गीत भेरू जी रो – जगमाल सिंह “ज्वाला”

।।गीत सावझड़ो।।

मिणधर हाजर होय मुछाळा।
पत राखण आवे प्रतपाळा।
चंडी संग सदा चिर ताळा।
गजब दौड़ जे गोरा काळा।1।

श्वान सवारी आसन ढाळो।
टेरु तमे विघन मोय टाळो।
रेवे मात रु सदा रुखा ळो।
भगत पुकारे सामो भाळो।2। […]

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आई खोडियार वंदना – जयसिंह सिंहढायच

।।दोहा।।

धरा माड धरती धिनो,धिन धिन चाळक ग्राम।
धिन मादा काछैल कुळ,धिन पितु मामड धाम॥1॥
सातूं बहिनां संग मैं,शोभित बीच विवाण।
पितू मामड घर प्रगटिया,काछैला कुळ भांण॥2॥
सवंत आठसै आठ सुभ,चैत नवम शनिवार।
माड धरा मामड घरां,आप लियो अवतार॥3॥ […]

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कुरजां बिरहण यूं कहै

कुंझडियां परदेसियां,आवै अर उड जाय।
साच नेह सफरी तणो,जळ भेळी सूखाय॥1

पावस मास विदेस पिव,जळूं विरह री झाळ।
थूं कुरजां बरसात में,भींजै सरवर पाळ॥2

कुरजां थारी पांख पर,आखर लिखूं अथाह।
बालम नें बंचाय दे,बिरहण मन री आह॥3 […]

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बिरवडी जी रा छंद – कवि कानदासजी

॥छंद सारसी (हरिगीत)॥
दांतां बतीसां सौत जाई, लिया दांत सु लोहरा।
अचरज्ज दरशण हुऔ अंबा, मिट्या वादळ मोहरा।
पख दोय पूरी शगत सूरी,पिता हुकम पर वडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 1 ॥

नव लाख घोडे चढै नवघण, सूमरां घर सल्लडै।
सर सात खळभळ, शेष सळवळ, चार चकधर चल्लडै।
इण रुप चढियो सिंध धरपर इळा रज अंबर अडी।
नित वळां अन वळ दियण नरही, वळां पूरण वरवडी॥ 2 ॥ […]

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मननें तुझको पा लिया

🌺मननें तुझको पा लिया🌺

जब तू धावा बोलती, पलकों की जागीर।
तब तब मैंने थामली, हाथ-कलम-शमसीर॥1

जब तू मुझ पर पीर का, डाले सखी अबीर।
तब मन बनता राधिका,-कान्हा ,रांझा -हीर॥2

जब तू मुझपर नेह की,करे सखी बौछार।
तब उर गोमुख से बही,कल-कल कविता-धार॥3 […]

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करणीदान कविया-गीत

(करणीदान जी कविया एक बार शाहपुरा आये तब उम्मेदसिंह अपने पिता की मृत्यु के उपरांत राजा बन चुके थे। कवि को सम्मानित करने हेतु उन्होंने घोडा-सिरोपाव कवि के ठिकाने पर भिजवाया। कवि तब तक बहुत ख्याति प्राप्त कर चुके थे, उन्होने घोडा -सिरोपाव को अपने अनुरूप उपयुक्त न समझ कर ससम्मान लौटाते हुए निम्नलिखित गीत लिख भेजा..)

डाकर अत डकर करे मत डारण, सीसोदा पग मांड सधिर ।
चाल पकड लेउँ तो चारण, वारण तो वोढा नरवीर ॥ […]

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सरस कल्पना रा सखी

लाखौ बिणजारौ कवी, बाळद भर भर याद।
नवी पुरांणी जोडतो, उकति भाव उस्ताद॥1

यादों वाळी जान जद, आवै आंगण द्वार।
उण दिन कविता धारसी, अलंकार रो भार॥2

यादों री जद जद चले, दो धारी तलवार।
वा हीचकी लेती रहै, अठै दरद अणपार॥3 […]

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नैण

नैणा री मद धार वै, तौ प्याला बेकार।
नशौ प्रेम रो सब सिरै, सजण परूसण-हार।।1

नैणा री मनुहार नें, सैण करौ स्वीकार।
जैण नसो होसी जबर, रैण तणै अंधार।।2

नैणा घी री धार कर, पिया! लापसी-प्यार।
राज परोसूं आप कज, जिमौ  बारंबार।।3[…]

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।।शिवाष्टक।। – कवि जगमाल सिंह “ज्वाला” सुरतांणिया कृत

।।छंद।।
नहचे अधनंगा शिखर उतंगा आसन चंगा अवतारी।
पीयत घण पंगा गिरजा गंगा भूत भडंगा भयहारी।
लगताय लफंगा जट सिर जंगा प्रेत पिचंगा रूप बणे।
घण गंग झकोळा हरदम खोळा भोळा भोळा नाम भणे।1। […]

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माताजी के रास रमण का वर्णन – कवि जगमाल सिंह “ज्वाला” सुरतांणिया कृत

धिन एकम आज भवानिय चौसठ,मात धरा मनरंग मळी।
अति आनंद आज भरयो रतनाकर,नेन अमी वरसात वळी।
सब शोभयमान हुवे सिंह ऊपर,आभ उडड्गण भोम भमे।
सिणगार सजे नवलाख सुशोभित,रात उजाळिय रास रमे।1। […]

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