सहजता और संवेदना को अभिव्यंजित करती कहानियां।

राजस्थानी कहानियों की गति और गरिमा से मैं इतना परिचित नहीं हूं जितना कि मुझे होना चाहिए। इसका यह कतई आशय नहीं है कि मैं कहानियों के क्षेत्र में जो लेखक अपनी कलम की उर्जा साहित्यिक क्षेत्र में प्रदर्शित कर अपनी प्रज्ञा और प्रतिभा के बूते विशिष्ट छाप छोड़ रहे, सरस्वती पुत्रों की लेखनी की पैनी धार और असरदार शिल्प शैली से प्रभावित नहीं हुआ हूं अथवा उनके लेखन ने मेरे काळजे को स्पर्श न किया हो। निसंदेह किया है। इनकी कहानियों ने न केवल मेरे मर्म को स्पर्श किया है अपितु इनकी लेखन कला, भाषा की शुद्धता तथा भावाभिव्यक्ति के कारण इन लेखकों की एक अमिट छवि भी मेरे मानस पटल पर अंकित हो गई है।[…]

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झरड़ो! पाबू सूं करड़ो!!

प्रणवीर पाबूजी राठौड़ अपने प्रण पालन के लिए वदान्य है तो उनके भतीज झरड़ा राठौड़ अपने कुल के वैरशोधन के लिए मसहूर है।
मात्र बारह वर्ष की आयु में जींदराव खीची को मारा। जींदराव की पत्नी पेमां जो स्वयं जींदराव की नीचता से क्रोधित थी और इस इंतजार में थी कि कब उसका भतीजा आए और अपने वंश का वैर ले। संयोग से एकदिन झरड़ा जायल आ ही गया। जब पेमल को किसी ने बताया कि एक बालक तलाई की पाल़ पर बैठा है और उसकी मुखाकृति तुम्हारे भाईयों से मिलती है। पेमल की खुशी की ठिकाना नहीं रहा। वो उसके पास गई। उसकी मुखाकृति देखकर पहचान गई तो साथ ही उसकी दृढ़ता देखकर आश्वस्त भी हो गई कि यह निश्चित रूप से वैरशोधन कर लेगा।[…]

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प्राक्कथन-इतिहास एवं काव्य का मणिकांचन सुमेल: बीसहथी मां बिरवड़ी

राजस्थान जितना बहुरंगी है उतना ही विविधवर्णी यहां का काव्य है। जब हम यहां के पारम्परिक काव्य का अनुशीलन करते हैं तो शक्ति भक्ति से अनुप्राणित काव्यधारा हमारे सामने आती है। जैसा कि अन्य जगहों पर रामभक्ति काव्यधारा व कृष्णभक्ति काव्यधारा की सरस सलिला प्रवाहित होती हुई हम देखते हैं वहीं राजस्थान में इन दोनों धाराओं के साथ भक्ति की तीसरी धारा उसी बलवती वेग से प्रवाहित है, वो है देवी भक्ति काव्य धारा। क्योंकि राजस्थान में शक्ति पूजन की परम्परा युग-युगीन रही है। जिसका कारण स्पष्ट है कि धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ अपने प्राण उत्सर्ग करने वाले शक्ति की प्रतीक दुर्गा के विभिन्न रूपों की उपासना करते रहे हैं। इन्हीं भावों को हृदयंगम कर यहाँ के कवियों ने विभिन्न ग्रंथों का प्रणयन कर अपने स्वाभाविक गुण वैशिष्ट्य का उदात्त परिचय दिया है।[…]

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पुस्तक समीक्षा: जीवटता री जोत जगावतो अंजसजोग उल्थौ: चारु वसंता

