त्रिकूटबंध गीत – वंश भास्कर

उम्मेद भूपति अंग में,
रसबीर संकुलि रंग मैं,
बरबीर बारह सै प्रबीरन चक्क लै चहुवान।
जयनैर सम्मुह जोर सों,
भिलि खग्ग झारीय भोर सों,
बर गुमर असिबर समर,
लगि झर कुनर छरतर हुनर
हत कर जबर खर सर गजर
जय धर अडर भर भिलि कचर-
घन कर अमरपुर मचि दवर
दरबर उदर भर मिलि मुखर
पलचर खचर चय अर खपर
खरभर पहर इक बजि टकर धरपर घोर इम घमसान।।1।।[…]

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महापुरूष देवाजी महियारिया

बुन्दी राज्य के देवा महियारिया एक कुशल राजनीतिज्ञ, वीर, धीर, व विद्यानुरागी पण्डित होने के कारण बुन्दी के राव शत्रुशाल हाडा के परम मित्र व सलाहकार सहयोगी थे। शत्रुसाल उनसे अत्यन्त प्रभावित थे तथा उनकी योग्यता को पुरस्कृत करना चाहते थे। परन्तु देवा महियारिया धन के नहीं सनातन धर्म के मित्र थे। फिर भी शत्रुसाल हाडा के विशेष निवेदन पर लाख पसाव लेना स्वीकार किया व तत्काल अपनी कीर्ति के रखवाले मोतीसर व रावळों को लाख पसाव बांट दिया।[…]

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करूणाष्टक – कृष्णदास छीपा

!!छन्द-ईन्द!!
मृग बंद को फंद मुकुन्द कट्यो दुख द्वन्द हट्यो विषयावन में
ग्रही ग्राह प्रचंड समंद विशाल गजेन्द्र की टेर सुनी छिन में
धर उपर घंट गयंद धरयो खग ईण्ड उद्धार कियो रन में
रघुनन्द गोविन्द आनन्द घणा कृष्णा चित धारि रहो ऊन में !!१!![…]

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माता चामुंडा का त्रिभंगी छंद

॥छंद त्रिभंगी॥
कर रुप कराळं, नहद नताळं, भगतां भाळं, विकराळं।
डं डाक डमाळं, कोप कमाळं, बाज बताळं, पडताळं।
खटके ललखाळं, जोम भुजाळं, त्रोडण ताळं तिण तुंण्डा।
खडगां धरखंडा, असुर उतंडा, भय भ्रेकुण्डा, चामुण्डा।
जिय चोटीला री चामुंडा जय सुंधा वाळी चामुण्डा॥ 1 ॥[…]

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काळ – कवि रेवतदान जी चारण “कल्पित”

आभै ऊपर भमै गिरजड़ा चिलां उड़ती जाय
पग पग ऊपर ल्हास मिनख री कुत्ता माटी खाय
लूट डकैती खून चोरियां लाय लगी तो झालौझाळ
भूख भचीडा फिरै खावती नाचै झूमै सौ सौ ताळ
सुगन चिड़ी सूरज नै पूछ्यो गिरजा नै पूछ्यो कंकाळ
धोरां नै पूछै रुखड़ला ल्हासां नै अगनी री झाळ
क्यूं मौत री मरजी माथै जीवण री पड़गी हड़ताळ
हिरणी बोली रया करै कंई रखवालां रौ पडग्यो काळ[…]

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सांस्कृतिक-झरोखा – डा. आई दान सिंह भाटी

मैं चानण खिड़िया बोर ग्राम मारवाड़ निवासी आपके सामने कुछ बातें रखना चाहता हूँ। यों तो इतिहास राजपूतों और चारणों के सम्बन्धों से भरा पड़ा है पर मैंने जो देखा और किया वैसा विरलों ने ही देखा होगा, किया होगा। मैं जिस बोर ग्राम में जन्मा, उसे छोड़कर मेरे पिता लुम्बटजी पाघड़ी ग्राम में आ बसे। यह ग्राम सूराचंद ठिकाने का था और सूराचन्द के ठाकुर मेरी कविताओं पर रीझ गये थे। मैं पिताजी के साथ यहीं रहने लगा। पर यह तो मेरी यात्रा का प्रारम्भ था।[…]

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🌺रयत रा रूखवाला🌺 – कवि भंवरदान मधुकर माड़व

।।छन्द त्रिभंगी।।
धन, धन हद शूरा, अडग अरूरा, भारत भूरा, बल पूरा।
हाकल कढ हूरा, जोध जरूरा, हिन्द हजूरा, जंग जूरा।
दुष्टी कर दूरा, गंज गरूरा, रखण सबूरा, रूढियाला।
रयत रखवाला, आव अंताला, भारत वाला, भुरजाला।
जिये राजस्थानी, रखवाला।।[…]

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स्तुति श्री सायर माँ की – कवि जयसिंह सिंढ़ायच

।।छंद–भुजंगम प्रयात।।
नमौ तूँ नमौ मंढ़ माला धिराणी।
रिधू सायरा माँ नमौ किन्नियाणी।।
तुं ही क्रनला रूप साक्षात आजै।
तुँ जागती जौत मालै बिराजे।।१।।
नमौ आद अन्नाद अम्बे भवानी।
नमौ विश्व वन्द्ये, नमौ रुद्रराणी।।
अजौनीश अम्बे नमौ विश्व रूपं।
निराकार आकार साकार श्रूपं।।२।।[…]

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आवड मां रो रेणकी छंद – कवि केसरजी खिडीया

॥छंद: रेणकी॥
गहकत तर बिम्मर दादर सुर सहकत,
सगत नजर भर अठ तसणी।
झळहऴ कुंडळ उज्जळ मिळ झूलर,
दूठ निजर दामण दमणी।
मिळिया दळ सबळ तैमडै माथै
शगत नवै लख हेक समै।
झबकत कर चूड झणणणणण झांझर
रामत डुँगरराय रमै॥ 1 ॥[…]

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माँ हिंगलाज का छंद – कवि अज्ञात

॥छंद: नाराच॥
भमंक अंज काळ भंज सिंघ संज सज्जियै।
झमंक झंझ ताळ खंज वीर डंज बज्जियै।
चौसठ्ठ मझ्झ रास रंझ स्याम मंझ सम्मियै।
गिरंद गाज बीण बाज हिंगळाज रम्मिये।
मां हिंगळाज रम्मिये जि हिंगळाज रम्मिये॥ 1॥[…]

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