जवानां
जीवण असली जंग जवानां,
जंग जुट्यां ही रंग जवानां।
रण नैं छोडणियां निरभागी,
कोई न वांरै संग जवानां।
जीवटता नैं सौ जग पूजै,
आंकस राखो अंग जवानां।
खाडा, पाथर, काँटा, आंटा,
आं सूं डरै अपंग जवानां।[…]
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जीवण असली जंग जवानां,
जंग जुट्यां ही रंग जवानां।
रण नैं छोडणियां निरभागी,
कोई न वांरै संग जवानां।
जीवटता नैं सौ जग पूजै,
आंकस राखो अंग जवानां।
खाडा, पाथर, काँटा, आंटा,
आं सूं डरै अपंग जवानां।[…]
मत दे इतरा धता रामजी!
मिनख मिल़ै तो बता रामजी!!
लोकतंत्र में लूखो, भूखो!
जन तो खावै खता रामजी!!
मिनख !, मिनख नै जाति पूछै!
जूत चेपनै सता रामजी!!
वोट मांगिया पैर पकड़नै!
अब तो मालक छता रामजी!![…]
तूं तो ग्यो परदेस दीकरा।
सूनो करग्यो नेस दीकरा।।
कदै आय पाती विलमाती।
अब बदल़्यो परिवेस दीकरा।।
गया ठामडा भाज दीकरा!
रांधूं कीकर आज दीकरा!
छाछ मांगनै करूं राबड़ी
नहीं घरां पण नाज दीकरा!
घर रो दारमदार दीकरी।
म्हारो सुक्रत कार दीकरी।।
तुलसी आंगणद्वार दीकरी!
पूजूं बारंबार दीकरी!
आँगण में अवतार दीकरी।
म्हारो सब संसार दीकरी।
बैठी घर रे बार डोकरी।
किणनें रही निहार डोकरी।।
थाकी बैठी आज डोकरी।
राखी घर री लाज डोकरी।।
हाथां पकड़्यो भाल डोकरी।
मोडा खाग्या माल डोकरी।।[…]
खल़ पर खीजै खार कर, खय करवा खुंखार।
भय हरणी रण रंजणी, तनें नमन तलवार।।१
अशरणशरणी अंबिका, हुई सदा रह हाथ।
रे!रणचंडी रीझजै, मनसुध नामूं माथ।।२
धावड बण बिच ध्रागडै, सूरां रखै संभाल़।
रणचंडी! खंडी खल़ां, , करूं नमन किरमाल़।।३[…]
डग-डग माथै खौफ डगर में,
नागां रो उतपात नगर में।
जिणनै भूल चैन सूं जील्यूं,
(क्यूँ) बात बा ही पूछै बर-बर में।
स्याळ्यां परख्यो जद सूरापण,
नीलगाय रो नाम निडर में।
श्रद्धा, स्नेह न भाव चावना,
कोरी फुलमाळावां कर में।
जब हम भारतीय साहित्य के मनीषी कवियों को पढते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे भारतीय वाड्मय में कवियों को जो सम्मान मिला वह अपने आप में अद्भुत व वरेण्य है। हमारे कवि, आदि कवि, कवि भूषण, कवि श्रेष्ठ, कविराज आदि अलंकरणों से आभूषित हैं लेकिन जब हम इसी वाड्मय के अंर्तगत राजस्थानी साहित्य को पढते हैं तो पाते हैं कि हमारे मध्यकालीन कवि ईशरदासजी बारठ को जो आदर हमारे राजस्थानी साहित्य प्रेमियों ने दिया वो स्तुत्य है। […]
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प्रेम को नेम निभाय अलौकिक,
नेम सों प्रेम सिखावती माता।
त्याग हुते अनुराग को सींचत,
त्याग पे भाग सरावती माता।
जीवन जंग को ढंग से जीत के,
नीत की रीत निभावती माता।
भाग बड़े गजराज सपूत के,
कंठ लगा दुलरावती माता।।1।।
।।चारण उत्तम चीज।।
उत्तम कुल़ देख्यो अवन, चारण धारण चाय।
सगत हींगल़ा सांपरत, सदन प्रगट सुरराय।।1
करणी जन कलियाण कज, सरब हरण संताप।
चंडी जद घर चारणां, आई आवड़ आप।।2
पर्यावरण पशु प्रेम पुनी, जात सरब सम जाण।
भरण भाव प्रगटी भली, कुल़ चारण किनियाण।।3[…]