मेट आरत मेह कर

।।छंद – सारसी।।
बरखा बिछोही शुष्क रोही,
और वोही इण समैं।
मघवा निमोही बण बटोही,
हीय मोही लख हमैं।
बलमा बिसारी धण दुखारी,
जीव भारी कष्टकर।
पत राख सुरपत दर बिसर मत,
मेट आरत मेह कर।
जिय देर मत कर मेह कर।[…]

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कहाँ वे लोग कहाँ वे बातें (गाँव सींथल का एक वृतांत) – सुरेश सोनी (सींथल)

आज आपके सींथल का एक वृतान्त पेश करता हूं –
सींथल गांव किसी भी कालखंड में परिचय का मोहताज नहीं रहा है, क्योंकि हर युग ने इस गांव की उर्वरा भूमि पर प्रतिभावानों, बुद्धिमानों, व्यापारियों, समर्थों व श्रेष्ठों की उत्पत्ति मन लगाकर की है।
यहां के हजारों किस्से बीकानेर, शेखावाटी, मारवाड़ व मेवाड़ तक के गांवों की हथाइयों में आज भी कहे जाते हैं और उन किस्सों के नायक आज भले ही इतिहास के अंग बन गए हैं, मगर लोगों की जुबानों पर आज भी भली-भांति जिन्दा हैं।
बात उस जमाने की है, जब मेरा तो जन्म भी नहीं हुआ था। गांव के किसरावतों के बास में रहने वाले कालूदानजी ‘बडोजी’ गांव के मौजीज आदमी हुआ करते थे।[…]

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पुस्तक-प्रेम, पुस्तकालय-संस्कृति एवं पठनीयता के समक्ष चुनौतियां

विगत दिनों किसी मित्र ने बताया कि उसका पुत्र अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय एवं महाविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करके अभी अमेरिका में “व्यक्तित्व-विकास” की कक्षाएं लगाता है, जिनमें हजारों विद्यार्थी आते हैं। वहां बौद्धिक के साथ-साथ शारीरिक विकास हेतु सूक्ष्म-योगा भी करवाया जाता है। कक्षा प्रारंभ होने के समय एक युवती, जो कोई पुस्तक पढ़ रही थी, योग हेतु लगाई गई चटाई पर आने से पहले उसने अपने जूते उतारे तथा उस पुस्तक को अपने जूतों पर ही उलटा रख दिया ताकी वापस आने पर वहीं से पुनः पढ़ना प्रारंभ कर दे। कक्षा में सभी विद्यार्थी अमेरिकी थे, बस योग-शिक्षक भारतीय था। जैसे ही उस भारतीय की दृष्टि जूतों पर रखी पुस्तक पर पड़ी तो वो दौड़ कर गया और पुस्तक को उठाया। उसे सीस झुका कर प्रणाम किया तथा ससम्मान मेज पर रखा। जैसे ही विद्यार्थियों से मुखातिब हुआ तो उस लड़की ने आश्चर्य से पूछा “सर! यह क्या कर रहे हैं आप?[…]

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काव्य कलरव स्नेह मिलन समारोह खुड़द

।।छप्पय।।
मह पावन मरूदेश, मुदै कियो महमाई।
किनियाणी करनल्ल, आप घर सागर आई।
जणणी धापू जोय, नाम जग इंद्रा नामी।
चारण वरण चकार, वंश रतनू वरियामी।
खुड़द नै अचड़ दीनी खमा, आणद अपणां आपिया।
जूनकी रीत पाल़ी जगत, केवी व्रन रा कापिया।।1[…]

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श्री इंन्द्रबाईसा अन्दाता के जन्म-दिवस पर – राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर

संम्वत गुनी’सै त्रैसटियां, साणिकपुर सामान।
शुकल पक्ष आसोज मे, श्री हिंगऴाज सुथान।।

चराचर जगत की हलचल की हर भांति की गतिविधियां अपने अपने नियत निर्धारित परिसंचरण तंत्राधिन सक्रिय सहयोग कर ब्रह्माण्ड संचालन में परम सत्ता के प्रति उत्तरदायित्व का परिपोषण करती है। इसी नियम से ही आसुरी शक्तियों के उद्भव को पराभूत पराजित करने के लिए श्रृष्टि चक्र मे अवतार अवतरण की सनातन परम्परा चलती आ रही है, जिसमें शक्ति अवतार की श्रृंखला भी समय समय पर सदा-सर्वदा चलती रही है।[…]

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जद छूटै जालोर!

दूहा लोहा सरिस दुहुं, वडौ भेद इक एह।
दूहो वेधै चित्त नै, लोहा भेदे देह।।

यानी दोहा अर लोहा री मार एक सरीखी। एक चित्त नै वेधै तो दूजो देह नै। पण लोह तो हरएक रै घाव कर सकै पण दूहो फखत समझै उणनै ईज सालै। इतिहास में ऐड़ा अनेकूं दाखला मिलै कै दूहे इतिहास बदल़ दियो। लोगां री दिनचर्या बदल़दी।[…]

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पाण्डुलिपि संरक्षण – कवि गंगाराम जी बोगसा

गंगारामजी बोगसा महाराजा तखतसिंह जी जोधपुर के समकालीन व डिंगल़ के श्रेष्ठतम कवियों में से एक थे। खूब स्तुतिपरक रचनाओं के साथ अपने समकालीन उदार पुरुषों पर इनकी रचनाएं मिलती है। आज जोधपुर में मेरे परम स्नेही महेंद्रसा नरावत सरवड़ी जो पीएचडी के छात्र व अच्छे कवि भी हैं। ये पांडुलिपियां लेकर हथाई करने आए। महेंद्रसा, गंगारामजी के चौथी पीढ़ी के वंशज हैं। अपने पर-पितामह की पांडुलिपियों का संरक्षण कर रहे हैं।[…]

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मत किम चूको मोर?

थल़ सूकी थिर नह रह्यो, चित थारो चितचोर।
लीलां तर दिस लोभिया, मन्न करै ग्यो मोर।।1

लूवां वाल़ै लपरकां, निजपण तजियो नाह।
धोरां मँझ तज सायधण, रुगट गयो किण राह।।2

झांख अराड़ी भोम जिण, आंख खुलै नीं और।
वेल़ा उण मँझ वालमा, मोह तज्यो तैं मोर।।3

वनड़ी तज थल़ वाटड़ी, अंतस करा अकाज।
बता कियो तैं वालमा, की परदेसां काज।।4[…]

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गज़ल – सुनो

चींटियों के चमचमाते पर निकल आए सुनो।
महफ़िलों में मेंढ़कों ने गीत फिर गाए सुनो।

अहो रूपम् अहो ध्वनि का, दौर परतख देखिए,
पंचस्वर को साधने कटु-काग सज आए सुनो।

आवरण ओढ़े हुए है आज का हर आदमी,
क्या पता कलि-कृष्ण में, कब कंश दिख जाए सुनो।[…]

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गीत वांमणावतार रौ – महाकवि नांदण जी बारहठ

गीत वांमणावतार रौ (नांदण कहै)

आखै दरबार ब्रिहामण उभा,अंग दिसै लुघ वेदअगांह।
रीझ सु इती दीधयै मो राजा,मांडू मंढी जिती भुंम मांह।।1

विप्र विनंतिपयंपै वांमण,मैहर करै लेइस माप।
इळ थी आठ पांवडा अमकै,एकण कुटी जिती तूं आप।।2

जग ताहरा तणौ सांभल जस,हूं आयो मन करै हट।
दुज उंचरै दीये मो दाता,धर्मसाला जेतली धर।।3[…]

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