राखड़ी रो नेग !
राखड़ी
बांधणियै
जद जद ई
किणी रै बांधी है!
तो एक सुखद अहसास
होयो मन में !
पनपियो है भाव द्रढता रो
एक अदीठ डर सूं
भिड़ण री, बचण री
दीसी है जुगत
फगत राखड़ी रै धागै रै पाण
पनपियो है आपाण[…]
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राखड़ी
बांधणियै
जद जद ई
किणी रै बांधी है!
तो एक सुखद अहसास
होयो मन में !
पनपियो है भाव द्रढता रो
एक अदीठ डर सूं
भिड़ण री, बचण री
दीसी है जुगत
फगत राखड़ी रै धागै रै पाण
पनपियो है आपाण[…]
अबार रै कवियां री कलम में कितरी ताकत है? इणरै अनुमान रो दाखलो अजै सुणण में नीं आयो पण आपांरी आगली अर इणां सूं पैलड़ी पीढी रै कवियां री कलम में कितरी ताकत ही इणरा फगत तीन दाखला आपनै देय रैयो हूं [1]महाकवि पृथ्वीराजजी राठौड ‘पीथल’, [2]कवि भूषण सूर्यमल्लजी मीसण, [3]कवि पुंगव केशरीसिंहजी बारठ री वाणी रै पाणी सूं आप परिचित हो – […]
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(महान क्रांतिकारी केशरीसिंहजी बारठ री पुण्यतिथि माथै विशेष)
राजस्थानी भाषा रै साहित्यिक विगसाव सारु पद्य सिरजण सूं बती जरूरत गद्य रो गजरो गूंथण री है। आ बात आजरी युवा पीढी सूं घणी आपांरी पुराणी पीढी रा विद्वान सावल़सर जाणै। बै जाणै कै जितै तक आपांरी भाषा रो गद्य लेखन समृद्ध नीं होवैला जितै तक आपां भारतीय साहित्य रै समकालीन लेखन री समवड़ता नीं कर सकांला। इणी बात नैं दीठगत राखर कई विद्वानां कहाणी, निबंध अर उपन्यास लेखन कानी आपरी मेधा रो उपयोग करण अर गद्य भंडार भरण सारु ठावको काम कियो अर कर रैया है।[…]
प्रमुख स्वामी महाराज को शब्दांजली
हंसा! इती उतावल़ कांई।
बैठौ सतसंग करां दुय घडी, लेजो पछै विदाई।
उडता उडता थकिया व्होला, राजहंस सुखदाई।
जाजम ढाली नेह नगर में, माणों राज! मिताई।।१
मोती मुकता चरो भजन रा, मनोसरोवर मांई
पांख पसारे, बैठो पाल़े, तोडो मत अपणाई।२[…]
म्हूं तो मन मानें ज्यूं राचूं।
साँवरियो बण कागद लिख द्यूं, मीरां ह्वै फिर बांचूं।
कदे वेदना हँस हँस गाऊ, कदे खुशी में रोऊं।
मनोभाव मणिमुकता माल़ा, जोडूं तोडूं प्रोऊं।
लडियां कडियां आँच अनुभव, कर कर कुंदन जांचूं।
म्हूं तो मन मानें ज्यूं राचूं।
साँवरियो बण कागद लिख द्यूं, मीरां ह्वै फिर बांचूं।[…]
संतो! वरे भाव री हेली!
तनडो भींज्यों मनडो भींज्यों, हरी हुई हिव वेली!
खल़कै खाल़ा, वहता व्हाल़ा, भरिया नद सरवरिया!
कोई उलीचै भर भर खोबा, डूबाणा केई तरिया!
बडी बडी झड़ लगी जोर री, नेवै धरो तपेली!
संतो वरे भाव री हेली!
तनडो भींज्यो मनडो भीज्यो हरी हुई हिव वेली![…]
मोरबी जहाँ से मैने इंजनीयरिंग करी थी उस पर बनाई हुई रचना । इस रचना के पीछे एक कहानी जुडी हुई है मेरा चार साल का इंजनीयरिंग छह साल तक लंबा हो गया और उस पर सेवन्थ सेमेस्टर में मेरे ए टी के.टी एक सबजेक्ट में आई। जिसकी वजह से एट्थ सेमेस्टर के बाद भी मुझे एक महिना और रुकना पडा। जब फेयरवेल के फंक्शन में मुझे किसी ने पूछा कि मोरबी के बारे में आपका क्या खयाल है तो यह रचना उसके जवाब में मैंने सुनाई यह कहकर कि हालात बदल जाते है तो खयालात अपने आप बदल जाते है। […]
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मत देख मिनख री नीत पंछीड़ा, गीत रीत रा गायां जा!
आयां जा मन मेल़ू तूं, साचोड़ी देख सुणायां जा!!
आवै है ग्रहण आजादी पर, ऊंगाणा बैठा गादी पर।
गांधी री काती हाथां सूं, ऐ कलंक लगावै खादी पर।
वोटां पर जाल़ बिछायोड़ा, थिरचक है कुड़का ठायोड़ा।
इसड़ो ऐ नांखै देख चुग्गो, फस ज्यावै मानव डायोड़ा।
नुगरा बल़-छल़ में नामी है, हरमेस लूट रा हामी है।
कुर्सी री राखै देख निगै, ज्यूं-त्यूं ई राखै थामी है।[…]
मिनखाजूण रै फळापै अर फुटरापै सारू आपणां बडेरां, संत-साहितकारां अर लोकनीत-व्यवहार रो ज्ञान करावणियां गुणीजणां खास कर इण बात पर जोर दियो है कै आ जीभ जकां रै बस में है, वां रो ई जीवण धन्य है। ‘बाई कैवतां रांड’ कहीजै जकां नैं जस री ठौड़ जूता ई पानै पड़ै। वाणी तो व्यक्तित्व री आरसी मानीजी है। आदमी नीं बोलै जितरै उणरो ठा नीं पड़ै पण जियां ई बोलै उणरो कद आपणै सामी आवणो सरू हुवै। बोली में मिनख रा संस्कार, व्यवहार, ग्यान अर सभाव रो अेकै सागै खुलासो हुवै। आदमी री ठीमरता, धीरज अर संयत व्यवहार री सूचना उणरी वाणी ई दिया करै। जियां ई मिनख बोलै आ ठा पड़ ज्यावै कै ओ कुणसी संगत अर संस्कारां में रैवणियो आदमी है। […]
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कासा थामे चला कलंदर!
चौखट गाँव गली दर घर घर!
सहरा, जंगल, परबत, बस्ती,
गाहे गाहे मंज़र मंज़र!
बाहर बाहर दिखै भिखारी,
भीतर भीतर शाह सिकंदर!
रेत कौडियाँ गौहर मछली
अपने भीतर लिए समंदर![…]