पदमण सुजस प्रकास

पापी के खपिया प्रिथी, विटळा केक विनास।
जस धिन दूणो जगमगै, पदमण तणो प्रकास।।

जिण झाळां री झाट सूं, खपियो खिलजी खास।
प्रिथमी सारी पसरियो, पदमण सुजस प्रकास।।

सत उर में साहस सधर, जबर वर्यो जसवास।
सांम नांम स्वाभिमान रो, पदमण तणो प्रकास।।

आय अलाऊदीन ऊ, निसचै हुवो निरास।
वर अगनी कीधो वसू, पदमण सुजस प्रकास।।[…]

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गीत जांगड़ो देसाणराय रो

जंगल़ थप थांन विराजै जांमण
देवी आप देसांणै।
द्रढकर राज बैठायो दाता,
बीको पाट बीकांणै।।1

अरजन विजै जांगलू आख्यो,
चारण जोड चरावै।
धारै नाय रोफ धणियां रो,
करनी हांण करावै।।2

चरती धेन जोड में चारो,
मन व्रदावन मांनै।
आयो दुसट बैठ अस आसण,
करी दूठ तंग कांनै।।3[…]

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देवी स्तुति

जय जग जननी! आसुर हननी! विश्व विनोदिनी! अंबा!
जगत पालिनी देवि! दयालिनी!, ललिता! मां! भुजलंबा!!१

विपद विदारिणी! त्रिभुवन तारिणी! नेह निहारिणी! करणी!
पातक हरणी! अशरण शरणी! तारण भव जल तरणी!!२

सिंहारूढ! अगम अतिगूढा! सकल सुमंगल दानी!
वंदन बीसभुजी! वरदायिनि!, भैरवी! भवा! भवानी!!३[…]

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🌹 सबरै घरै दीवाल़ी होसी!!🌹

मन रो तिमिर हरैला दीपक,
उण दिन ही उजियाल़ी होसी!
मिनखपणो होसी जद मंडित ,
देख देश दीवाल़ी होसी!!
🚩
जात -पांत सूं ऊपर उठनै,
पीड़ पाड़ोसी समझेला!
धरम धड़ै में बांटणियां वै,
घोषित उण दिन जाल़ी होसी!![…]

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गुण – गोगादे

।।छंद – रूपमुकंद।।
अरजी अग चूंड अखी ज अरोहड़,
सोहड़ गोग रु भ्रात सजै।
खटकै पितु वैर उरां खल़ खंडण,
लोयण बात चितार लजै।
भुजपांण अपांण रचूं चढ भारथ,
धूहड़ मांण बधांण धड़ै।
चढियो जस काज पखां जल़ चाढण,
लाल चखां भड़ गोग लड़ै।।1[…]

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पुस्तक समीक्षा – विडरूपता अर विसंगतियां रै चटीड़ चेपतो : ‘म्रित्यु रासौ’

यूं तो शंकरसिंह राजपुरोहित साहित्य री केई विधावां में लिखै पण इणां री असली ओळखाण अेक नामी व्यंग्य लेखक रै रूप में बणी। इणां रो पैलो व्यंग्य-संग्रै ‘सुण अरजुण’ बीसेक बरसां पैली छप्यो। औ व्यंग्य-संग्रै राजस्थानी साहित्यिक जगत में आपरी जिकी लोकप्रियता बणाई वा इणां रै समवड़ियै लेखकां नैं कम ई मिली। अबार शंकरसिंह राजपुरोहित जको व्यंग्य-संग्रै चर्चित है उणरौ नाम है- ‘म्रित्यु रासौ’।
‘म्रित्यु रासौ’ में कुल बीस व्यंग्य है। बीसूं ई व्यंग्य अेक सूं अेक बध’र अवल। बीसूं ई व्यंग्यां में मध्यम वर्ग री अबखायां अर भुगतभोगी यथार्थ जीवण रो लेखो-जोखो है तो दोगलापण, विडरूपतावां, देखापो, भोपाडफरी, छळछंद, पाखंड, अफंड आद रो सांगोपांग भंडाफोड शंकरसिंह राजपुरोहित कर्यो है।[…]

