चारणां कियौ नित अहरनिस चांनणौ – महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’

।।दूहौ।।
सीर सनातन सांपरत, राखण रजवट रीत।
अमर सदा इळ ऊपरां, पातां हंदी प्रीत।।

।।गीत – प्रहास साणौर।।
पलटियौ समै पण छत्रियां मती पलटजौ,
राखजौ ऊजल़ी सदा रीती।
संबंधां तणी आ देवजौ सीख कै,
पुरांणी हुवै नह जुड़ी प्रीती।।[…]

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श्री नरसिँह अवतार की स्तुति – कवि श्री रविराज सिंहढायच (मुळी सोराष्ट्र)

।।छंद – रेणकी।।
सुनियत अत भ्रमत नमत मन हरिसन, भगत मुगत भगवत भजनं,
सुरपत पत महत रहत रत समरत, सत द्रढ व्रत गत मत सजनं,
धत लखत रखत जगपत उर धारण, सुरत पुकारण श्रवण सुणै,
भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण, बिकट रुप नरसिँघ बणै,
जिय बिकट रूप नरसिंघ बणै।।1।।[…]

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मां सूं अरदास – जी. डी. बारहठ(रामपुरिया)

।।छंद-मोतीदाम।।

रटूं दिन रात जपूं तुझ जाप,
अरूं कुण नाद सुणै बिन आप।
नहीं कछु हाथ करै किह जीव,
सजीव सजीव सजीव सजीव।।१।।

लियां तुझ नाम मिटै सब पीर,
पड़ी मझ नाव लगै झट तीर।
तरै तरणीह कियां तुझ याद,
मृजाद मृजाद मृजाद मृजाद।।२।।[…]

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लिछमी – कवि रेवतदान चारण

ओढ्यां जा चीर गरीबां रा, धनिकां रौ हियौ रिझाती जा।
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै,
अै लिछमी दीप बुझाती जा !

हळ बीज्यौ सींच्यौ लोई सूं तिल तिल करसौ छीज्यौ हौ।
ऊंनै बळबळतै तावड़ियै, कळकळतौ ऊभौ सीझ्यौ हौ।
कुण जांणै कितरा दुख झेल्या, मर खपनै कीनी रखवाळी।
कांटां-भुट्टां में दिन काढ्या, फूलां ज्यूं लिछमी नै पाळी।
पण बणठण चढगी गढ-कोटां, नखराळी छिण में छोड साथ।
जद पूछ्यौ कारण जावण रौ, हंस मारी बैरण अेक लात।
अधमरियां प्रांण मती तड़फा, सूळी पर सेज चढाती जा।
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै,
अै लिछमी दीप बुझाती जा ![…]

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चारणों की उत्पत्ति – ठा. कृष्ण सिंह बारहट

चारणों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में ठा. कृष्ण सिंह बारहट ने अपने खोज ग्रन्थ “चारण कुल प्रकाश” में विस्तार से प्रामाणिक सामग्री के साथ लिखा है। उसी से उद्धृत कुछ प्रमाणों को यहाँ बताया जा रहा है। ये तथ्य हमारे प्राचीनतम ग्रंथों श्रीमद्भागवत्, वाल्मीकि-रामायण तथा महाभारत से लिए गए हैं।

चारणों की उत्पत्ति सृष्टि-श्रजन काल से है और उनकी उत्पत्ति देवताओं में हुई है, जिसका प्रमाण श्रीमद्भागवत् का दिया जाता है कि नारद मुनि को ब्रह्मा सृष्टि क्रम बताते हैं, वहां के द्वितीय-स्कंध के छटे अध्याय के बारह से तेरह तक के दो श्लोक नीचे लिखते हैं :-

अहं भवान् भवश्चैव त मुनयोऽग्रजाः।।
सुरासुरनरा नागाः खगा मृगसरीसृपाः।।१२।।
गंधर्वाप्सरसो यक्षा रक्षोभूतगणोरगाः।।
पशवः पितरः सिद्धा विद्याधरश्च चारण द्रुमाः।।१३।।

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पटवारी री पुकार – कवि स्व. भंवर दान जी, झणकली

14 बरस पढ़ाई चाली खर्ची रकम करारी।
भाभोसा परसादी बांटे बण्यो पूत पटवारी।
पहली ठकराहत पटवारी, दूजी थानेदारी रे।
कोण सुणै पटवारी थारी नोकरड़ी सरकारी रे।।1।।

