रेषित: आवड़दान ऊमदान मीसण

चारण समाज में ऐसे कई नामी अनामी कवि, साहित्यकार तथा विभिन्न कलाओं के पारंगत महापुरुष हुए हैं जो अपने अथक परिश्रम और लगन के कारण विधा के पारंगत हुए लेकिन विपरीत संजोगो से उनके साहित्य और कला का प्रसार न हो पाने के कारण उन्हें जनमानस में उनकी काबिलियत के अनुरूप स्थान नहीं मिल पाया। अगर उनकी काव्य कला को समाज में पहुचने का संयोग बेठता तो वे आज काफी लोकप्रिय होते।

उनमे से एक खेतदान दोलाजी मीसण एक धुरंधर काव्य सृजक एवं विद्वान हो गए है।[…]

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कविराज गणेशपुरीजी रो एक रोचक प्रसंग – ठा. नाहर सिंह जसोल

गणेशपुरीजी राेहड़िया पातावत शाखा रा चारण हा। गांव चारणावास। मारवाड़ मैं बळूंदा ठिकाना रा पोलपात। पैहलौ नाम गुलाबदान। पछै राम स्नेही वे गया। सूरजमलजी मीसण रा शिष्य। पछै नांम गोस्वामी गणेशपुरी राख्यो।

महाराणा सज्जनसिंहजी मेवाड़ विद्वान अर विद्वानों रा पारखू। वांरै दरबार में केतांन विद्वान, जिण में गणेश पुरी जी एक।

दयानंद, गणेश पुरी स्वामी, उभय सुजान,
लई संगत इनकी, भयौ सज्जन, सज्जन रांण।।
बख्तावर राव पुनी, ग्याता रस सिगार,
इनकी कविता माधुर्य, लई सकै को पार।।
मोडसिंह महियारियाै अरु आ सिया जवान,
इन आदिक मेवाड़ मनो, हुति कवियन की खान।।

राज दरबार लगा हुआ है। महाराणा सिंहासन पर बिराजमान है। कविसर अपने अपने आसन पर बिराजमान हैं। बहुत ही गंभीर समस्या के समाधान हेतु विचार हाे रहा है। समस्या है, महाभारत के पात्रों में श्रेष्ठ कौन ?[…]

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