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली रै अनुवाद पुरस्कार 2019 सूं आदरीजण वाळी काव्यकृति ‘चारु वसंता’ मूळ रूप सूं कन्नड़ भासा रो देसी काव्य है, जिणरा रचयिता नाडोज ह.प. नागराज्या है। इण काव्य रो राजस्थानी भावानुवाद करण वाळा ख्यातनाम साहितकार है-डाॅ. देव कोठारी, जका आपरी इतियासू दीठ, सतत शोधवृत्ति अर स्वाध्याय प्रियता रै कारण माड़ भासा राजस्थानी रा सिरै साहितकारां में आपरी ठावी ठौड़ राखै। डाॅ. कोठारी प्राचीन राजस्थानी साहित्य, खास कर जैन साहित्य रा उल्लेखणजोग विद्वान है। हर काम नैं पूरी ठिमरता अर दिढता सूं अंजाम देवण री स्वाभाविक आदत रा धणी डाॅ. कोठारी ‘चारु वसंता’ काव्य रो उल्थौ ई घणै धीरज सूं कियो है।[…]

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आसै बारठ रै चरणां में

मधुसूदन जिण सूं रीझ्यो हो,
वरदायी जिणरी वाणी ही।
बचनां सूं जिणरै अमर बणी,
ऊमा दे रूठी राणी ही।
कोडीलै बाघै कोटड़ियै,
सेवा जिण कीनी सुकवि री।
मरग्या कर अमर मिताई नैं,
परवाह करी नीं पदवी री।

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नसीहत री निसाणी – जाल जी रतनू

किसी का बिन जाणिये, विश्वास न कीजै।
गैणा गांठा बेच के, अन सूंगा लीजै।
पढवाचा कीजै नही, बिन मौत मरीजै।
ठाकुर से हेत राखके, हिक दाम न दीजै।
भांग शराब अफीम का, कोई व्यसन न कीजै।
दुसमण की सौ बीनती, चित्त ऐक न दीजै।

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गीत कुशल जी रतनू रे वीरता रो बगसीराम जी रतनू रचित

राजस्थान मे चारण कवि ऐक हाथ मे कलम तथा दूसरे हाथ मे कृपाण रखते थे। महाराजा मानसिंह जी जोधपुर के कहे अनुसार रूपग कहण संभायो रूक। ऐक बार मानसिंह जी का भगोड़ा बिहारी दास खींची को भाटी शक्तिदान जी ने साथीण हवेली मे शरण दी, इस पर मान सिह जी ने क्रुद्ध होकर फोज भेज दी। शरणागत की रक्षा हेतु भाटी शक्तिदान जी ऐवं खेजड़ला ठाकुर सार्दुल सिंह जी ने सामना किया। इस जंग मे मेरे ग्राम चौपासणी के उग्रजी के सुपुत्र कुशल जी रतनू ने पांव मे गोली लगने के बाद भी युद्व किया।
उनकी वीरता पर तत्कालीन कवि बगसीराम जी रतनू ने निम्नलिखित डिंगल गीत लिखा जो यहाँ पेश है।

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जाट सिर झाट खागां

मध्यकालीन इतियास नै पढां तो व्यक्तिगत अहम पूर्ति अर व्यक्तिगत वैमनस्यता री बातां तो साची निगै आवै पण जिण जातिगत वैमनस्यता अर कटुता री बातां आजरै इतियासकारां लिखी है वै सायत घणीकरीक मनघड़त अर गोडां घड़्योड़ी लागै क्यूंकै जातिगत कटुता उण जुग में सायत नीं ही अर जे ही तो ई आजरै संदर्भ में जिको मनोमालिन्य है उवो जातियां में नीं हुय’र मिनखां में हो। भलांई उण दिन मिनख कमती हा पण मिनखाचार घणो हो। क्यूंकै उण जुग में ऐड़ा दाखला पढण में नीं रै बरोबर आवै। उण जुग में एक बीजै रै पेटे सनमान, अपणास समर्पण अर अपणास खोब-खोब’र भर्योड़ी ही।[…]

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हुलसाया-मन-हंस

स्वर्णाभा बिखरी सुखद, अद्भुत नभ अभिराम।
लगता है वो आ रहा, फिर से मन के धाम।।१

नीला, अरुणिम, गेरूआ, श्याम श्वेत अरु लाल।
सूर्य क्षितिज के थाल से, रहता रंग उछाल।।२

प्रत्यूषा आई पहन, तुहिन-बिंदु-मणि माल।
जली शर्वरी देख यह, चली भृकुटि कर लाल।।३

सप्तपदी की ले शपथ, भरा मांग सिंदूर।
प्राची का लो कर रहा, रवि घूंघट पट दूर।।४[…]

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