रंग मा पेमां रंग!!

बीकानेर रो दासोड़ी गांम जीवाणंदजी/ जीवराजजी/ जीयोजी रतनू नै बीकानेर राव कल्याणमलजी दियो। बात चालै कै जद आधै बीकानेर माथै जोधपुर रा राव मालदेवजी आपरी क्रूरता रै पाण कब्जो कर लियो। गढ में उणां आपरा खास मर्जीदान कूंपा मेहराजोत नै बैठा दिया जद कल्याणमलजी अठीनै-उठीनै इणां नै काढण खातर फिरै हा। जोग सूं आपरै कीं खास आदम्यां साथै बाप रै पासैकर निकल़ै हा जद बधाऊड़ा गांम में इणांनै जीवराजजी आसकरणोत गोठ करी। जीवराजजी रो व्यक्तित्व, वाकपटुता, मेहमाननवाजी आद सूं प्रभावित हुय’र कल्याणमलजी कह्यो कै- “बाजीसा आप तो बीकानेर म्हारै गुढै ई बसो! म्हैं आपनै उठै ई गांम देऊंला। आप आवजो।”[…]

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नेह रो दरियाव दिवलो

नेह रो दरियाव दिवलो,
गेह नै उपहार दे।
श्याम-बदना रात रै,
झट गात नै सिंणगार दे।
तन बाऴ जोबन गाऴ नै,
उपकार रै पथ प्रीत सूं।
ओ जीत रो जयकार दिवलो,
तिमिर नै ललकार दे।।[…]

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मानवकल्याण रै चिंतन रो सुभग संदेशः वेदार्थ चिंतामणि

आपांरै महताऊ ग्रंथां रो मंथण कर’र मानखै सारू ज्ञान रूपी माखणियो काढणिया एक महात्मा हुया है परमहंस स्वामी माधवानंदजी। उणां गुजराती में एक पोथी लिखी ‘वेदार्थ चिंतामणि‘। आ पोथी राजर्षि नाहरसिंहजी तेमावास पढी तो इणां नै लागो कै ऐड़ी जनकल्याणकारी पोथी राजस्थानी मानखै रै हाथां पूगणी चाहीजै ताकि ऐ ई आपरो कल्याणकारी मार्ग चुण आपरो हिंत चिंतन कर सकै। इणी पावन ध्येय नै दीठगत राख’र आप इण पोथी रो राजस्थानी में अनुवाद कियो।

निसंदेह मानव कल्याण करण वाल़ी आ पोथी आम मिनख सारू अंवेरणजोग है। नाहरसिंहजी नै लागो कै वेदार्थ जैड़ै गूढ विषय नै बोधगम्य बणाय’र आमजन तांई पूगायो जावै ताकि ईसरदासजी बारठ रा ऐ भाव फलिभूत हुय सकै तो साथै ई ऋषि ऋण परिशोध रो काम ई साधियो जा सकै-

भाग वडा तो राम भज, दिवस वडा कछु देह।
अकल वडी उपकार कर, देह धर्यां फल़ ऐह।।[…]

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मतदातावां सूं अरज

।।छंद – भुजंगी।।
सुणै बैठनै जाजमां बात सारी।
करै पीड़ हरेवाय हाथ कारी।
जको जात -पांति नाहि भेद जाणै।
तिको आपरै द्वार पे त्यार टाणै।
विचारै सदा ऊंच नै साच वैणो।
दिलां खोल एड़ै नैय वोट दैणो।।[…]

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भाव व भाषा का सुभग संगम: मेहाई महिमा

