आहुवा पच्चिसी – कवि हिम्मत सिंह उज्ज्वल (भारोड़ी)

जबत करी जागीर, जुलमी बण जोधाणपत।
व्रण चारण रा वीर, जबरा धरणे जूंझिया।।1।।

रचियोड़ी तारीख, आजादी भारत तणी।
सत्याग्रह री सीख, जग ने दीधी चारणां।।2।।

अनमी करग्या नाम, अड़ग्या आहुवे अनड़।
करग्या जोगा काम, मरग्या हठ करग्या मरद।।3।।

लोही हंदा लेख, लड़िया बिण लिखिया सुभट।
रगत तणी इल़ रेख, खेंची खुद रा खड़ग सूं।।4।।[…]

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बैशक दीजो बोट – कवि मोहनसिंह रतनू

दिल मे चिंता दैश री,मन मे हिंद मठोठ।
भारत री सोचे भली, बीण ने दीजो बोट।।

कुटलाई जी मे करे,खल जिण रे दिल खोट।
मोहन कहे दीजो मति,बां मिनखां ने बोट।।

काला कपटी कूडछा,ठाला अनपढ ठोठ।
घर भरवाला क्रत घणी, दैणो कदैन बोट।।[…]

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नाहर जसौल नमस्कारणा – कवि शक्तिदान जी कविया (बिराई)

चावी बातां चारणां, आप लिखी अणमोल।
कुळ महेच नाहर कमध, जलम्यो भलां जसोल।।

।।गीत जांगडौ।।
सूरज वंसी रावळ सळखाणी, मलीनाथ मालाणी।
मेहळ भगतां सिरै प्रंमाणी, रंग रूपांदे राणी।
माल तणो जगमाल महाभड़, वडम अनड़ रणबंको।।
अपहड़ बिजड़ हथौ अड़पायत, सात्रव दळ पड़ संको।।

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કંઠ કહેણીના મશાલચી : મેરૂભા ગઢવી (લીલા)

મેઘાવી કંઠના ગાયક શ્રી મેરૂભા ગઢવીનો જન્મ સૌરાષ્ટ્રમાં લોકવાર્તાઓ દ્વારા લોકસાહિત્યના સંસ્કાર ચેતાવનારા છત્રાવા ગામના લોકસાહિત્યના આરાધક પિતા મેઘાણંદ ગઢવી લીલા શાખાના ચારણને ખોરડે માતા શેણીબાઈની કૂખે સંવત ૧૯૬૨ના ફાગણ સુદ ૧૪ ના રોજ થયો. ગામડા ગામની અભણ માતાએ ગળથુથીમાં જ ખાનદાની, સમાજસેવા અને ભક્તિના સંસ્કારો બાળકમાં રેડ્યા. ચાર ગુજરાતીનું અક્ષરજ્ઞાન પ્રાપ્ત કરી બાળક મેરૂભાએ શાળાને સલામ કરી અને પછી આછી-પાતળી ખેતીમાં જોડાયા. પિતાની વાર્તા કથની મુગ્ધભાવે અને અતૃપ્ત હૈયે માણતા મેરૂભા લોકસાહિત્યના સંસ્કારોના રંગે રંગાઈ ગયા.[…]

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वंश-भास्कर अपूर्ण क्यों रह गया? – डॉ. ओंकारनाथ चतुर्वेदी

वंश-भास्कर तो महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण की अक्षय कीर्ति का आधार स्तम्भ है, ग्रन्थ रचना के समय ही कवि की ख्याति यातायात एवं संचार के अभाव में भी दूर दूर तक फैल चुकी थी। सूर्यमल्ल एवं कर्नल टॉड विगत शताब्दी के महान इतिहासकार रहें हैं। कर्नल टॉड के साथ राजकीय प्रतिष्ठा एवं शासन का प्रभाव था, जबकि सूर्यमल्ल के पास थी अपनी असाधारण लोकोसर प्रतिभा जिसने उन्हें प्रतिष्ठित किया था। “वंश-भास्कर” के प्रकाशन के पूर्व ही इसकी ख्याति दूर दूर तक फैल चुकी थी।[…]

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