दे ट्रेनिंग कयो हल्का माँ जाइन करो ड्यूटी जाके।
तीजे दिन तेहसीलदार सा इंस्पेक्सन करसी आके।
पैदल रस्ता हालत खस्ता ऊपर बस्ता भारी रे।
कोण सुणै पटवारी थारी नोकरड़ी सरकारी रे।।2।।[…]

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श्री आवड़ माता द्वारा हाकरा दरियाव (नदी) का शोषण करना – डॉ. नरेन्द्र सिंह आढ़ा (झांकर)

वि.स.808 के चैत्र शुक्ल नवमी मंगलवार के दिन मामड़जी चारण के घर पर भगवती श्रीआवड़ माता ने अवतार लिया। एक बार अकाल के समय मामड़जी अपने कुटूम्बियों के साथ अपने पशुधन को लेकर सिंध चले गये। उस समय तक सिन्ध पर अरबी मुसलमानों का कब्जा हो चुका था। उन्होंने सिंध के हिन्दुओं को जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन के लिए बाध्य करके बड़े पैमाने पर उन्हें इस्लाम स्वीकार करने को विवश कर दिया था। मामड़जी का परिवार सिंध के प्राचीन नानणगढ (सुल्तानपुर), जो बहावलपुर के 20 कोस उत्तर में आया हुआ था, के पास हाकरा दरियाव (नदी) के किनारे अपनी झोपड़ी (नेस) बनाकर रह रहा था। भगवती श्री आवड़ माता की सातों बहिन शक्ति की अवतार थी। ये सातों ही बहिनें बहुत रूपवान थी।[…]

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शूरवीर चारण कानाजी आढा द्वारा मित्र का वैर लेना – डॉ. नरेन्द्रसिंह आढा (झांकर)

।।शूरवीर चारण कानाजी आढा द्वारा आमेर के शासक सांगा को मारकर अपने मित्रवत् स्वामी करमचंद नरूका का वैर लेना।।

(सन्दर्भ: ख्यात देश दर्पण पृ स 28-29 कृत दयालदास सिंढायच व श्यामलदास जी दधवाडिया कृत वीर विनोद के भाग 3 के पृ स 1275)

बीकानेर की धरती के कानोजी आढा चारण जाति के बडे शूरवीर योद्धा थे कानोजी आढा दुरसाजी आढा की तरह कलम व कृपाण दोनो में सिद्धहस्त चारण थे। कानोजी अमल खूब खाते थे इनके अमल ज्यादा खाने से इनके भाईयों ने इन्हें घर से निकाल दिया। ये अमल की जुगाड में इधर उधर ठिकाणों में जाने लगे। घूमते हुए आमेर की सीमा में आ गये।[…]

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गीत सांगा मैणा रो-कल्याण दास गाडण कहै

।।गीत मैणा सांगा रो।।
—कल्याण दास जाडावत कहै—

कड़िबांधी तणो भरोसो करतां,
तीन च्यारि लागी तरवार।
‘सांगला’ तणी कटारी साची,
मारणहार राखियो मार।।
सांगा, जो कि अपनी कड़बंध अर्थात तलवार पर हमेशा भरोसा रखता था यानी जिसे अपनी प्रहार क्षमता पर पूरा विश्वास था। भलेही उसे तीन चार प्रबल प्रहारों का सामना करना पड़ा लेकिन ऐसी विषम परिस्थिति में भी उसने अपनी कटार के वार से उस दुश्मन को मार गिराया जो उसे मारने को उद्धत था।[…]

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प्रथम राष्ट्र कवि व जनकवि दुरसाजी आढ़ा – डॉ. नरेन्द्र सिंह आढ़ा (झांकर)

दुरसाजी आढ़ा का जन्म चारण जाति में वि.स.1592 में माघ सुदी चवदस को मारवाड़ राज्य के सोजत परगने के पास धुन्धला गाँव में हुआ था। इनके पिताजी का मेहाजी आढ़ा हिंगलाज माता के अनन्य भक्त थे जिन्होंने पाकिस्तान के शक्ति पीठ हिंगलाज माता की तीन बार यात्रा की। मां हिंगलाज के आशीर्वाद से उनके घर दुरसाजी आढ़ा जैसे इतिहास प्रसिद्ध कवि का जन्म हुआ। गौतम जी व अढ्ढजी के कुल में जन्म लेने वाले दुरसाजी आढ़ा की माता धनी बाई बोगसा गोत्र की थी जो वीर एवं साहसी गोविन्द बोगसा की बहिन थी। भक्त पिता मेहाजी आढ़ा जब दुरसाजी आढ़ा की आयु छ वर्ष की थी, तब फिर से हिंगलाज यात्रा पर चले गये। इस बार इन्होनें संन्यास धारण कर लिया। […]

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