कवि श्रेष्ठ सागरजी कविया, जिन्हें कवियों ने ‘सागर सिद्ध’ की संज्ञा से अभिहित किया है, की गौरवशाली वंश परंपरा में रामप्रतापजी कविया के घर वि.सं.1924 की माग शुक्ला 13 शनिवार के दिन सेवापुरा गांव में कवि पुंगव हिंगलाजदान जी कविया का जन्म हुआ। कुशाग्र बुद्धि, विलक्षण स्मृति, वाग्मिता, आदि गुण आपमें वंशानुगत थे। यही कारण है कि आप एक नैसर्गिक कवि थे। आपका समग्र काव्य हृदयग्राही व चित्ताकर्षक है। डिंगल़-पिंगल़ में आपको समरूप प्रावीण्य प्राप्त था तो साथ ही आप संस्कृत व उर्दू में भी निष्णांत थे। यही कारण है कि डिंगल़ के मर्मज्ञ विद्वानों ने आपको डिंगल़ परंपरा का अंतिम महाकवि माना है जो वस्तुतः सत्य प्रतीत होता है।

आपकी उल्लेखनीय रचनाएं हैं-‘मेहाई-महिमा‘, ‘दुर्गा बहतरी’, ‘मृगया-मृगेंद्र’, ‘अपजस-आखेट’, ‘प्रत्यय-पयोधर’, ‘सालगिरह शतक‘, ‘वाणिया रासो’। इन महनीय रचनाओं के अलावा आपके कई डिंगल छंद व चिरजाएं शक्ति की भक्ति में प्रणीत हैं जो अत्यंत प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं।[…]

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माधव चरण शरण ले मूरख

माधव चरण शरण ले मूरख,
जनम मरण मिट जासी।

बावऴा क्यूं थूक विलोवै।
खऴ क्यूं जनम अकारथ खोवै।
होश गमाय बैठो है हर दिन,
गुण कद हर रा गासी।।माधव….

भटक आयो चौरासी भाया।
काट नहीं उतरियो काया।
अब तो चेत अरै उर आंधा,
पाछो कद अवसर पासी।।माधव….[…]

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सोढाण रो सांस्कृतिक दर्पण-सोढाण सतसई

साहित्यिक अर सांस्कृतिक भोम रो नाम है सोढांण। सोढांण धाट अर पारकर भांयकै रो समन्वित अर रूपाल़ो नाम। सोढाण मतलब सोढां रो उतन। इण विषय में मारवाड़ रा विख्यात कवि तेजसी सांदू भदोरा लिखै-

अमरांणो अमरावती, धरा सुरंगी धाट।
राजै सोढा राजवी, पह परमारां पाट।।

आ उवा धरा जठै कदै ई सोढा राजपूत शासन करता। उणी सोढां री धरा सोढाण, जिणरी जाण आखै हिंदुस्थान में है। बिनां खोट जिणां कीरती रा कोट कराया। मनमोटां, पोटां भर द्रब बांटियो अर सुजस खाटियो-[…]

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बोलो साच सुहाती बात

बोलो सत धार मधुर पण बोलो,
बोलो साच सुहाती बात।
व्हालां इसी कायनूं बोलो,
सुणियां सैणां नको सुहात।।

बिगड़ै संबंध बोल बाड़ां सूं,
गुण हद बिगड़ै कियां गुमेज।
तंतू नेह तणो जद तूटै,
हिरदै मिटै उफणतो हेज।।[…]

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आई ऐह दिया उपदेश

।।गीत – वेलियो।।
मढड़ो महमाय थान इऴ, मोटो,
जग में आज चारणां जात।
कऴजुग-पाप दरसणां काटण,
सोनल उथ राजै सुखदात।।१

धारण-चारण एक धरा रा,
भायां मांय किसो ओ भेद।
सोनल तणो संदेशो साचो,
इऴ पर पूगो थपण अभेद।।२[…]

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गीत संपखरो – तेमड़ाराय रो

नमो माडरांणी बखाणी तो सुरारांणी नमो नमो,
दीपै भांणी सात अहो भाखरां रै देस।
सालिया मेछांणी मुरड़ मंडिया केक संतां,
इल़ा मौज माणी राज अन्नड़ां आदेस।।1

धमां -धमां रमै जेथ गूघरां वीनोद गूंजै,
धूजै धरा धमां-धमां कदम्मां री धाक।
हमां-हमां करंती किलोल़ लाख नवै हेरो,
नमै जेथ खमा -खमा सुरां-नरां नाक।।2[…]

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