खूबड़जी री स्तुति – गंगारामजी बोगसा

डिंगल कवियों की यह उदारता भी रही है कि अपने मित्रों, हितेषियों व संबंधियों के आग्रह पर ये उन्हीं के नाम से भी रचनाएं लिख देते थे। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण मिलते हैं। बाद में मूल कवि के स्थान पर उस कवि का नाम चल पड़ता है जिसके नाम से मूल कवि ने रचना बनाई।

ऐसा ही एक उदाहरण आज गंगारामजी बोगसा सरवड़ी की कुछ पांडुलिपियां पढ़ते हुए मिला। गंगारामजी ने किन्हीं ठाकुर सरदारसिंहजी के नित्य पाठ हेतु मा खूबड़ी की स्तुति लिखकर दी थी।[…]

» Read more

कविता रो प्रभाव

दूहो दसमो वेद,
समझै तैनै साल्है।

काव्य मर्मज्ञां दूहै नै दसमे वेद री संज्ञा दी अर कह्यो कै ओ फखत उणरै काल़जै नै ईज छूवै जिको इणरो मर्म जाणतो हुवै !नीतर आंधै कुत्तै खोल़ण ही खीर वाल़ी बात है। जिणांरै सातै सुआवड़ी हुवै उणांरै दूहे रो मर्म नैड़ैकर ई नीं निकल़ै पण जिकै रै नैड़ैकर निकल़ै, उणनै ओ चित नै चकित करै तो साथै ई चैन ई देवै। आ ई नीं ओ उणरै दिल में दरद उपावै तो साथै ई दवा पण करै-

दूहो चित चक्रित करै, दूहो चित रो चैन।
दूहो दरद उपावही, दूहो दारू ऐन।।[…]

» Read more

गीत – प्रिथीराज राठौड़ रो – लक्खा बारठ रो कहियो

गीत नायक पृथ्वीराजजी राठौड़ है। जो वीर प्रकृति व प्रभु भक्ति में समरूप अनुरक्ति रखते थे। इन्होंने अकबर के कहने पर ‘वेली किसन रुकमणी री’ की ब्रजभाषा में टीका भी की थी। उस टीका की भाषा का उदाहरण रावतजी सारस्वत ने अपने विनिबंध ‘पृथ्वीराज राठौड़’ में उद्धृत किया है। लक्खाजी को थोड़ा पढ़ने पर मेरे अंतस में जची है कि छोटा ही सही इन पर एक लेख किसी पत्रिका हेतु लिखूं। बहरहाल लखावत साहब के आदेशों की पालनार्थ-

।।गीत – प्रिथीराज राठौड़ रो- लक्खा बारठ रो कहियो।।

वपि वाधै नितूं विराजै अविरच,
भले बिहुं विध उर नवली भांत।
प्रभु सूं जेतो हेत प्रिथीमल,
पैररसौ ऐतो पुरसात।।[…]

» Read more

न्यात न्यात में होवत नाथो!

जोधपुर माथै महाराजा सूरसिंहजी रो राज। सूरसिंहजी रै खास मर्जीदानां मांय सूं एक पुष्करणा ब्राह्मण नाथोजी व्यास ई हा। नेकदिल अर उदारमना मिनख। उणांरै एकाएक बाई ही। दिन लागां बाई परणावण सावै हुई।

बेटी मोटी हुवै जणै बाप सूं पैला मा नै चिंता हुवै। इणी चिंता रै वशीभूत एक दिन गुराणी रै मन में जची कै हमै बाई रा हाथ पील़ा कर दैणा चाहीजै। इण सारू एक दिन उवां व्यासजी नै कह्यो कै –
“जगत में खांचिया फिरो। डूंगर बल़ता निगै आवै पण पगै नीचै सिल़गती निगै नीं आवै। बाई मोट्यार माल हुई है अर थे आंधा हुयोड़ा हो। कांई आ बोल’र कैसी कै म्हनै हमे परणावो।”[…]

