म्हांनै तो अपणास चाहीजै!!
बीजी वुस्तां सूं म्हांरै की लैणो,
म्हांनै तो अपणास चाहीजै।
अंतस में हद घोर अंधारो,
दूर करण प्रकाश चाहीजै!![…]
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बीजी वुस्तां सूं म्हांरै की लैणो,
म्हांनै तो अपणास चाहीजै।
अंतस में हद घोर अंधारो,
दूर करण प्रकाश चाहीजै!![…]
जोधपुर राव मालदेवजी भायां नै दबावण री नीत सूं मेड़ता रै राव जयमलजी नै घणो दुख दियो। जयमलजी ई वीर अर भक्त हृदय राजपूत हा, उणां सदैव इण आतंक रै डंक नै अबीह होय झालियो।
मेड़ता माथै राव मालदेवजी आक्रमण कियो, उण बखत जयमलजी रा भाई चांदाजी मेड़तिया ई मालदेवजी रै साथै हा। उणां, उण बखत किनारो ले लियो जिणसूं मालदेवजी नै थोड़ो शक होयो। मेड़तिया ऐड़ा भिड़िया कै जोधपुर रा पग छूटग्या। नाठतां आपरो नगारो ई पांतरग्या। जिणनै जयमलजी सनमान सैती आपरै भांभी साथै लारै सूं पूगतो कियो। गांम लांबिया कनै जावतां उण भांभी रै मन में आई कै एकर नगारै माथै डाको देय देखूं तो सरी कै बाजै कैड़ोक है!![…]
सरवड़ी बोगसां रो गांम। साहित्य अर संस्कृति रो सुभग मेऴ।
एक सूं एक टणकेल अर जबरेल कवियां री जनम-भोम सरवड़ी कविराजा बांकीदासजी आसिया अर शब्द-मनीषी सीतारामजी लाल़स रो नानाणो। जैड़ो पीवै पाणी ! वैड़ी बोलै वाणी अर जैड़ो खावै अन्न ! वैड़ो हुवै मन्न!! शायद ओ ईज कारण रैयो होवैला कै ऐ दोनूं मनीषी राजस्थानी साहित्य रा कीरतथंभ हा। होणा ई हा ! क्यूंकै नर नाणाणै अर धी दादाणै रो कैताणो आदू!! पछै ‘मामा ज्यारां मारका, भूंडा किम भाणेज!!'[…]
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एकबार खेतसिंह कोई घरेलु काम-काज रै मिस जोधपुर गया। आपरो ऊंठ निमाज हवेली में बांध सामान-सट्टो खरीदण गया अर, पाछा आय हवेली रातवासो लियो। दिनूंगै उठिया तो सऴवऴ सुणीजी कै हवेली मानसिंहजी घेराय दी है।
ठाकरां रो साथ भेऴो होयो अर मुकाबलो करण री तेवड़ी। उणां मांय सूं किणी खेतसिंहजी नै कैयो कै-
“खेतसिंहजी ! थे अणखाधी रा क्यूं मरो !! थे थांरै ऊंठ सवार होय जावो परा !! दरबार रो कोप ठाकरां माथै है दूजै किणी माथै नीं सो थे क्यूं उडतो तीर गऴै में लेवो?”[…]
आपणो ओ संसार बादळां री फिरत-घिरत री छाया रै मानींद कद किण सूं छूट जाय, इणरो ठाह कोई नैं ई पण नीं है। देही रै अवसाण पछै पाछो कोई देही मिलसी का नीं इण बात रो ई कोई नैं ठाह नीं है पण ओ जरूर ठाह है कै जको जलम्यो है उण सारू मरणो लाजमी है। मौत अटल साच है, इणमें कोई मीन-मेख नीं है। हां! मौत रा गेला घणा है। कद अर कुणसै बैवै कोई नैं मरणो पड़ै ओ करमां री खेती पर टिकेड़ो है। करमां सारू रिख-मुनियां लारला कई जलमां रा खाता खंगाळण री बातां मांडी है। इण जलम रो ई नीं कई जलमां रो पाप अर पुन्न जीवात्मा रै साथै संचरण करै। आ बात कोरी मानखै पर नीं वरन समूची जीयाजूणा पर लागू हुवै। हां! मिनखा देही री आ बदताई है कै इण देही मांय आपां आछा अर बुरा करमां री जाणकारी ले सकां।[…]
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।।छन्द – त्रिभंगी।।
धारै धक धोळा चंगा चोळा, बदळै खोळा नित बोळा।
जन-धन सूं झोळा भरै सबोळा, करै ठिठोळा ठग भोळा।
रुळपट कर रोळा करै किळोळा,कुरसी दोळा फिर केता।
मन रा ज मलीणा है लजहीणा, नाग सपीणा ऐ नेता।।1।।[…]
।।महाराणा प्रताप नै।।
।।छप्पय।।
मिहिर ऊग मा’राण, तिमिर दल़ अकबर तोड़्यो।
करां झाल किरपांण, माण मानै रो मोड़यो।
वन जमियो वनराव, भाव आजादी भूखो।
नह डिगियो नख हेक, लियो पण भोजन लूखो।
साहस रो रूप भूपां सिरै, मुगट मेवाड़ी मोहणो।
कीरती कल़श चढियो कल़ू, स्वाभिमान भड़ सोहणो।।1[…]
रावल़ मूल़राज अर रतनसी रै साको करियां पछै जैसल़मेर रो गढ घणा दिन सोग में डूब्योड़ो सूनो पड़ियो रह्यो।
जैसल़मेर जैड़ो गढ अर सूनो!! आ बात जद महेवै रै कुंवर जगमालजी मालावत नै ठाह पड़ी तो उणां आपरा आदमी अर सीधै रा सराजाम लेय जैसल़मेर कानी जावण रो मतो कियो।
उण दिनां काल़ काढण नै सिरूवै रा रतनू चंद्रभांणजी ई महेवै रैता, ऐड़ी सल़वल़ सुणी तो चंद्रभांणजी आपरै दादै आसरावजी नै समाचार कराया कै राठौड़ जैसल़मेर रो गढ दाबणो चावै!![…]
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परे रहेंगे मकान व दुकान सारी यहां,
सावधानी मनमानी काम नहीं आएगी।
कारखाने व खजाने जड़े ही रहेंगे मीत,
माया संची जो तो तेरे अर्थ कछु नाएगी।
खड़े ही रहेंगे अश्व रथ गज शाला बीच,
आ काया भाई उभै बांसन में समाएगी।
अच्छे काम किए है तो बात एक सत्य मनो,
कछु ना रहेगो गीध याद रह जाएगी!!
संस्कृति वह आधारशिला है जिसके आश्रय से जाति, समाज एवं देष का विशाल भव्य प्रासाद निर्मित होता है। निरंतर प्रगतिशील मानव-जीवन प्रकृति तथा समाज के जिन-जिन असंख्य प्रभावों एवं संस्कारों से प्रभावित होता रहता है, उन सबके सामूहिक रूप को हम संस्कृति कहते हैं। मानव का प्रत्येक विचार तथा प्रत्येक कृति संस्कृति नहीं है पर जिन कार्यों से किसी देष विशेष के समक्ष समाज पर कोई अमिट छाप पड़े, वही स्थाई प्रभाव संस्कृति है।[…]
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