नागदमण – सांयाजी झूला

सांयाजी झूला महान दानी, परोपकारी भक्त कवि थे। वे कुवाव गांव गुजरात के निवासी थे। इनका लिखा हुआ “नागदमण” भक्ति रस का प्रमुख ग्रन्थ है|

भक्त कवि श्री सांयाजी झूला कृत “नागदमण”
।।दोहा-मंगलाचरण।।
विधिजा शारदा विनवुं, सादर करो पसाय।
पवाडो पनंगा सिरे, जदुपति किनो जाय।।…१
प्रभु घणाचा पाडिया, दैत्य वडा चा दंत।
के पालणे पोढिया, के पयपान करंत।।…२
किणे न दिठो कानवो, सुण्यो न लीला संघ।
आप बंधाणो उखळे, बीजा छोडण बंध।।…३
अवनी भार उतारवा, जायो एण जगत।
नाथ विहाणे नितनवे, नवे विहाणे नित।।…४
।।छंद – भुजंगप्रयात।।
विहाणे नवे नाथ जागो वहेला।
हुवा दोहिवा धेन गोवाळ हेला।।
जगाडे जशोदा जदुनाथ जागो।
मही माट घुमे नवे निध्धि मांगो।।…१[…]

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अलूजी लाळस रा बारहमासा

॥छंद रोमकंद॥
अषाढ घघुंबिय लुंबिय अंबर बादळ बेवड चोवळियं।
महलार महेलीय लाड गहेलिय नीर छळै निझरै नळियं।
अंद्र गाज अगाज करे धर उपर अंबु नयां सर उभरियां।
अजमाल नथु तण कुंवर आलण सोहि तणी रत सांभरिया ।
म्हानै सोहि तणी रत सांभरिया॥ 1 ॥[…]

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रुद्राष्टकम – हिम्मत सिंह कविया नोख

परणाम करूँ विभुव्यापक को ब्रह्म वेद सरूप उद्धारक को ।
निरवाण सरूप महा शिव को दिस ईशन के प्रभुधारक को ।।

थिरहो निज रूप गुणातित भेद नही मनसा कुछ भीतर में ।
नभ चेतन रूप सदा शिव शंकर ऐक अनादि चराचर में ।।
पट धारण अंबर आप करो शशि सूरज तेज उजाळक को ।
परणाम करूँ विभुव्यापक को ब्रह्म वेद सरूप उद्धारक को।।1[…]

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झरोंखे दृग लायके – “प्रबीणसागर” से मनहरण कवित्त (घनाक्षरी)

कटी फेंट छोरन में, भृकुटी मरोरन नें,
शीश पेंच तोरन में, अति उरजायके,
मंद मंद हासन में, बरूनी बिलासन में,
आनन उजासन में, चकाचोंध छायके,
मोती मनी मालन में, सोषनी दुशालन में,
चिकुटी के तालन में, चेटक लगायके,
प्रेम बान दे गयो, न जानिये किते गयो,
सुपंथी मन ले गयो, झरोंखे दृग लायके. (१) […]

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हनुमान तांडव – सुरताणिया जगमालसिंह ‘ज्वाला’

।।छंद रेणकी।।
रट रट मुख राम, निपट झट नटखट, परगट तांडव रुप रचे।
कट कट कर दंत, पटक झट तरु वट, लपट झपट कपि नाच नचे।
दट दट झट दोट, चोट अति चरपट, लट पट दाणव मार लहै।
जय जय हनुमान, जयति जय जय जय, बिकट पंथ बजरंग बहै।1। […]

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रूंख रिछपाळ री करो रिच्छा – पुष्पेन्द्र जुगतावत पारलाउ

।।गीत बडो साणोर।।
परम आसरो पामियो अठे नित पंथिये,
चरम त्रिप्ती थई पूर्ण इंछा।
बावळां नरम नाजुक घड़ी विचारो,
रूंख रिछपाळ री करो रिच्छा।
इये ने राखियों टळै दर आपदा,
सदा चाकर रहै पवन वरसा।
प्राणदा हरित ने पोखजो प्राणियों,
कुदिन निवडे़ हुवे सुखी करसा।

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माँ करणी सूं विनती – मनोज चारण (गाडण) “कुमार”

।।छंद रोमकंद।।
इण धाम धरा पर नाम रहै, कर मात तुहीं किरपा हमपे।
करणी शरणै अब तोर पङे, धर हाथ तिहारो माँ सर पे।
कळू-काळ दकाळ करै फिरतो, माँ साय सहाय तूं ही करती।
करणी करणी बस नाम रटूं, तरणी भव पार तुहीं करती।१।

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हनुमान वंदना – कानदासजी मेहडु  (गाम- सामरखा) 

॥छंद त्रिभंगी॥
मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी, करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥1॥[…]

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माताजी का छंद – कवि जय सिंह जी सिंढायच (मंदा)

!!छन्द: अर्ध-नाराच!!
नमामी मेह नन्दिनी! नमामी विश्व वन्दिनी!!
भुजा विशाल धारणी! दयाल दास तारणी!!1!!
क्रपानिधे क्रपालकम्! दयाल बाल पालकम्!!
विशाल बिन्द भालकम्! नयन्न नैह न्हालकम्!!2!!
न जाने भेद नारदम्! सदा जपन्त शारदम्!!
नमामि भक्त वच्छलम्! अनाद विर्द उज्ज्वलम्!!3!!

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