गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-नवमो अध्याय
नवमो अध्याय – राजविद्याराजगुह्ययोगः ।।श्लोक।। इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यञ्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।। ।।चौपाई।। औ है इक छानै रौ ग्यान ज अवर औ ई विग्यान मान ज। दोष ज दृष्टि हिणा तुझ कै ऊँ जाण जगत सूं मुगती दै ऊँ।।१।। ।।भावार्थ।। भगवान् श्रीकृष्ण कह्यौ, थारा जिसड़ा दोष दृष्टि रहित भगत रै वास्तै इण परम रहस्यमय विग्यान सागै ग्यान नै पाछौ अच्छी तरियां कैऊँ ला। जिण सूं थूं इण दुःख रूपी संसार सूं मुगत व्है जायला। ।।श्लोक।। राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तमव्ययम्।।२।। ।।चौपाई।। औ सगळी ज विधा रौ राजा सगळौ गुपत ग्यान इत पा जा। सिरै शुद्ध फळ […]
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