उदध मुरधर तणो रतन अमोलख-वीर दुर्गादास नै समर्पित एक जांगड़ो साणोर गीत

गीत – जांगड़ो साणोर

उदध मुरधर तणो रतन अमोलख,
अवर मींढ नह आवै।
अवतंस दुरग वँश आसावत,
बसुधा साख बतावै।।1[…]

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दुख का कारण नहीं बनेंगे

जो हरदम आगे रहते हैं,
आगे ही शोभा पाते हैं।
वो एक कदम भी रुक जाएं,
तो सब राही रुक जाते हैं।।

मंजिल को पाना मुश्किल है,
उसूल निभाना और कठिन।
सुख के तो अनगिन साथी हैं,
हैं असल परीक्षक दुख के दिन।।[…]

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नह लीधो हर नाम

नह लीधो हर नाम, कपट अर कूड़ कमायो।
नह लीधो हर नाम, गरथ संचियो गमायो।
नह लीधो हर नाम, चपट सँग कीनी चोरी।
नह लीधो हर नाम, गात तकियो नित गोरी।
भूलियो नाथ भोदूपणै, बातां करी विवाद री।
मोचणी पाप गीधा मुदै, एको गल्ल ना आदरी।।1[…]

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गीत प्रहास साणौर – राजबाईसा समना रौ

रटूं रसण अठ जाम शुभनाम तव राजला
कृपाळू दास रा काम कीजे।
विमळ सुखधाम मढ समन्ना विराजत
दरस वरियांम अभिराम दीजे।।01।।

विनायक रखाजे विमळ मति वीसहथ
सहायक रहीजे सुराराणी।
नलायक हूंत नंह जुड़ाजे नेहपण
बिना हक बुलाजे नांह बाणी।।02।।[…]

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डीडवाना की गै’र

हाकम की होली, दिल-देहरी रंगोली,
खेले रसियां की टोली, लिए हाथों ही में चंग है।
बाजत मृदंग, थेई-थेई-ता-ता-थ्रग,
मिल करे हुड़दंग, वाको नाचे अंग-अंग है।
डोलची को पानी, लागे पीठ या पेशानी,
जातें याद आवै नानी, दुनी देख-देख दंग है।
कहे “गजादान”, आओ देखने को डीडवाना,
डोलची की गै’र, मेरे शहर की उमंग है।।[…]

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संवैधानिक मान्यता की मोहताज मायड़भाषा राजस्थानी

माँ, मातृभूमि एवं मातृभाषा तीनों का स्थान अति महनीय है क्योंकि ये तीनों हमें आकार, आधार एवं अस्तित्व प्रदान करती हैं। माँ तथा मातृभूमि की तरह ही मातृभाषा की महत्ता निर्विवाद है। संस्कृति के सहज स्रोत के रूप में वहां की भाषा की भूमिका प्रमुख होती है। यह अटल सत्य है कि मातृभाषा ही वह सहज साधन-स्रोत है, जो मनुष्य के चेतन एवं अचेतन से अहर्निश जुड़ी रहती है। यही कारण है जैसे ही किसी समाज या समूह का अपनी मायड़भाषा से संबंध विच्छेद होता है, वैसे ही उस समाज एवं समूह के चिंतन की मौलिकता नष्ट हो जाती है।[…]

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पूज मनां शिव के पद पंकज

ना डरपी लखि के निशि कालिय,
ना खल-घात हु तैं घबराए।
ना भवसंकट से हो सशंकित,
हार मती हर के गुन गाए।
आक धतूर चबाय पचाए सो,
पाप के बाप हु तैं भिड़ जाए।
पूज मनां शिव के पद-पंकज,
पाप के पंक तें पिंड छुड़ाए।।[…]

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मनवा मत कर बेड़ी बात

मनवा मत कर बेड़ी बात, बात में नाथ बिसर जासी।
नाथ बिसर जासी, हाथ सूं हेम फिसळ जासी।।टेक।।

हर सुमरण करतां हेताळू, (वो) संकट-टाळू साथ।
प्रतख एक वो ही प्रतपाळू, दीनदयाळू नाथ।।01।।
मनवा मत कर….

धीज पतीज धणी वो देसी, रीझ घणी रघुनाथ।
बिगड़ी बात स्यात में बणसी, साची कथ साख्यात।।02।।
मनवा मत कर—–[…]

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राजस्थानी लोकसाहित्य में मूल्य-बोध

बाळक रै जनमतां ईं उणरी मां रै मूंढै उण सारू मूल्य री सीख सरू हुज्यावै जकी आखरी सांस तांई साथै रैवै। राजस्थानी लोकगीत ‘बाळो पांख्यां बारै आयो माता बैण सुणावै यूं ’ में राजस्थानी वीर माता आपरै बाळै नैं नाळो मोळती बिरियां मूल्य री सीख देवै-‘बैर्यां री फौजां रा बाळा सीस काट घर आइजे यूं’। इणीं भांत बा मायड़ झूलो झुलावती वेळा ई ‘इळा न देणी आपणी हालरिया हुलराय’ री लोरी गावै। रणांगण सारू जावती बखत आपरै बेटै अर पति दोनां नै अखरावती कैवै कै ‘‘सहणी सबरी हूं सखी दो उर उलटी दाह/ दूध लजाणै पूत सम, वलय लजाणै नाह’’ रण में खेत रैवणियै बेटै सारू त्राहि-त्राहि कर’र रोवण री बजाय वीर माता अंतस सूं अंजस रा आखर उच्चारै ‘बेटा दूध उजाळियो, तू कट पड़ियो जुद्ध/ नीर न आवै नयण पण थण आवै दुद्ध’। राजस्थान री नारी सारू वीर माता अर वीर नारी रो विरुद इणीं कारण है कै वा वीरत री कीरत नैं आपरै जीवणमूल्यां री जड़ मानै।[…]

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सत पथ

हर इक मोड़ गली चौराहे, रावण का ही राज यहां।
विध-विध रूपाकारी दानव, है जिनके सिर ताज यहां।
राम नाम तो यहां समझलो, लाचारी का सौदा है।
ईमान-धर्म इन सबसे बढ़कर, या पैसा या ओहदा है।
कलयुग पखी राह रावण की, जिन भरमाए भले-भले।
उस पथ पर चलना अति मुश्किल,जिस पर श्री रघुनाथ चले।

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