स्वामी गणेशपुरी कृत सूर्यमल्ल स्तुति

।।भाषा गुरु मिश्रण चारण सूर्यमल्ल स्तुति।।
।।मनोहर छंद।।
मित्र सनमान, सत्यवान, स्वर ज्ञान मध्य,
इक्क न समान, कहौं का सम करेरो में?।।
प्राकृत, पिसाची, सौरसेनि, अपभ्रंस पूर्न,
होसु हैं न, ह्वैं न हर हायन लौं हेरो मैं।।
देख्यो मुहि दीन विद्या दीन्ह त्यौं विवेक दीन्ह,
दिग्घ बर दीन्ह, घन आनंद को घेरो मैं।।
बारन बदन बर चारन बरन बीच,
तारन तरन रविमल्ल चर्न चेरो मैं।। […]

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प्रेमहि के नहिं जाति रु पांतिहु – चाळकदान रतनू ‘मोड़ी चारणान’

प्रेमहि के नहिं जाति रु पांतिहु, प्रेमहि के दिन राति न पेखो।
प्रेमहि के नहिं जंत्र रु मंत्रपि, प्रेमहि के नहिं तंत्र परेखो।
प्रेमहि के नहिं रंग रु रूपहि, प्रेम के रंक न भूप नरेखो।
प्रेमहि को अद्भुत्त प्रकार स लोह रु पारस सों लख लेखो।। […]

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चारण का वाक् चातुर्य – ठा. नाहरसिंह जसोल संकलित पुस्तक “चारणौं री बातां” से

कच्छ की राजधानी भुज के राजमहलों में कच्छ के राव गौडजी और ओखा का राणा तेजोजी चौपड़ खेल रहे हैं। खेल पूरे यौवनावस्था में हिलोरें ले रहा है। कभी कच्छ के राव के पौ बारह पच्चीस तो कभी, ओखा के राणा के। दाव पर दाव और गोटी पर गोटी उड़ रही थी। उस समय मांडवी तालुका के काठड़ा गांव का वारू चारण हिंगलाजदान सभा कक्ष में प्रवेश करता है। वारू चारण को गौडजी बावा का मरजीदान होने से राजदरबार में आने जाने की छूट की थी। उसने गौडजी को अभिवादन करते हुए अपना स्थान ग्रहण किया। थोड़ी देर में खेल […]

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काव्यमय कुमकुम पत्रिका

कवि नरपत आसिया “वैतालिक” का विवाह ११ दिसंबर १९९९ को सांबरडा गुजरात में सुखदेव सिंह जी रामसिंह जी गढवी की सुपुत्री लता(चेतना) से हुआ। आपका गांव खाण और पारिवारिक नाम नरेश है। पिताजी का नाम आवडदानजी है। नरपत जी चाहते थे कि उनकी शादी की कुमकुम पत्री काव्यमय हो इसी आशय से उन्होंने अपने नाना श्री अजयदान जी लखदान जी रोहडिया मलावा जो स्वयं अपने जमाने के एक सम्मानित कवि रहे हैं  आग्रह किया कि वे उनकी शादी की कुमकुम पत्रिका कविता में बनाकर दे। उनके इस अनुरोध पर नानाजी ने पांच सवैया बनाकर भेजे जो इस प्रकार से हैं। यह […]

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श्री करनी विजय स्तुति – श्री जोगीदान जी कविया सेवापुरा

।।छन्द त्रोटक।।

करणी तव पुत्र प्रणाम करै
धरि मस्तक पावन ध्यान धरै
कलिकाल महाविकराल समै
बिन आश्रय हा तव बाल भ्रमै।१।

हम छोड़ चुके अब इष्ट हहा,
रिपु घोर अरष्टि अनिष्ट रहा।
पथ भ्रष्ट हुये जग माँहि फिरैं
घन आपत्ति के नभ भाग्य घिरैं।२। […]

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आवड़ वन्दना – जोगीदान जी कविया सेवापुरा

।।छन्द नाराच।।
सुचित्त नित्त प्रत्ति व्है शिवा सकत्ति सम्भरै
सुधर्म कर्म ज्ञान ध्यान मर्म खोजते फिरै
तमाम रात दीह जाम नाम ले बितात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।१।

बहन्न सात एक साथ व्योम पाथ ऊतरी
अछेह नेह देह मामड़ा सुगेह में धरी
कथा अशेष देश देश में विशेष गात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।२। […]

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घर कामिनी काग उडावती है

स्वर्गीय कवि शुभकरण सिंह जी उज्जवल (ग्राम भारोडी) पुलिस सेवा में थे। भीलवाडा में पोस्टिंग के वक्त वहाँ के एक सख्त एस पी साहब ने छुट्टियों पर प्रतिबंध लगा दिया। शुभकरण जी को घर जाना बहुत जरूरी था। उन्हें कहीं से पता चला कि एस पी साहब बड़े साहित्य रसिक हैं, तो उन्होंने साहित्यिक शैली में एस पी साहब तक छुट्टी की अर्जी पहुँचाई।

एस पी साहब ने तत्काल छुट्टी सेंक्शन कर दी। वह कविता आप सभी की नजर… […]

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पद्मश्री भक्त कवि दुला भाया काग

दुला भाया काग (२५ नवम्बर १९०२ – २२ फ़रवरी १९७७) प्रसिद्ध कवि, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका जन्म सौराष्ट्र-गुजरात के महुवा के निकटवर्ती गाँव मजदार में हुआ था जो अब कागधाम के नाम से जाना जाता है। दुला भाया काग ने केवल पांचवी कक्षा तक पढाई करी तत्पश्चात पशुपालन में अपने परिवार का हाथ बंटाने में लग गए। उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी हिस्सा लिया। उन्होंने अपनी जमीन विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन में दान दे दी। उनके द्वारा रचित “कागवाणी” 9 खंडो में प्रकाशित वृहत ग्रन्थ है जिसमे भक्ति गीत, रामायण तथा महाभारत के वृत्तांत और गांधीजी […]

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