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लोक में आलोक के कवि डॉ आईदानसिंह भाटी

जैसलमेर के रेतिले गांव ‘ठाकरबा’ में जन्मे डॉ आईदानसिंह भाटी भले ही एक जाने-माने आलोचक और एक प्रखर कवि के रूप में समादृत हैं परंतु सही मायने में ये आज भी शहरी चकाचौंध में गंवई संस्कृति के प्रबल पैरोकार, संस्कारों को अपने में जीने वाले संजीदा इंसान के रूप में भी अपनी अलग पहचान रखतें हैं। वर्षों महाविद्यालयों में अध्यापन कराने व शहरी वातावरण में रहने के बावजूद भी गांव इनके जहन से निकल नहीं पाएं हैं। आज भी गांवों की आत्मीयता, अनौपचारिकता, बेबाकी, खुलापन, सहजता तो परिलक्षित होती ही है, साथ ही भाव व भाषा को भी पूरी शिद्दत के साथ अपनी पहचान बना रखा है।[…]

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एक दोहे ने कर दिया राव खेंगार का हृदय परिवर्तन

एक ऐतिहासिक घटना हेमचंद्राचार्य ने अपने ग्रंथ में अहिंसा के संदर्भ में लिखी है कि जूनागढ़ के चुडासमा शासक राव खेंगार प्रथम शिकार के बहुत शौकीन थे। इसलिए वे जीव हत्या भी बहुत किया करता थे। एक समय वे शिकार करने निकले। अपने लवाजमे सहित जूनागढ़ से बहुत आगे निकल गए एवं उनका लवाजमा काफी पीछे छूट गया और स्वयं काफी आगे निकल गए। अकस्मात एक हरिण पर उनकी नजर पड़ी तब भाला लेकर उसके पीछे घोड़ा दौड़ाया लेकिन हरिण के नजदीक पहुंच नहीं सके। हरिण तेज गति से दौड़ कर आगे निकल गया। तब राव खेंगार दोपहर तक पीछा करते हुए एक ऐसी जगह पहुंचे जहां आगे दो मार्ग आए, राव जूनागढ वाले मार्ग से आए। आगे दो मार्ग और निकले। उन तीन मार्गों के संगम पर बबूल का पेड़ था जिस पर ढुमण चारण बैठे थे। वहां राजा ने उन्हें देखा तब उनसे कि कहा अरे भाई! मेरा शिकार हरिण इन दो मार्गों में से कौनसे मार्ग पर गया है?[…]

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वीरता किणी री बपौती नीं हुवै!!

डिंगल़ रा सुविख्यात कवि नाथूसिंहजी महियारिया सटीक ई कह्यो है-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नू़तीह!
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह!!

अर्थात भक्ति अर वीरता किणी री बपौती नीं हुवै, ऐ तो जिको करै कै बखत माथै बतावै उणरी ईज हुवै। इणमें कोई जाति रो कारण नीं है। इण बात नै आपां दशरथ जाम (मेघवाल) री गौरवमयी बलिदान गाथा कै जोगै मेहतर री वंदनीय वीरता कै गोविंद ढोली रै अतोल त्याग कै झोठाराम पन्नू (मेघवाल़) रै बाहुबल़ री बातां रै मध्यनजर समझ सकां।[…]

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भारत नैं आज संभाळांला

सूरज जद स्याह अंधेरी सूं,
रंग-रळियां करणो चावै है।
चांदै नैं स्यामल-रजनी रै,
आँचळ में आँणद आवै है।

इसड़ी अणहोणी वेळा में,
होणी रा गेला कद दीखै।
कहद्यो अै तारा टाबरिया,
कुणनैं देखै अर के सीखै?[…]

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