बैशक दीजो बोट – कवि मोहनसिंह रतनू

दिल मे चिंता दैश री,मन मे हिंद मठोठ।
भारत री सोचे भली, बीण ने दीजो बोट।।

कुटलाई जी मे करे,खल जिण रे दिल खोट।
मोहन कहे दीजो मति,बां मिनखां ने बोट।।

काला कपटी कूडछा,ठाला अनपढ ठोठ।
घर भरवाला क्रत घणी, दैणो कदैन बोट।।[…]

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કંઠ કહેણીના મશાલચી : મેરૂભા ગઢવી (લીલા)

મેઘાવી કંઠના ગાયક શ્રી મેરૂભા ગઢવીનો જન્મ સૌરાષ્ટ્રમાં લોકવાર્તાઓ દ્વારા લોકસાહિત્યના સંસ્કાર ચેતાવનારા છત્રાવા ગામના લોકસાહિત્યના આરાધક પિતા મેઘાણંદ ગઢવી લીલા શાખાના ચારણને ખોરડે માતા શેણીબાઈની કૂખે સંવત ૧૯૬૨ના ફાગણ સુદ ૧૪ ના રોજ થયો. ગામડા ગામની અભણ માતાએ ગળથુથીમાં જ ખાનદાની, સમાજસેવા અને ભક્તિના સંસ્કારો બાળકમાં રેડ્યા. ચાર ગુજરાતીનું અક્ષરજ્ઞાન પ્રાપ્ત કરી બાળક મેરૂભાએ શાળાને સલામ કરી અને પછી આછી-પાતળી ખેતીમાં જોડાયા. પિતાની વાર્તા કથની મુગ્ધભાવે અને અતૃપ્ત હૈયે માણતા મેરૂભા લોકસાહિત્યના સંસ્કારોના રંગે રંગાઈ ગયા.[…]

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स्तुति श्री करणी माँ की – कवि जयसिंह सिढ़ायच (मण्डा-राजसमन्द)

।। छन्द – नाराच।।
नमो अनन्द कन्द अम्ब, मात मैह नन्दिनी।
निकन्द फन्द दास द्वन्द, विश्व सर्व वन्दिनी।।
कृपा निधाण किन्नियांण, बीस पाण धारणी।
नमौ धिराण दैशणोक, तीन लौक तारणी।।
माँ, सर्व काज सारणी।।१।।[…]

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भगतमाल़ – छंद त्रिभंगी – ब्रह्मदास जी बीठू माड़वा

।।छंद – त्रिभंगी।।
ईसर उठ भग्गा, धोमर अग्गा, बेवै नग्गा, लग बग्गा।
हुय नार सुहग्गा, मिल़ियौ मग्गा, दाणव पग्गा, रच दग्गा।
ललचायौ ठग्गा, नाचण लग्गा, सीस करग्गा, विणसंतू।
धिन हो दुख वारण, काज सुधारण, भगत उधारण भगवन तू।
जिय भगतां तारण भगवन तू।।१[…]

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भगत माल़ – गीत चित्त ईलोल़ -कवि ब्रह्मदास जी बीठू माड़वा, जैसलमेर

।।गीत – चित्त ईलोल़।।
प्रसण हुय प्रहल़ाद ऊपर, हर दिखाये हत्थ।
पाड़ सब्बल़ दैत्य पाड़्यौ, करण अदभुत कत्थ।।
तौ समरत्थ जी समरत्थ, सारी बात हर समरत्थ।।१

बाल़ धू वन जाय बैठौ, करण सेवस कांम।
देव अपणी ओट लीन्हौ, धणी अवचल़ धांम।
तौ निध नांम जी निध नांम, जग में व्यापियो निध नांम।।२[…]

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जेठवा री बात में कतिपय भ्रामक धारणाएं – श्री कैल़ाश दान उज्ज्वल आईएएस (रिटायर्ड)

‘चारण साहित्य का इतिहास’ नामक शोध ग्रन्थ लिख कर चारण साहित्य पर कालजयी व प्रणम्य कार्य करने वाले डॉ. मोहनलाल जिज्ञासु‘सौराष्ट्र नी रसधार’ के लेखक श्री झवेरचंद मेघाणी जैसे मनीषियों को सादर वंदन।
अस्तु इसी साहित्य इतिहास में एक बहुत बड़ी भूल हुई है – “ऊजळी-जेठवा री बात” इसमें ऊजळी को कवयित्री मानकर उसका परिचय तथा काव्य बांनगी भी दी गई है। यह भूल जिज्ञासुजी ने मेघाणीजी को आधार मानकर की थी। मेघाणीजी ने भी यह भूल जानबूझकर नहीं की अपितु विभिन्न कहानियों का संकलन करते समय अपवादस्वरूप हो गई।
इसी भूल पर राजस्थानी साहित्य के दिग्गज विद्वान श्रद्धेय कैलासदानजी उज्ज्वल ने शोध पत्रिका ‘विश्वंभरा’ अप्रैल-जून 1994 में एक शोध लेख लिखा था। जिसमें शोध के प्रतिमानों के आधार पर तथ्यात्मक दृष्टि से व्यापक प्रकाश डाला गया है।[…]

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भैरव नाथ रो छंद – जयसिंह सिंहढायच, मंदा, राजसमंद

।।छंद – त्रिभंगी।।
मामा मतवाल़ा, गोरा काल़ा, लाज रूखाल़ा, लटियाल़ा।
कायम किरपाल़ा, भीम भुजाल़ा,विरद विलाल़ा,विरदाल़ा।
जोगेस जटाल़ा, मन मुदराल़ा, आभ उजाल़ा,भाण समो।
जय जय जग सामी, अमर अमामी ,नामी भैरव नाथ नमो।।१
जिय भेल़े भैरव भ्रात नमो।।[…]

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भैरव वंदना – कवि डूंगरदान जी आशिया बाल़ाऊ

।।छंद – रेंणकी।।
ढम ढम बजि ढोल घूघरों घम घम रम रम खेतल रास रमें।
धम धम पग धरत धरत्रि धूजत, सुर देखत नृत तेण समें।
बम बम बम बोल बोलिया बावन, रम झम रम झम रमतोड़ा।
डम डम डम डाक डहकिया डैरव नम नम भैरव नाकोड़ा।।१[…]

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महादेव महिमा – डूंगर दान जी आसिया, बालाऊ

।।छंद – त्रिभंगी।।
आबू अचलेसर, तूं तांबेसर, ओम सिधेसर, अखिलेसर।
पूजै पिपलेसर, नमै नरेसर, चन्नण केसर, चरचै सर।
हर श्री हल़देसर, सिव रामेसर, दुख दालेदर, दूर दफै।
संकर सूरेसर, भव भूतेसर, जय जोगेसर, नांम जपै।।
(जिय)जग हर हर हर जाप जपै।।१[…]

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