आखिर राख हुवै फुररै
भजरै रघुनाथ मनां दिन रात रु
कूड़ कपट्ट सदा तजरै।
लजरै बकवाद विवाद करै नित
नेक नहीं तुझ ओ कजरै।
सजरै परमारथ को करबा धुर
छांनरु नेह तणी छजरै।
नजरै कवि गीध करै जग रु मग
ओट गहै हरि की धजरै।।१
कररै हरि जाप रिदै निस वासर
आसर एक थिरू घररै।
धररै डग नीत तणी धर ऊपर
नाय अनीतन में फिररै।
दुररै कर धूरत मूरत को झट
भाव भला घट में भररै।
नररै सुण गीध कहै सत सांभल़
आखिर राख हुवै फुररै।।२[…]