नदी रुपाळी नखराळी – कवि दादूदान प्रतापदान मीसण

।।छंद – त्रिभंगी।।
डुंगर सूं दडती, घाट उतरती, पडती पडती, आखडती।
आवै उछळती, जरा नि डरती, हरती फिरती, मद झरती।
किलकारां करती, डगलां भरती, जाय गरजती जोराळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी, रुपाळी, नखराळी।।1।।

आंकडियां वाळी, वेल घटाळी, वेलडियाळी, वृखवाळी।
अवळां आंटाळी, जांमी झाळी, भेखडियाळी, भे वाळी।
तिणने दे ताळी, जातां भाळी, लाखणियाळी लटकाळी।
हिरण हलकाळी, जोबन वाळी, नदी, रुपाळी, नखराळी।।2।।[…]

» Read more

माँ श्री आवड़जी रा छन्द – कवि मेहाजी

।।छन्द-नाराच।।
अम्बा ईच्छा अलख की झलक दुख झाळणे।
मांमट देव के ऊभट प्रेह प्रगटी पाळणे।
सप्त बैन सुख चैन भैरू लेन भावड़ा।
भज्यां निशुंभ शुंभ भूप आप रूप आवड़ा !!१!!

तुंही भगत तारणी ऊबारणीलसुरां असी।
जणीह मात चारणी जगत में तेरे जसी।
सकत को संसार करत नाकड़ा नमावड़ा।
भज्यां निशुंभ शुंभ भूप आप रूप आवड़ा !!२!![…]

» Read more

मोगल माताजी रा नाराच छंद – कवि खेंगार जी कविराज पाटडी

॥छंद-नाराच॥
हिये उदार, मुक्त हार, हेमतार हिंडले।
लगी कतार वीर लार झुल सार झुमले।
वैताल ताल वीर हाक डाक घोर दीपणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥1
बल्लाळ, बुट, बेचरा, चांपल्ल डुँगरेचीयं।
अंबाय, आवडं, सांसाई, राजलं रवेचीयं।
हिंगोळ सातदीप हूंत भद्रकाळि भामणि
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥2[…]

» Read more

आवडजी महाराज रा नाराच छंद – मानदानजी कविया दीपपुरा, सीकर

॥छंद नाराच॥
बिमाण बैठ सात भाण आसमांण उत्तरी।
धिनो अछी छछी ज होल गैल लूंग लंगरी।
सुधाम धाम मांमडा जु धीव तूं कहावडा।
नमो ज मात बीस हाथ पात पाळ आवडा॥1॥

कलू असाधि की उपाधि व्याधि भोम पै छई।
सरूप हिंगळाज रो अनूप आवडा भई।
अखंड मंड तेमडै प्रचंड छत्र छाबडा।
नमो ज मात बीस हाथ पात पाळ आवडा॥2॥[…]

» Read more

देवां दातारां जूझारां-धुप दीप करते वक्त बोलने की स्तुति-हमीरदान जी रतनू

गीत – सपाखरो
देवां दातारां जूझारां चारां वेदां अवतारां दशां,
धरां हरां ग्यारां रवि बारां चारां धांम।।
सतियां जतियां सारां सुरां पुरां रिषेसरां,
पीरां पैगम्बरां सिद्ध साधकां प्रणाम।।१।।

नवां नाथां नवां ग्रहां नवसो नवाणुं नदी,
नखत्रां नवेही लाखां भाखां नवे निद्ध।।
पर्वतां आठ कुळां वसु आठ वंदां पाव,
साठ आठ तिरथां समेतां आठ सिद्ध।।२।।

» Read more

सिंझ्या वेळा री माताजी री स्तुति – कवि देवीदानजी खिडीया धामाय कच्छ

॥छंद: मोतीदाम॥
बजे वर मंदिर मैं डफ डाक।
हुवे तित धूपन की धमछाक।
झनंकत झांझ मृदंग बजंत।
घणारव मंदिर घंट बजंत॥1॥
गजे घन आरतीकी घनघोर।
बजै बहु जोरसौ नौबत शोर।
जुरै तित जोगिनी जुथ्थ हजार।
रचे वर मंडल रास अपार॥2॥[…]

» Read more

चाल़कनेची का प्रहास शाणोर गीत – मीठा मीर डभाल

सरव परथम समरण मात तो शारदा,
रदे बीच भरोसो अडग राखूं !!
जीभ पर बिराजो आप मां जोगणी,
भवां चाळराय रा गुण भाखूं !!1!!
आप अम्ह बुद्धि बगसावजो आवड़ा,
करनल्ला मात तो महर कीजो !!
आपरो नाम लिय कर रहयो आपदा,
दयाळी उकत सध आप दीजो !!2!![…]

» Read more

प्रथम वर्षगांठ – www.charans.org

CharansLogoDefault
नवरात्री स्थापना की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। आज का दिन एक और कारण से विशिष्ठ है क्योंकि गत वर्ष आज ही के दिन माँ भगवती की प्रेरणा से www.charans.org साईट का शुभारम्भ किया गया था। आज इसकी पहली वर्षगांठ है।
एक छोटा सा पौधा जो पिछले शारदीय नवरात्री स्थापना के दिन लगाया गया था, आज आप सभी के सहयोग एवं उत्साहवर्धन से निरंतर प्रगती कर रहा है। कुछ तथ्य प्रस्तुत हैं:

  • पिछले एक वर्ष में विश्व भर से इस साईट के अलग अलग पेज को ७३७८५ बार देखा गया|
  • […]
» Read more

त्रिकूटबंध गीत – वंश भास्कर

उम्मेद भूपति अंग में,
रसबीर संकुलि रंग मैं,
बरबीर बारह सै प्रबीरन चक्क लै चहुवान।
जयनैर सम्मुह जोर सों,
भिलि खग्ग झारीय भोर सों,
बर गुमर असिबर समर,
लगि झर कुनर छरतर हुनर
हत कर जबर खर सर गजर
जय धर अडर भर भिलि कचर-
घन कर अमरपुर मचि दवर
दरबर उदर भर मिलि मुखर
पलचर खचर चय अर खपर
खरभर पहर इक बजि टकर धरपर घोर इम घमसान।।1।।[…]

» Read more

महापुरूष देवाजी महियारिया

बुन्दी राज्य के देवा महियारिया एक कुशल राजनीतिज्ञ, वीर, धीर, व विद्यानुरागी पण्डित होने के कारण बुन्दी के राव शत्रुशाल हाडा के परम मित्र व सलाहकार सहयोगी थे। शत्रुसाल उनसे अत्यन्त प्रभावित थे तथा उनकी योग्यता को पुरस्कृत करना चाहते थे। परन्तु देवा महियारिया धन के नहीं सनातन धर्म के मित्र थे। फिर भी शत्रुसाल हाडा के विशेष निवेदन पर लाख पसाव लेना स्वीकार किया व तत्काल अपनी कीर्ति के रखवाले मोतीसर व रावळों को लाख पसाव बांट दिया।[…]

» Read more
1 40 41 42 43 44 56