अपभ्रंश साहित्य रो सिणगार वर्णन
सिणगार तो हर भाषा रै लिखारां रो प्रिय विषै रैयो है। अपभ्रंश साहित्य रा थोड़ाक सिणगार रस प्रधान दूहा आप विद्वानां रै सामी प्रस्तुत है। अपभ्रंश भाषा में मोकळा पण्डित कवि होया है पण जिण दूहां री चरचा आगै होवणी है, वै इण भांत रै पंडितां रा लिखेड़ा नीं लागै। हां हो सकै कै आं दूहां रा लिखारा पारंगत पंडित हा पण दूहां रै सिरजण रै समै वै पंडिताई सूं ब्होत ऊपर उठेड़ा हा। सहज भाव ब्होत कठोर साधना सूं मिलै। कीं दाखलां सूं बात स्पष्ट होवैला।
अेक विरह-व्याकुळ प्रिया कैवै कै “जियां-कियां ई जे मैं म्हारै प्रिय नैं पा लेवती तो अेक इसो खेल रचती, जिसो आज लग नीं रचिजियो। प्राणपीव रै रूं-रूं में इयां रम जावती जियां माटी रै नयै सिकोरै में पाणी पैठ जावै अर उणरै अंग-प्रत्यांग नैं भीनो कर जावै“-
जइ केबइं पावीस पिउ, अकिआ कुड्डु करीसु।
पाणिउ नवइ सरावि जिबं, सब्बंगे पइसीसु।।[…]