बारहमासा गीत – विरह शृंगार
॥सावन॥
सावन बरसे! सब जन हरसे, झिरमिर बरसे मेह!
बैठे तुम परदेस में प्रियतम, निठुर छोड़ के नेह!!
बूँदों की पाजेब पहनकर, ओढ़ चुनरिया धानी!
करे नवोढ़ा धरती इस रुत, बादल से मनमानी!!
राह तकूँ मैं बैठ अकेली, सूनी सरोवर पाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥भादो॥
भादो में घन है मँडराया, बरसे मूशलधार!
भीगी धरती, भीगा अंबर, भीग रहा संसार!!
नद-नाले, पोखर, सर छलके, भरे है ताल तलैया!
कृष्ण-जन्म का पर्व है आया, पुरजन देत बधैया!!
सब सखियाँ मिल अमुवा झूले, गावै गीत धमाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥आश्विन॥
अश्विन आया! सब को भाया, उत्सव और उमंग!
शरद पूर्णिमा, धवल चाँदनी, गरबा-रास-मृदंग!!
फूली वेली, करते केली, प्रियजन आनंद छाया!
बिरहन झुरै बिन साजन के, नैन नीर भर आया!!
मन की मछली तड़प रही है, फँस विरहा के जाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥कार्तिक॥
कार्तिक मास सुहावन पावन, दीप जले घर द्वार!
आलोकित है दुनिया सबकी, मेरे उर अंधियार!!
कुछ न सुहाए तुम बिन हाए, अस्त हुए सब तारे!
हुए नयन रतनारे, जागत, अँसुवन भरे पनारे!!
अपलक तेरी राह निहारूँ, दीप नैन के बाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥अगहन॥
पवन चले अगहन में सननन, थर-थर ठिठुरे देह!
हरी दूब पर ओस लसे यूँ, ज्यूँ नव पल्लव मेह!!
शीतल रैना, पड़े न चैना, पवन चले पुरवाई!
सब अपने-अपने प्रियजन संग, मेरे भाग जुदाई!!
पड़ा विरह का पाला, जल कर, सूखी तन-मन डाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥पौष॥
पौष मास की लंबी रैना, तिस पर तुम न साथ!
दुभर सा दिन, कटे न पल-छिन, कड़-कड़ हाड़ कंपात!!
उत्कंठा उर जगी मिलन की, हुई साँझ सिंदूरी!
इस रुत भी क्या तुझै चाकरी, करनी बहुत जरूरी?
रूखी-सूखी खा जी लेंगे, रोटी-सब्जी-दाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥माघ॥
सुबह जाग कर पीपल पूजूँ, करूँ माघ ऋतु स्नान!
सत्वर फल शायद मिल जाए, फिरे मेरे दिनमान!!
दर्शन प्यासी, मथुरा-काशी, नित उठ मंदिर जाऊँ!
तेरी एक झलक मिल जाए, तो अनहद सुख पाऊँ!!
बन जोगन बिरहा-बन बन डोलूँ, छाप तिलक कर भाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीवन हुआ मुहाल!!
॥फागुन॥
चंग मृदंग डफ ढोलक बाजै, चहुँदिस बिखरै रंग!
इस फागुन में तुम्हैं न सूझी, मस्ती या हुड़दंग!!
खेलत होली, हँसी ठिठोली, सखियाँ करती सारी!
मुझ बिरहन पर आरी बन कर, चलती है पिचकारी!!
इन गालों पर कौन मले अब, तुम बिन लाल गुलाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥चैत्र॥
किंशुक फूलै, अमुवा झूले, करे कोकिला गान!
चैत मास की मधुर जुन्हाई, आ! कर ले रस पान?
वासंती परिधान पहनकर, बौराई बनराई!
किसलय पर भँवरें मँडराए, छाई मधुर जुन्हाई!!
विधना ने क्यों विरह लिखा है, केवल मेरे भाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥वैशाख॥
तप्त धरातल तप्त गगन है, अगन झरै वैशाख!
दरसन के बिन दुखन लागी, अब तो मेरी आँख!!
ताल कूप वापी सर सूखे, प्यासा है मन मेरा!
द्रुम दल पर सब पात झड गए, कहाँ करै खग डेरा!!
रीत रहा जीवन का घट अब, आ भर जा तत्काल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!
॥ज्येष्ठ॥
विरहानल से धधक रहा तन, धधक रहा संसार!
भरी ज्येष्ठ की दोपहरी में, झुलसे तरुवर डार!!
तप्त स्वर्ण-सी लगे धरा यह, आग झरै अंबर से!
दिनकर के इस प्रखर ताप से, कोई न निकले घर से!!
जीवन घन के बिन मुरझाया, मन का पिया! मृणाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥आषाढ़॥
उमड़-घुमड़ घिर आए बदरा, उमड़े मेघ अषाढ़!
नदिया-नाले लगे उफनने, आई जल की बाढ!!
चातक, मोर, पपीहा बोले, दादुर भी टर्राए!
छत पर बोला काग सजन पर, झूठै!तुम न आए!!
दिन बीते, दुर्दिन न बीते, बीता सारा साल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
॥अधिक मास॥
दिन गिनते महीने हुए पूरे, खत्म हुआ है साल!
अधिक मास में और बिगड़ता, जाता मेरा हाल!!
किसे सुनाऊँ विरह-व्यथाएँ, अब आकर सुधि लीजै!
मुझ बिरहन पर प्रेम-सुधारस, बरसाकर सुख दीजै!!
छबि दरसाओ, मत तरसाओ, आकर करो निहाल!
घर आजा परदेसी! तुम बिन, जीना हुआ मुहाल!!
©डा नरपत आशिया”वैतालिक”
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