देश भगती री जगमगती जोतः क्रांति रा जोरावर (पुस्तक समीक्षा)

(महान क्रांतिकारी केशरीसिंहजी बारठ री पुण्यतिथि माथै विशेष)
राजस्थानी भाषा रै साहित्यिक विगसाव सारु पद्य सिरजण सूं बती जरूरत गद्य रो गजरो गूंथण री है। आ बात आजरी युवा पीढी सूं घणी आपांरी पुराणी पीढी रा विद्वान सावल़सर जाणै। बै जाणै कै जितै तक आपांरी भाषा रो गद्य लेखन समृद्ध नीं होवैला जितै तक आपां भारतीय साहित्य रै समकालीन लेखन री समवड़ता नीं कर सकांला। इणी बात नैं दीठगत राखर कई विद्वानां कहाणी, निबंध अर उपन्यास लेखन कानी आपरी मेधा रो उपयोग करण अर गद्य भंडार भरण सारु ठावको काम कियो अर कर रैया है।[…]

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कविता की ताकत

मोरबी जहाँ से मैने इंजनीयरिंग करी थी उस पर बनाई हुई रचना । इस रचना के पीछे एक कहानी जुडी हुई है मेरा चार साल का इंजनीयरिंग छह साल तक लंबा हो गया और उस पर सेवन्थ सेमेस्टर में मेरे ए टी के.टी एक सबजेक्ट में आई। जिसकी वजह से एट्थ सेमेस्टर के बाद भी मुझे एक महिना और रुकना पडा। जब फेयरवेल के फंक्शन में मुझे किसी ने पूछा कि मोरबी के बारे में आपका क्या खयाल है तो यह रचना उसके जवाब में मैंने सुनाई यह कहकर कि हालात बदल जाते है तो खयालात अपने आप बदल जाते है। […]

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मत देख मिनख री रीत पंछीड़ा

मत देख मिनख री नीत पंछीड़ा, गीत रीत रा गायां जा!
आयां जा मन मेल़ू तूं, साचोड़ी देख सुणायां जा!!
आवै है ग्रहण आजादी पर, ऊंगाणा बैठा गादी पर।
गांधी री काती हाथां सूं, ऐ कलंक लगावै खादी पर।
वोटां पर जाल़ बिछायोड़ा, थिरचक है कुड़का ठायोड़ा।
इसड़ो ऐ नांखै देख चुग्गो, फस ज्यावै मानव डायोड़ा।
नुगरा बल़-छल़ में नामी है, हरमेस लूट रा हामी है।
कुर्सी री राखै देख निगै, ज्यूं-त्यूं ई राखै थामी है।[…]

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म्हारै देखतां-देखतां गमग्यो गांम!

नीं चंवरां में जाजम
नीं घेर घुमेर वड़लो!
नीं मन!
नीं मन री बातां!
करण री कोई ठावी ठौड़
फगत निगै आवै है-
झोड़ ई झोड़!
जिणरो नीं कोई निचोड़!
नीं निचोड़ काढणियो
तो पछै तोड़ कठै है?[…]

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🌷मित्रता – गजल🌷

है खांडै री धार मित्रता।
सबसूं उत्तम कार मित्रता!!
रथ हांकै नै पग धो देवै।
सँभल़ै डग -डग लार मित्रता!!
डिगतै नैं कांधो दे ढाबै।
निज भुज लेवै भार मित्रता!!
बढती -घटती नहीं चांद ज्यूं।
सुख-दुख में इकसार मित्रता!![…]

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नीं लागै अठै कोई तीज!

अजै तो नीं आई
आधुनिकता री आंधी!
ओ तो फगत दोटो है
आधुनिकता रो!
जिणमें ई आपांरी जड़ां
जोखमीजर उखड़गी!
तो पछै कीकर झालांला?
अरड़ाट देती वा आकरी आंधी!
आपांनैं तो इण दोटै ई
चाढ दिया टोरै!
भमा दिया भोगना!
नाख दी आंख्यां में धूड़
अर
कर दिया चितबगना

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कद ऊगेला थोर में हाथ ?

म्है जद-जद ई
करिया करतो चिड़बोथिया
टाबरपणै री भोल़प में
म्हारी बैनां सूं।
म्हारी आल़ रै पाण
जद टपकता हा
उणां री आंख्यां सूं
टप टप टप
आंसू मोतीड़ा बण।
उणां रै इण
आंसूड़ां माथै पसीज
म्हारी मा
कैया करती ही कै
तूं मत किया कर
गैलायां![…]

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देखो – गजल

बातां ज्यांरी स्याणी देखो।
भरी धूर्तता वाणी देखो!!
दूजां दुख में होय दूबल़ा।
कैवै काग कहाणी देखो!!
जनता नैं तो कोई खूंटलै।
समझ गाडरी लाणी देखो!!
ठग्गां घर नीं रीत दैण री।
वुस्त बठै तो जाणी देखो!!

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सखी! अमीणो साहिबो

मित्रों जब भी कविता की बात होती है तो एक बात जरूर कहना चाहता हूं कि कालजयी कविता वह होती है जो आज भी हमैं नित्य नवीन लगे।
बरसों पहले जोधपुर नरेश महाराजा मानसिंह के दरबारी कविराजा बांकीदास जी आसिया ने “सूर छत्तीसी” लिखी थी। वीर रस से लबरेज इन दोहों में कवि ने एक अमर पंक्ति का प्रयोग कर सात आठ दोहै रचे थे। पंक्ति थी “सखी! अमीणो साहिबो”
यह पंक्ति इतनी शानदार है कि यह आज के कवियों को भी प्रेरणा देती है। इसी पंक्ति से प्रेरणा लेकर आज के चारण कवियों ने कुछ दोहों के सृजन का प्रयास किया है। तो प्रस्तुत है बांकीदासजी आसिया के दोहों के साथ साथ कवि नरपत आसिया “वैतालिक” और गिरधरदान जी रतनू “दासोडी” द्वारा लिखे दोहै।[…]

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🌷रामजी – गजल🌷

मत दे इतरा धता रामजी!
मिनख मिल़ै तो बता रामजी!!
लोकतंत्र में लूखो, भूखो!
जन तो खावै खता रामजी!!
मिनख !, मिनख नै जाति पूछै!
जूत चेपनै सता रामजी!!
वोट मांगिया पैर पकड़नै!
अब तो मालक छता रामजी!![…]

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