चिरजा इंन्द्रबाईसा की – कवि हिंगऴाजदान जी जागावत

इंन्द्रबाई आये कृपा करि आप,
बड़ापण राज तणूं भारी।।टेर।।

पाप कोऊ प्रकट्यो मों पिछलो,
मैं मति भयो जु मंन्द।
मां मन बिलकुल कुटिल हमारो,
भूल गयो धज बन्द।
फेर फिर किरपा अणपारी।।1।।[…]

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चिरजा मंदिर की – कवि हिंगऴाजदान जी जागावत

आदरणीय जागावत हिंगऴाजदान जी सा चिरजावां में अनूठो प्रयोग करियो है। भगवती का मंदिर ने सम्बोधित करती दो रचनावां करी है जिणमें पहली में निवेदन है कि हे माँ भगवती आप भव्य मंदिर को निर्माण करवायो जिणमें कई भांत की विशेषता है, और दूसरी चिरजा में भवन ने कहियो है कि भवन तूं कितणो भाग्यशाली है जो बीसभुजाऴी भगवती आप में बिराजमान है। ।।प्रथम।। अम्बा हे गढ मानहु स्वर्ग बसायो। सो सह शकत्यां आय सरायो।।टेर।। दिशि पूरब झांकत दरवाजो, कोट तणो करवायो। ऊंचा पण देशाण अन्दाजै, लोयण भोत लखायो।।1।। बुरज उतर वारी पर भारी, “भगवती-भवन” बणायो। ताहि नजीक सरिस तैं […]

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धवल उजवल मरुधरा – कवि श्री मोहन सिंह रतनू

जिण भोम उपजे भीम सा भट, थपट भूमंड थरथडै।
धड शीश पडियो लडे कमधज, झुण्ड रिपुदल कर झडे।।
जुध काज मंगल गिणत जोधा, वीरवर विसवासरा।
प्रचंड भारत दैश प्रबल, धवल उजवल मरुधरा।।[…]

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भैरूंनाथ रा छप्पय – जवाहरदान जी रतनूं

।।भैरवानाथ।।

।।छप्पय।।

डमर डाक डम डमक, घमर घूघर घरणाटै।
पग पैजनि ठम ठमक, स्वान झमझम सरणाटै।
द्युति आनन दम दमक, रमक गंध तेल रऴक्कै।
गयण धरा गम गमक, खमक मेखऴी खऴक्कै।
सम समक संप चम चम चमक, धमक बहै रँग धौरला।
मोरला काम कज चढ हद मदद, (रे) गुरज लियाँ कर गौरला।।1।।[…]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – षोड़श मयूख

।।षोड़श मयूख।। अंतिम पर्व वैशंपायन उवाच दोहा धृतराष्टर आदेश, धर्मपुत्र शिर पर धर्यो। यथा सुयोधन लेश, कबहुँ न अंगीकृत कर्यो।।१।। वैशंपायन मुनि आगे कहने लगे कि हे राजा जन्मेजय! धृतराष्ट की एक-एक आज्ञा को जिस प्रकार राजा युधिष्ठिर ने शिरोधार्य किया, उसी प्रकार दुर्योधन ने उनकी एक भी आज्ञा को नहीं माना था। दोहा स्नान दान गज गाय महि, भेजन सयन सुभाय। प्रथम करै धृतराष्ट्र जब, पीछे नृपति सदाय।।२।। श्रेष्ठ भाव से स्नान कर, हाथी, गायें एवं पृथ्वी का दान कर, भोजन और शयन आदि नित्य कार्य पहले धृतराष्ट्र करते उसके बाद धर्मराज युधिष्ठिर अपना नित्य कर्म निबटाते। जो पदार्थ […]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – पंचदश मयूख

।।पंचदश मयूख।। शल्यपर्व वैशंपायन उवाच दोहा संजय और युयुत्सु दोउ, आये नृप कौं लैन। त्रियन युक्त कुरुखेत हित, बड़ी बधाई दैन।।१।। वैशंपायन कहने लगे कि हे जन्मेजय! युद्ध के सम्पूर्ण होने पर संजय और युयुत्सु ये दोनों, गांधारी आदि स्त्रियों सहित, राजा धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र ले जाने को तथा बधाई देने को हस्तिनापुर में आए। संजय उवाच कवित्त भीम कौं दयो हो विष ता दिन बयो हो बीज, लाखागृह भये ताको अंकुर लखायो है। द्यूतक्रीड़ा काल बिसतार पाय बड़ो भयो, द्रौपदी हरन भये मंजरी तैं छायो है। मच्छ गाय घेरी जबै पुष्प फल भार भयो, तैंने ही कुमंत्र जल सींचिकै […]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – चतुर्दश मयूख

