चारण वंशोत्कीर्तनं – सत्येंद्र सिंह चारण झोरड़ा
।।गीत – त्रिकुटबंध।।
शुभ जात चारण सोवणी,
महदेव रे मन मोवणीं,
कंठा’ज शारद भुज भवानी, देवियां री दूत।
खग समर मांही खांचता।
भट ओज आखर बांचता।
कवि गीत डिंगल सृजन कर कर।
कहत दहुकत सबद खर खर।[…]