सखि! घर आएँगे चितचोर

आँगन द्वारे कागा बोले, थिरक उठा मन-मोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
खड़ी अटरिया राह निहारूँ, कब घर आवै कंथ?
मुख-थाली में नैन-दीप धर, तकूँ पिया का पंथ!
बंद पलक कर रखूँ सजन को, कर काजल की कोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
सजनी बंदनवार सजाऊँ, कर कर जतन अनंत!
होना है अब विरह व्यथा का, इक झटके में अंत!
पियागमन पर छम छम दौड़ूँ, करती झाँझर शोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
चातक ज्यूँ स्वाति जल चाहत, घन को जैसे मोर!
चकवा को रजनी नहीं भावै, सदा सुहावत भोर!
उनके रंग रहूँ यूँ राची, चंद्र तके ज्यूँ चकोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
पतझड़ के दिन बीते सजनी, मन में लगा बसंत!
द्वार पे उनकी ही दस्तक है, हर्षित दसों दिगंत!
घड़ी मिलन की निकट खड़ी है, मन है भाव विभोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
एक झलक उनकी दिख जाए, उमड़ै प्रीत अनंत!
जीवन की मुरझाई कलियाँ, सब होंगी जीवंत!
भटक रही थी आस मिलन की, आज मिली है ठौर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
अरुण अधर पर अधर धरेंगे, आज सखी मम कंथ!
उठे खिलखिला शगुन देख यह, दाड़िम से मम दंत!
अति आनंद से तड़क रही है, अँगिया की मम डोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
नैनों से संवाद करेंगे, अधरों को रख मौन!
दोनों मिल इक हो जाएँगे, जुदा करेगा कौन?
हम दोनों अब एक रहेंगे, ज्यों ईसर-गणगौर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
खटरस व्यंजन आज परोसूँ, राँधा जो कर खाँत!
तन-हलवा, मन घी की धारा, व्यंजन विध विध भाँत!
सखि! खिलाऊँगी निज कर से, दे दे मुख में कौर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
कुछ शब्दों में कैसे बाँधूँ, गुणनिधि पिय का ग्रंथ!
पदचिह्नों पर चलूँ मैं उनके, पकड़ प्रेम का पंथ!
निश दिन उनको रहूँ रीझाती, “नरपत” करके निहोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
~~©डा नरपत आशिया “वैतालिक”
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