कहाँ गया वो बूढा बरगद


बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव!

इमली, कीकर, अमुवा, महुआ, गुलर, नीम, खजूर!
जिसकी छैयाँ हम खेले नित, कोसों घर से दूर!
कोकिल पंचम सुर में गाती, ले कर मीठी तान!
आम कुतरता तोता बैठा, उल्लू धरता ध्यान!
पंछी के कलरव से मेरा, हुआ है अब अलगाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।1

हरे-भरे खलिहान-खेत की, मखमल-सी वो धूल!
रहट, बैल की रुनझुन घंटी, नदिया, सँकरा पूल!
जहाँ नहाए नंगे-धड़ंगे, थे वो पोखर-कूल!
जंगल की वह पगडंडी पथ, जहाँ गया था भूल!
पत्तों की मर्मर ध्वनि सुनकर, फूल उठे थे पाँव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।2

धरती ओढ चुनरिया धानी, करती थी शृंगार!
और मेघ मिलने आता था, ले बिजली का हार!
रिम झिम रिम झिम झिर मिर झिर मिर, प्रीति की बौछार!
नई नवेली दुलहिन धरती, मेघ बना भरतार!
आज न वह वर्षा का आलम, खाली पडै तलाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।3

कहाँ गई वो मीठी लोरी, वो दादी का गान!
जिस की धुन सुन मैं सोता था, पलने में नादान!
“सोजा नन्हे मुन्ने कान्हा, ओ लल्ला शैतान!”
थपकी दे कर मुझे सुलाती, रखती मेरा ध्यान!
दृश्य उभर आया है मन में, ठिठक रुके हैं पाँव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।4

फूल-धूल के थे लेकिन, थे दादा जी की जान,
निज कंधों पर हमें उठा वो, चलते सीना तान।।
कंचे, चोर सिपाही, लट्टू, पतंग, छुक छुक रेल!
गुल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, खत्म हुए सब खेल,
कहाँ गया बारिश का पानी, वो कागज की नाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।5

वो खट-मीठी नीम्बू गोली, वो कैथा का स्वाद!
आज भी मेरी जिह्वा पर है, देता है आह्लाद!
वो इमली का खट्टा बूटा, वो मुठ्ठी भर धान!
ले जा घर से हम झोली भर, बदले में फल आन!
खाते और खिलाते थे मिल, मन में नित कर चाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।6

जाड़ों में सब ओढ़े कंबल, बैठे रह चौपाल!
अंगीठी की आँच तापते, जब थे नन्हे बाल!
किस्से, गीत, कहानी सुनकर, रहते थे खुशहाल!
नैनन में कब निंदिया आई, रहा न उसका ख्याल!
स्मृतियोँ में बस राख शेष है, कैसे जले अलाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढ़ा बरगद, वो पीपल की छाँव।।7

पनघट तट पर घट भर ने को, नटखट आती नार!
झटपट सिर धर भारी गगरी, चलती थी सुकुमार!
छन छन छन छन पायल छनके, चमके उर पर हार!
मीठी बोली हँसी ठिठोली, प्रीत गीत तकरार!
पनिहारिन खो गई कहाँ, था जिनसे बडा लगाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।8

किसके घर में कौन आएगे, कब, कितने मेहमान!
काँव-काँव सुनकर कौए की, करते थे अनुमान!
और पड़ोसी के पाहुन को, खुद हम अपना मान!
बिछा दिया करते थे अपने, घर में दस्तरखान!
आज कहाँ है वो अपनापन, कहाँ वो आदर भाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढ़ा बरगद, वो पीपल की छाँव।।9

एक एक कर छूट रहे है साथी संगी मीत!
मैं रहता हूँ बीच शहर में, केवल जो कंक्रीट!
प्रीत रीत मनुहार जहाँ पर, रहती थी भरपूर!
वो घर बसता था गाँवो मे, हुआ मैं उससे दूर!
मेरे मन के आज कुरेदे, शहर ने रिसते घाव!
बहुत दिनों के बाद मैं आया, मेरे अपने गाँव!
कहाँ गया वो बूढा बरगद, वो पीपल की छाँव।।10

©डा नरपत आशिया “वैतालिक”

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