।।चतुर्दश मयूख।। कर्णपर्व (उत्तरार्द्ध) दोहा अर्जुन के द्रष्ट न पर्यो, धर्मपुत्र ध्वजदंड। कह्यो भीम तैं शोधि करि, कित हैं नृप बलबंड।।१।। संजय बताने लगा कि हे राजा! दुःशासन के वध के पश्चात् अर्जुन ने रणभूमि में चारों ओर देखा और जब उसे युधिष्ठिर का ध्वजदंड नजर नहीं आया तो उसने भीमसेन से पूछा कि हे भाई! बलवान धर्मराज कहाँ हैं? जाओ उनकी खबर लाओ। भीमोवाच मो अरि भर्गल मानिहैं, तुम ही शोधहु तात। आयो डेरन बीच रथ, लखि नृप चित हरखात।।२।। यह सुन कर भीमसेन ने कहा कि हे भाई! मेरे जाने से शत्रु यह कहेंगे कि मैं भाग गया […]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – त्रयोदश मयूख

।।त्रयोदश मयूख।। कर्णपर्व (पूर्वार्द्ध) वैशंपायन उवाच दोहा लखि द्वै दिन को युद्ध पुनि, संजय परम सयान। कहि नृप तैं तव पुत्र को, कट्यो कर्न तनत्रान।।१।। वैशंपायन कहने लगे, हे जन्मेजय! फिर दो दिन का युद्ध देख कर परम सुजान संजय ने हस्तिनापुर में आ कर, धृतराष्ट्र से कहा कि तुम्हारे पुत्र का कवच वह कर्ण आज फट (मारा) गया। संजय उवाच कवित्त भीम वाडवागि जाको नेक हू न कीनो भय, सात्यकि तिमिंगल को त्रास हू न मान्यो राज। नकुल सहदेव धृष्टद्युम्न रु शिखंडी जैसे, महाबाहु ग्राहन को चिंत्यौ ना कछू इलाज। किरीटी के कोप वायु चंड खंड खंड कीनी, गांजिव […]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – द्वादश मयूख

।।द्वादश मयूख।। द्रोणपर्व (उत्तरार्द्ध) युधिष्ठिर उवाच कवित्त तेरे काज बन ही मैं कहतो किरीटी मोसों, सात्यकि के जो ही तैं शत्रुन कौं मारिहौं। कृष्ण बलदेव जोपै होहिं न सहाय तो हू, एक शयनेय ही तैं सबै काज सारिहौं। सोई काज आज कोस द्वारश लौं द्रौनव्यूह, तो बिन तरैया को है ताहितैं पुकारिहौं। देवदत्त गांजिव को घोष ना सुनौंहौं तेरे, गुरु बिना पृथा कौं मैं का मुख दिखारिहौं।।१।। युद्धभूमि में अर्जुन की शंख ध्वनि नहीं सुनाई देने से, युधिष्ठिर व्याकुल हो कर सात्यकि से कहने लगे कि हे युयुधान (सात्यकि)! हम जब वनवास में थे तब अर्जुन तुम्हारे लिए कहता था […]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – एकादश मयूख

।।एकादश मयूख।। द्रोणपर्व (पूर्वार्द्ध) वैशंपायन उवाच दोहा पांच दिवस लखि द्रोण जुध, हथनापुर में आय। द्रोण पतन पांडव बिजय, संजय कहत सुनाय।।१।। वैशंपायन बोले हे जन्मेजय! संजय ने द्रोणाचार्य के पाँच दिन का युद्ध देखा। उनकी मृत्यु और पांडवों की विजय देखी। वही अब पूरा हाल सुनाता है। शार्दूल विक्रीडित छंद गेहे यस्य श्रुति: पठन्ति नितरां, नाना स्वरैर्ब्राह्मणा। वीराणां हि श्रणोति घोष मुदितं, ज्याकर्षिता धन्विनां। उच्चैर्वेणु रवादि वाद्य विविधै, नृत्यन्ति वाराङ्गना। हा हा! द्रोण कुतोसि तस्य सदने, वाक्यं समुद्दीर्यताम्।।२।। जिस गुरु द्रोणाचार्य के घर से नित्यप्रति विविध प्रकार के ब्राह्मण-स्वरों में वेदवाणी सुनाई देती थी। जिसके घर से धनुष की […]

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