कविता करणी ई व्है तो करजो !!
तो करजो!
धूवादी उरड़ती
काल़ोड़ी कांठल़ में
भूरड़ै भुरजां में
नागण सी
वल़ाका खावती
काल़ रो माथो किचरण
अंतस में उमंग
पल़कती बीजल़ री।[…]
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आथूणै राजस्थान री धरा वास्तव में सिद्धां, सूरां, सतियां, जतियां री धरा है। बांठै-बांठै कन्नै लोक-निर्मित उण महामनां री कीरत रा कमठाण, इण बात री साख भरै कै-
कीरत महल अमर कमठाणा।
लोकहितार्थ जीवण जीवणियां अर अरपण करणियां रो जस सदैव जनकंठां में ई गूंजतो सुणीजै, क्यूंकै लोक कदै ई गुणचोर नीं हुवै अर साथै ई लोक जात रो पूजक नीं, बल्कि गुणां ग्राहक हुवै-
गुण नै झुरूं गंवार, जात न झींकूं जेठवा।[…]
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काबुल रो मालक मुगल कामरान आपरी विस्तारवादी नीत सूं बीकानेर रै राव जैतसी नै धूंसण सारू आपरी एक लांठी सेना रै साथै बीकानेर माथै चढ आयो। उणरी फौज बीकानेर रै पाखती डेरा दिया अर ‘सौभागदीप'(बीकानेर रै किले रो नाम) रै सौभाग नै अभाग में बदल़ण री चेष्टा में प्रबल हमले री जुगत बैठावण लागो-
मालक काबल मुलक रो, कमरो लीध कटक्क।
जुद्ध करण नृप जैत सूं, आयो लांघ अटक्क।।[…]
।।छंद – त्रिभंगी।।
सरदं ऋतु आई, छिति त्रय छाई, घन गहराई, जरठाई।
नवकुंज फुलाई, नव निशि पाई, रास रचाई, जगमाई।
दिप माल बनाई, साज सजाई, जन सुखदाई, संसारा।
देवा!दिलदारा, इण रुत न्यारा, दरस तिहारा, दे प्यारा।।१[…]
देवगढ़ के कुंवर राघवदेव चूंडावत ने ओपा आढ़ा को एक घोड़ा उपहार में दिया। जब वह इसको लेकर रवाना हुआ तो घोड़े ने अपने सही रंग बता दिये। प्रस्तुत गीत में घोड़े के सभी अवगुण बताते हुए राघवदेव को कड़ा उपालम्भ दिया हैं।
धुर पैंड़ न हालै माथौ धूंणे,
हाकूं कैण दिसा हे राव।
दीधौ सौ दीठो राघवदा,
पाछो लै तो लाखपसाव।।१[…]
छपन क्रोड़ चामुंड अर, चौसठ जोगण साथ।
नवलख रमती नेसड़ै, भाखर सूंधा माथ।।१
झंडी लाल फरूकती, जोत अखंडी थाय।
मंडित मंदिर मात गिरि, राजे सुंधा राय।।२
रणचंडी दंडी असुर, सेवक करण सहाय।
बैठी मावड़ बीसहथ, सगती सुंधाराय।।३
डाढाल़ी दुख भंजणी, गंजण अरियां गात।
भाखर सुंधा पर भवा!, चामंड जग विख्यात।।४[…]
ચારણનો શિરમોર હતો, લાખેણો લાયક,
વકતા ને વિદ્વાન, પ્રખર પિંગળશી પાયક.
આઈશ્રી સોનલમાના અંતેવાસી, સમાજને જાગૃત કરનાર, યુગપુરુષ સ્વશ્રી પીંગળશીભાઈ પાયક સાચા અર્થમાં ચારણ ઋષિ હતા. સ્વહિત કે પરિવારની ખેવના કર્યા વિના સમગ્ર જીવન સમાજ સેવામાં અર્પણ કરી સમગ્ર ચારણ સમાજને ઊજળો બનાવ્યો.[…]
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[…]वेद सार खंड ससि, वाम अंक गति मिति,
नौमि गुरू शुक्ल मधु मास के समास ही।
देथा मारू चारन जो भव्य है कहाति जाति,
देस कच्छ स्वच्छ ग्राम बाबिया निवास ही।
देवीदान दीनो “देवी दास” ही प्रकास कीन्हौ,
नवीनो नगीनो ग्रंथ बावनी विलास ही।
सुबुधि उपावनी सो, ताप को नसावनी है,
भावनी सुजान को, बढावनी हुलास की।।५४।।[…]
।।गीत – प्रहास साणोर।।
अयो अमर रो उगाहण वैर धुब आग रै
जाग रै क्रोध उर पाल जायो।
भुजां रै भरोसो, नको बल़ भागरै,
आगरै नाग रै रूप आयो।।1[…]
स्वाभिमान अर हूंस आजरै जमाने में तो फखत कैवण अर सुणण रा ईज शब्द रैयग्या। इण जमाने में इण दो शब्दां नै लोग जितरा सस्ता अर हल़का परोटै, उणसूं लागै ई नीं कै कदै, ई शब्दां रा साकार रूप इण धर माथै हा। आज स्वाभिमान अर हूंस राखणा तो अल़गा, इण शब्दां री बात करणियां नै ई लोग गैलसफा कै झाऊ समझै। पण कदै ई धर माथै ऐड़ा मिनख ई रैवता जिकै स्वाभिमान री रुखाल़ी सारू प्राण दे सकता हा पण स्वाभिमान नै तिल मात्र ई नीं डिगण देता। कट सकता हा पण झुक नीं सकता। ‘मरणा कबूल पण दूध-दल़ियो नीं खाणा।’ यूं तो ऐड़ै केई नर-नाहरां रा नाम स्वाभिमान री ओल़ में हरोल़ है पण ‘सांवतसिंह झोकाई’ री बात मुजब ‘मांटियां रो मांटी अर बचकोक ऊपर’ री गत महावीर बलूजी(बलभद्र) चांपावत रो नाम अंजसजोग है।[…]
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