भव-पाश-विमोचन त्रिपुरारी-स्तवन

।।मत्तगयंद सवैया।।
मस्तक बाल-मयंक लसै, शितिकंठ भुजंग-गले विषधारी।
अंग भभूत मसान मले, अवधूत दिगंबर स्वैरविहारी।
भूत-पिशाच-गणादि रखे संग, भेस अमंगल मंगलकारी।
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।१।।
अद्भुत रूप अनूप, तुषार समान सुगौर, छबि मनहारी।
पाणि-पिनाक लिए डमरू, शिव, शंकर, सांब सदा सुखकारी।
शृंग उतुंग हिमालय आसन, गंग-तरंग जटा सिर धारी।
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।२।।
भक्त-अभीष्ट-प्रदायक! भैरव! भूतपति! भय-भंजनकारी!
श्री गिरिजावर! शंकर! हे हर! सज्जन-संतन के सुखकारी!
वेद-विनन्दित! ताण्डव-पंडित! सर्प-सुमण्डित! श्री अविकारी!
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।३।।
देत दया करि बुद्धि विलक्षण पुत्र गणेश समान, पुरारी!
बांटत शौर्य षडानन सो, दिन-रैन भजे शिव जे नर-नारी!
मात उमा निज हाथ परोसति शंकर सेवक को शुचि थारी!
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।४।।
मूषक को न भुजंग भखै पुनि, व्यालहि मोर करै रखवारी।
बाघ ‘रु बैल बिसारि पुरातन बैर, फिरैं रखि नेह अपारी।
शंकरजू सदभाव बढ़ावहु, पुत्र कलत्र पिता महतारी!
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।५।।
दीन अकिंचन के दुःख-भंजक, आशु-कृपाकर आपदहारी!
आठहु सिद्धि नवोनिधि देत; चढ़ात जे बेल को पात ‘रु वारी!
तक्षक-काल कहा करि है, जिन के विभु रक्षक शंभु! स्मरारी!
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।६।।
दानव, मानव, किन्नर, चारण, नाग, ऋषि, मुनि काननचारी।
जंगम, सिद्ध, कपालिक ध्यावत, औघड़, संत अघोर अपारी।
भक्तन में कछू भेद न राखत, रीझत भाव लखि अविकारी!
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।७।।
घोर घटा-घन, दुंदुभि बाजत, ताक धिनाक तिता तिक-धा री।
नारद, शारद, बीन-विशारद, छेड़त तान मनोहर प्यारी।
ताण्डव नृत्य करै प्रलयंकर, डाक-डमाल हुवै रव भारी।
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।८।।
नाथ निरंजन! अंधक-भंजन! गंजन पातक-पुंज पहारी!
संग रहैं जिनके निशि-वासर, देत निशंक सदाशिव तारी।
रंक कुं राव करै पल में, शिव मेटि कुअंक करै शुभकारी!
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।९।।
श्री नटराज! नमामि प्रभो! कवि किंकर मैं मति मूढ़ अनारी!
मत्तगयंद के बंध कहै “नरपत्त”, सुनौ शिव दोष बिसारी!
कोविद काव्य-कलाविद! शंकर! आपहि पारख के अधिकारी!
पाहि! प्रभो! भव-पाश-विमोचन! त्राहि! त्रिलोचन हे त्रिपुरारी।।१०।।
~~©डा. नरपत आशिया “वैतालिक”
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