।।शिवाष्टक।। – कवि जगमाल सिंह “ज्वाला” सुरतांणिया कृत
।।छंद।।
नहचे अधनंगा शिखर उतंगा आसन चंगा अवतारी।
पीयत घण पंगा गिरजा गंगा भूत भडंगा भयहारी।
लगताय लफंगा जट सिर जंगा प्रेत पिचंगा रूप बणे।
घण गंग झकोळा हरदम खोळा भोळा भोळा नाम भणे।1। […]
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।।छंद।।
नहचे अधनंगा शिखर उतंगा आसन चंगा अवतारी।
पीयत घण पंगा गिरजा गंगा भूत भडंगा भयहारी।
लगताय लफंगा जट सिर जंगा प्रेत पिचंगा रूप बणे।
घण गंग झकोळा हरदम खोळा भोळा भोळा नाम भणे।1। […]
धिन एकम आज भवानिय चौसठ,मात धरा मनरंग मळी।
अति आनंद आज भरयो रतनाकर,नेन अमी वरसात वळी।
सब शोभयमान हुवे सिंह ऊपर,आभ उडड्गण भोम भमे।
सिणगार सजे नवलाख सुशोभित,रात उजाळिय रास रमे।1। […]
गीत जांगड़ो
शुभ्र वस्त्र वीण साज शुशोभित,बाई हंस बिराजे।
झनहण वीण ज तार झणंकत,राजीव उपर राजे।1।
वेद विरंचि खरेखर विमला,पुष्प शब्द प्रकाशे।
जाय बिराजे रसना जां के,उर जन होय उजासे।2।
धवल गात अरु सो पट धवला’धवल दंत मुख धारे।
धवल हंस शोभे धणियाणी,सेवक सोय सुधारे।3। […]
संग सात सहेलिय आवड भेळिय गीगल गेलिय रास रमै।
नित रोज नवेलिय सांझ सवेलिय भेऴिय खेतरपाळ भमै।
करती घण केलिय आप अकेलिय शेर चढेलिय तुं शगति।
किरपा कर चाळक मात कृपाळक बाळक तोय करे बिनति॥1॥ […]
वाणी वरदानी वदां, आखर दानी आइ।
भाव उपानी भव्यतम, गिरा भवानी माइ॥1
वीण वजंती सरसती, आगै जेण मराल।
धवला सन धवलांबरा, गळ में स्फाटिक माळ॥2
फटिक मालिका फूटरी, फबती जिणरै तन्न।
वीण पांणि हंसासनी,म्हारी बसौ रसन्न॥3 […]
कागा पग लागां थनै, मागां इतरो मीत।
घर री जागा बैठ मत, उड कर विरहण हीत॥1
कागा पुरसूं आप कज, खांड मलाई खीर।
खाय’र उडजा आवसी, तदै नणद रो बीर॥2
कागा थुं करकस घणौ, कडवा थारा बेण।
विरहण तौ पण राखती, नत्त नजीकां नेण ,॥3 […]
प्रण पर बगसण प्राण, तृण सम नित ततपर रियो।
आजीवन आराण, परचंड किया प्रताप सी॥1
धरम सनातन धार, असह निपट संकट सह्या।
अकबर रो अधिकार, पर न मन्यो प्रतापसी॥2
हलदी घाट हरोळ, मेद पाट भिडीयो मरद।
तुरकों पर खग तौल, पग रोपै परतापसी॥3 […]
आखर रो उमराव,अवस कवि सुण आशिया।
समपै लाख पसाव, अवस कवि सुण आशिया।
दाखत दोहा छंद, गज़ल गीत कहतौ गज़ब।
भरने उरमें भाव, अवस कवि सुण आशिया॥
गीत दोहरा छंद, ह्रदय भाव बेकार है ,
गैला रो औ गांव,अवस कवि सुण आसिया॥ […]
आती उतालीह, ताळी सुण तीजी श्रवण ।
करणी करुणाळीह, बिरुदाळी सोचो बिरद॥1
बेगी चढ बबरीह, जबरी आई न जोगणी।
जबरी जेज करीह, कफरी वेळा करनला॥2
गरब अधम गरणीह,हरणी अनहद अर अर्यां।
हे उजळ बरणीह,कर करुणा अब करनला॥3 […]
बरसी काळी बादळी, हरसी धरा अनंत।
दरसी हरियल ओढणे, सुंदर सी गुणवंत॥
सुंदरसी गुणवंत, गोरडी सज धज बैठी।
आभा जेण अनंत, सरस नरपत मन पैठी।
हरियल भाखर तणी, कंचुकि धारण करसी।
धरती आभा पीव, काज जद बादळ बरसी॥