स्वाभिमान और गौरव का बिंदु है जौहर

राजस्थान का नाम धारा-तीर्थ के रूप में विश्रूत रहा है। शौर्य और धैर्य का मणिकांचन संयोग कहीं देखने को मिलता था तो वो केवल यही धरती थी। ऐसे में कुछ सवाल उठते हैं कि फिर राजस्थान के रणबांकुरों को युद्ध में परास्त और यहां की वीरांगनाओं को जौहर की ज्वालाओं में क्यों झूलना(नहाना) पड़ा? क्या कारण था कि जिनकी असि-धाराओं के तेज मात्र से अरिदलों के हृदय कंपित हो उठते थे, उनको साका आयोजन करना पड़ता था?[…]

» Read more

विलल़ा मिनख रूंख नैं बाढै!

।।गीत – वेलियो।।
परघल़ रूंख ऊगाय परमेसर, अवन बणाई ईस अनूप।
विलल़ा मिनख रूंख नैं बाढै, वसुधा देख करै विडरूप।।1

पँचरँग चीर धरा नैं परकत, हरियल़ हरि ओढायो हाथ।
मेला जिकै मानवी मन रा, गैला करै विटप सूं घात।।2[…]

» Read more

शेर तथा सुअर की लड़ाई का वर्णन – हिंगलाजदान जी कविया

।।छंद – सारंग।।
डाकी इसा बोलियो बैण डाढाळ।
कंठीरणी छेड़ियो कुंजरां काळ।।
जाग्यो महाबीर कंठीर जाजुल्य।
ताळी खुली मुण्डमाळी तणी तुल्य।।
घ्रोणी लखे सींह नूं गाजियो घोर।
जारै किसूं केहरी ओर रो जोर।।

» Read more

गुरु वंदना – देवी दान देथा (बाबिया कच्छ)

।।छंद त्रिभंगी।।
श्री सदगुरु देवा, अलख अभेवा, रहित अवेवा, अधिकारी।
गावत श्रुति संता, अमल अनंता, सबगुनवंता, दुखहारी।
तजि के अभिमाना, धरही ध्याना, कोउ सयाना, रतिधारी।
जय इश्वर रामं, ब्रह्म विरामं, अति अभिरामं, सुखकारी।।१[…]

» Read more

गये बिसारी गिरधारी – त्रिभंगी छंद – स्व. देवीदान देथा (बाबीया कच्छ)

।।छंद त्रिभंगी।।
ब्रज की सब बाला, रूप रसाला, बहुत बिहाला, बिन बाला,
जागी तन ज्वाला, बिपत बिसाला, दिन दयाला, नंद लाला।
आए नहि आला, कृष्ण कृपाला, बंसीवाला, बनवारी।
कान्हड़ सुखकारी, मित्र मुरारी, गये बिसारी, गिरधारी।।१[…]

» Read more

आवड़ वंदना – जय सिंह सिंढायच मण्डा (राजसमन्द)

।।छंद रोमकंद।।
कलिकाल महाविकराल़ हल़ाहल़,धीर कुजोर बढै जवनां।
भव भार उतारण दास उबारण, कारण याद करे वचना।
बिसरी नहि अंब दयाल़ अजू, गण चारण ने वर आप दयो।
जय मावड़ आवड़ बीसभुजा बड, लाखिय लोवड़वाल़ जयो।
जिय माड धिराणिय माय जयो।।१[…]

» Read more

श्री डूंगरराय स्तवन – कवि चाळकदान जी रतनू (मोड़ी)

।।छन्द – नाराच।।
अच्छे रचे जु आवड़ा, अस्थान वे अखण्डळा।
नचे जचे सुनाचता, मचे सुरा समण्डळा।
जगत्त मात जां जुरीय, जोगणी सुजोगरी।
रमंत माढ़राय माय, डूंग्रराय डोकरी।
जी डूंगरेच डोकरी।।

नभस्सु माय न्रम्मला, सुभस्सु जाम सत्तमी।
रमत्त रास ईसरी, जमत्त मात जक्तमी।
घमंक पाय घूघरा, धराधर धूजै धरी।
रमंत……………………………।।[…]

» Read more

असही सही न जाय!

एक जमानो हो जद लोग चीकणी रोटी जीमता पण चीकणी बात करण सूं परहेज राखता। हर भजण अर हक बोलण में विश्वास राखता। अजोगती बात करणियो कोई धंतरसिंह क्यूं नीं हुवै, उणनै ई साच कैवता नीं संकीजता। आज जद आपां हर नाजोगी बात देख’र अथवा सुण’र बेहिचक कैय देवां कै – “बल़णदे नीं आपांरो कांई लेवै या आपां क्यूं किणी सूं बिनां लाभ खरगसो बांधां।”[…]

» Read more

डूंगरां ऊपरै छांह डाकी

कविवर नाथूसिंहजी महियारिया सही ई लिख्यो है कै भगती अर वीरता वंशानुगत नीं हुय’र फखत करै जिणरी हुवै-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नूंतीह।
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह।।

क्यूंकै फखत शस्त्र धारण सूं सूर अर गैणो पैरण सूं कोई हूर नीं हुवै-

भेख लियां सूं भगत नीं, होय न गैणै हूर।
पोथी सूं पंडित नहीं, नहीं शस्त्र सूं सूर।।[…]

» Read more

रांमदेव जी रा दूहा – उदयराज जी उज्जवल

तुंवर मो तारेह,  आंख सुधारै ईसवर।
थेटू श्रण थारेह,  रैणव वसिया रांमदै।।१।।
तै दीधा कर तोय,  पीळा आखा पातसा।
सिंढायच कुळ सोय, आदू शरणै आपरै।।२।।
परी मटाडै पीड,  दे जोती आंखां दुरस।
भांणव पडतां भीड,  आव मदत अजमाल रा।।३।।
तुं साचौ किरतार,  दुःख मेटण प्रगट्यौ दुनि।
वीगरी कर वार,  अबखी पुळ अजमाल रा।।४।।
वीदग बारंबार,  करुणानिधि वीणत करै।
तार किसन अवतार,  मात पिता तु रामदे।।५।।[…]

» Read more
1 22 23 24 25 26 114