» Read more

वाह तरव्वर वाह

लालच ना जस लैण रो, चित न बडाई चाह।
आये नै दे आसरो, वाह तरव्वर वाह।।1

गहडंबर फाबै गजब, रल़ियाणो मझ राह।।
पथिक रुकै परगल़, छिंयां, वाह तरव्वर वाह।।2

विहँग सीस वींटा करै, उर ना भरणो आह।
दंडै नीं राखै दया, वाह तरव्वर वाह।।3

फूल तोड़ फल़ तोड़णा, पुनि सथ तोड़ पनाह।
उण पँछिया नै प्रीत दे, वाह तरव्वर वाह।।4[…]

» Read more

किरसाण बाईसी – जीवतड़ो जूझार

।।दूहा।।
तंब-वरण तप तावड़ै, किरसै री कृशकाय।
करण कमाई नेक कर्म, वर मैंणत वरदाय।।1

तन नह धारै ताप नै, हिरदै मनै न हार।
कहजो हिक किरसाण नै, सुज भारत सिंणगार।।2

गात उगाड़ै गाढ धर, फेर उगाड़ी फींच।
खोबै मोती खेत में, सधर पसीनो सींच।।3

कै ज सिरै किरतार है, कै ज सिरै किरसाण।
हर गल्ल बाकी कूड़ है, कह निसंक कवियाण।।4[…]

» Read more

गीत मथाणियाराय रो

।।गीत मथाणियाराय रो।।
।।गीत।।
अमर दूदहर आवियो तेड़वा ईसरी,
मया कर जोध पर आज माता।
सार कर रिड़ै-तण काज गढ सारजै,
निजर भर इमी री पाल़ नाता।।1[…]

xt-align: center;”>पहर एक प्रभात रा, अमर रुकूँली आंण।
प्रण पूरै प्रमेश्वरी, मरूधर नगर मथांण।।

।।गीत।।
अमर दूदहर आवियो तेड़वा ईसरी,
मया कर जोध पर आज माता।
सार कर रिड़ै-तण काज गढ सारजै,
निजर भर इमी री पाल़ा नाता।।1[…]

» Read more

ऊंठ रो गीत (प्रहास साणोर)

।।गीत – प्रहास साणोर।।
अगै करहलां जोड रा वरी धिन कीरती,
तीखली तोड रा ढांण ताता।
हेरिया नहीं धर दूसरी होड रा,
महि मन पूरणा कोड माता।।1[…]

» Read more

शरणागत पंखी रै सारू मरणिया !!

महात्मा ईसरदासजी आपरी काल़जयी कृति ‘हाला-झाला रा कुंडलिया’ में लिखै कै “सिंह रा केश, नाग री मणि, वीरां रो शरणाई, सतवंती रा थण अर कृपण रो धन फखत उणां रै मरियां ईज दूजां रै हाथां पड़ै, जीवतां नीं। जे ऐ जीवता है ! अर कोई इणां री इण चीजा़ं रै हाथ घालै, तो घालणिये नै मरणो ईज पड़ै। उणां आ बात किणी अटकल़ पींजू डोढसौ री गत नीं लिखी बल्कि कानां सुणी अर आंख्यां देखी रै मेल़ सूं मांडी-

केहर केस भमंग मण, शरणाई सूहड़ांह।
सती पयोहर कृपण धन, पड़सी हाथ मूवांह।।[…]

» Read more

कूड़ लारै, धूड़!!

जोधपुर रै थल़वट इलाकै रो जुढियो गांम आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रह्यो है। इणी जुढिये में सोनथल़ी (एक धोरै रो नाम) माथै थल़वट री आराध्या देवी सैणीजी रो मढ(मंदिर) है–

धिन-धिन रै धोराह, वेदासधू विराजिया।
सकवी रह सोराह, सरण तिहारी सैणला।।

सैणीजी रै कारण ई रियासत काल़ में जुढियो प्रसिद्ध अर गजबंध गांम मानीजतो-

प्रथम शेरगढ परगनै, गजबंध जुढियो गांम।[…]

» Read more
1 20 21 22 23 24 114