गये बिसारी गिरधारी – त्रिभंगी छंद – स्व. देवीदान देथा (बाबीया कच्छ)

।।छंद त्रिभंगी।।
ब्रज की सब बाला, रूप रसाला, बहुत बिहाला, बिन बाला,
जागी तन ज्वाला, बिपत बिसाला, दिन दयाला, नंद लाला।
आए नहि आला, कृष्ण कृपाला, बंसीवाला, बनवारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।१[…]

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आवड़ वंदना – जय सिंह सिंढायच मण्डा (राजसमन्द)

।।छंद रोमकंद।।
कलिकाल महाविकराल़ हल़ाहल़,धीर कुजोर बढै जवनां।
भव भार उतारण दास उबारण, कारण याद करे वचना।
बिसरी नहि अंब दयाल़ अजू, गण चारण ने वर आप दयो।
जय मावड़ आवड़ बीसभुजा बड, लाखिय लोवड़वाल़ जयो।
जिय माड धिराणिय माय जयो।।१[…]

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श्री डूंगरराय स्तवन – कवि चाळकदान जी रतनू (मोड़ी)

।।छन्द – नाराच।।
अच्छे रचे जु आवड़ा, अस्थान वे अखण्डळा।
नचे जचे सुनाचता, मचे सुरा समण्डळा।
जगत्त मात जां जुरीय, जोगणी सुजोगरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।
जी डूंगरेच डोकरी।।

नभस्सु माय न्रम्मला, सुभस्सु जाम सत्तमी।
रमत्त रास ईसरी, जमत्त मात जक्तमी।
घमंक पाय घूघरा, धराधर धूजै धरी।
रमंत……………………………।।[…]

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पींगल़शी भाई मेघाणंदभाई गढवी (लीला) – कंठ कहेणी अने कलम नो त्रिवेणी संगम।

પીંગળશીભાઇ.મેધાણંદભાઇ.ગઢવી (લીલા) – કંઠ, કહેણી અને કલમો ત્રિવેણી સંગમ

પીંગળશીભાઈ ગઢવી સુપ્રસિદ્ધ કવિ, લેખક અને કલાકાર – કંઠ, કહેણી અને કલમ જેનામાં ત્રિવેણી સંગમ થઈને વહે છે, જેણે પંદર-સોગ કવિતા વાર્તાના ગ્રંથોની ગુજરાતને ભેટ આપી છે તેવા શ્રી પીંગળશીભાઈનો જન્મ વિ. સં. ૧૯૭૦ અને ઇ. સ. ૧૯૧૪ના રોજ જુલાઈ માસમાં પોરબંદર પાસેના છત્રાવા ગાર્મ ચારણ કુળની લીલા શાખામાં થયો. પિતાનું નામ મેધાણંદ, અને માતાનું નામ શેણબાઈમાં, તેમનાં લગ્નના બાલુભાઈ ઉઢાસનાં સુપુત્રી જીબાબેન સાથે થયાં.મેધાણંદ ગઢવીના પનોતા અને પ્રતિભાશાળી બે પુત્રો જેમણે પિતાનો લોકસાહિત્યનો વારસો જાળવ્યો, એટલું જ નહિ પણ દીપાવ્યો છે. આ બે પુત્રોમાં મોટા સ્વ. મેરૂભા ગઢવી અને નાના પીંગળશીભાઈ ગઢવી.

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रांमदेव जी रा दूहा – उदयराज जी उज्जवल

तुंवर मो तारेह,  आंख सुधारै ईसवर।
थेटू श्रण थारेह,  रैणव वसिया रांमदै।।१।।
तै दीधा कर तोय,  पीळा आखा पातसा।
सिंढायच कुळ सोय, आदू शरणै आपरै।।२।।
परी मटाडै पीड,  दे जोती आंखां दुरस।
भांणव पडतां भीड,  आव मदत अजमाल रा।।३।।
तुं साचौ किरतार,  दुःख मेटण प्रगट्यौ दुनि।
वीगरी कर वार,  अबखी पुळ अजमाल रा।।४।।
वीदग बारंबार,  करुणानिधि वीणत करै।
तार किसन अवतार,  मात पिता तु रामदे।।५।।[…]

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भजन महिमा – जनकवि ऊमरदान लाल़स

।।छंद मधुभार।।
अथ ओमकार। अक्षर उचार।
निस दिवस नाम। रट राम राम।।१
द्वै सुलभदीप। श्रद्धा समीप।
रुचि ह्वै सु राख। दुहु दिव्य दाख।।२
मम इष्ट मिष्ट। आदर अभिष्ट।
महिमा मनोग्य। जप तपन जोग्य।।३
माधूर्य मेह। आसार एह।
सदगुरु समान। जीवन जहान।।४
चित प्रथम चेत। उल्लू अचेत।
यह तन अयान। न स्थिर निदांन।।५[…]

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हनुमान अष्टक – जनकवि ऊमरदान लालस

अंजनी ग्रभ आयौ, सुमन सुहायौ, गुनि गन गायौ, ग्यान गती।
पावन सुत पूरौ, दूषण दूरौ, समहर सूरौ, जन्म जती।
करनी सुभकारी, धर जस धारी, भव भयहारी, भीम भुजा।
ले लाल लंगोटी, काछ कछोटी, धारन मोटी, लाल धजा।।१[…]

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गोड़ावण गरिमा – कवि मोहन सिंह रतनू

।।छंद नाराच।।
वदे महीन मृदूबाक, काग ज्युं न कूक हे
बैसाख जेठ मास बीच ,लूर मोर सा लहे
सणंक सो करे सुवाज ,भादवे लुभावणी
जहो गुडोण जागरुक मारवाड तू मणी…..१[…]

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श्री रांमदे सतक – उदयराजजी उज्जवल कृत

आय वस्यौ अजमाल, कासमीर मारूधरा।
भला चौधरी भाल़, मलीनाथ रा राज में।।१
कासमीर में छोड़िया, जंह गाडा अजमाल।
गाडाथल़ वाजै जगा, जाणै सगल़ा हाल।।२
पुत्र कामना पूर, जद वापी अजमाल रै।
झलियौ नेम जरूर, दरसण करवा द्वारका।।३
साधू रै उपदेस, कीधी सेवा किसन री,
पुत्र दियौ परमेस, वीरमदे रै नांम रौ।४
अरज करी अजमाल, कांनूड़ौ जनमै कंवर।
देखै भाव दयाल़, प्रगट्या उण घर पाल़णै।।५[…]

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कागा बिच डेरा किया, जागा अबखी जाय

सिद्धां औरूं कवेसरां, जे कोई जाणै विद्ध।
कपड़ां में क्यूं ही नहीं, सबदां में हिज सिद्ध।।

कविश्रेष्ठ केसवदासजी गाडण आ कितरी सटीक कैयी है कै सिद्ध अर कवि री ओल़खाण भड़कीलै कपड़ां सूं नीं बल्कि उणरी गिरा गरिमा सूं हुवै। आ बात शुभकरणजी देवल रै व्यक्तित्व माथै खरी उतरै। साधारण पोशाक यानी ऊंची साधारण धोती,मोटी खाकी पाघ,अर साधारण ईज मोजड़ी। ना तड़क ना भड़क पण आखरां में कड़क बखाणणजोग।[…]

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