भजन महिमा – जनकवि ऊमरदान लाल़स

।।छंद मधुभार।।
अथ ओमकार। अक्षर उचार।
निस दिवस नाम। रट राम राम।।१
द्वै सुलभदीप। श्रद्धा समीप।
रुचि ह्वै सु राख। दुहु दिव्य दाख।।२
मम इष्ट मिष्ट। आदर अभिष्ट।
महिमा मनोग्य। जप तपन जोग्य।।३
माधूर्य मेह। आसार एह।
सदगुरु समान। जीवन जहान।।४
चित प्रथम चेत। उल्लू अचेत।
यह तन अयान। न स्थिर निदांन।।५[…]

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हनुमान अष्टक – जनकवि ऊमरदान लालस

अंजनी ग्रभ आयौ, सुमन सुहायौ, गुनि गन गायौ, ग्यान गती।
पावन सुत पूरौ, दूषण दूरौ, समहर सूरौ, जन्म जती।
करनी सुभकारी, धर जस धारी, भव भयहारी, भीम भुजा।
ले लाल लंगोटी, काछ कछोटी, धारन मोटी, लाल धजा।।१[…]

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चुनौतियों के चक्रव्यूह में फंसे आज के विद्यार्थी एवं अभिभावक

यह चिरंतन सत्य है कि समय निरंतर गतिमान है और समय की गति के साथ सृष्टि के प्राणियों का गहन रिश्ता रहता है। सांसारिक प्राणियों में मानव सबसे विवेकशील होने के कारण समय के साथ वह अपनी कदम ताल मिलाते हुए विकास के नवीनतम आयाम छूने के लिए प्रयासरत्त रहता है। समय के बदलाव के साथ व्यक्ति की सोच, उसकी आवश्यकताएं, अपेक्षाएं, मान्यताएं तथा वर्जनाएं बदलती हैं। इसी बदलाव में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा अन्यान्य जीवनमूल्यों में परिवर्तन होता है।[…]

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गोड़ावण गरिमा – कवि मोहन सिंह रतनू

।।छंद नाराच।।
वदे महीन मृदूबाक, काग ज्युं न कूक हे
बैसाख जेठ मास बीच ,लूर मोर सा लहे
सणंक सो करे सुवाज ,भादवे लुभावणी
जहो गुडोण जागरुक मारवाड तू मणी…..१[…]

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सूरां मरण सांम ध्रम साटै!!

राजस्थान रै मध्यकाल़ीन इतियास नै निष्पक्ष भाव सूं देखण अर पुर्नलेखन री दरकार है। क्यूंकै आज जिणगत युवापीढी में जीवणमूल्यां रै पेटे उदासीनता वापर रैयी है वा कोई शुभ संकेत री प्रतीक नीं है।
उण बखत लोग अभाव में हा पण एकदूजै सूं भाव अर लगाव अणमापै रो राखता। ओ वो बखत हो जद स्वामीभक्ति अर देशभक्ति एक दूजै रा पूरक गिणीजता हा। जिणांरै रगत में स्वामीभक्ति रैयी उणांरै ईज रगत में देशभक्ति रैयी। भलांई आपां आज इण बात नै थोड़ी संकीर्ण मानतां थकां व्यक्तिवाद नै पोखण वाल़ी कैय सकां पण आ बात तो मानणी ईज पड़सी कै उण मिनखां में त्याग, समर्पण, अर मरण नै सुधारण री अद्भुत ललक ही। इणी ललक रै पाण उवै आज ई खलक में आदरीजै।[…]

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श्री रांमदे सतक – उदयराजजी उज्जवल कृत

आय वस्यौ अजमाल, कासमीर मारूधरा।
भला चौधरी भाल़, मलीनाथ रा राज में।।१
कासमीर में छोड़िया, जंह गाडा अजमाल।
गाडाथल़ वाजै जगा, जाणै सगल़ा हाल।।२
पुत्र कामना पूर, जद वापी अजमाल रै।
झलियौ नेम जरूर, दरसण करवा द्वारका।।३
साधू रै उपदेस, कीधी सेवा किसन री,
पुत्र दियौ परमेस, वीरमदे रै नांम रौ।४
अरज करी अजमाल, कांनूड़ौ जनमै कंवर।
देखै भाव दयाल़, प्रगट्या उण घर पाल़णै।।५[…]

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कागा बिच डेरा किया, जागा अबखी जाय

सिद्धां औरूं कवेसरां, जे कोई जाणै विद्ध।
कपड़ां में क्यूं ही नहीं, सबदां में हिज सिद्ध।।

कविश्रेष्ठ केसवदासजी गाडण आ कितरी सटीक कैयी है कै सिद्ध अर कवि री ओल़खाण भड़कीलै कपड़ां सूं नीं बल्कि उणरी गिरा गरिमा सूं हुवै। आ बात शुभकरणजी देवल रै व्यक्तित्व माथै खरी उतरै। साधारण पोशाक यानी ऊंची साधारण धोती,मोटी खाकी पाघ,अर साधारण ईज मोजड़ी। ना तड़क ना भड़क पण आखरां में कड़क बखाणणजोग।[…]

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आहुवा पच्चिसी – कवि हिम्मत सिंह उज्ज्वल (भारोड़ी)

जबत करी जागीर, जुलमी बण जोधाणपत।
व्रण चारण रा वीर, जबरा धरणे जूंझिया।।1।।

रचियोड़ी तारीख, आजादी भारत तणी।
सत्याग्रह री सीख, जग ने दीधी चारणां।।2।।

अनमी करग्या नाम, अड़ग्या आहुवे अनड़।
करग्या जोगा काम, मरग्या हठ करग्या मरद।।3।।

लोही हंदा लेख, लड़िया बिण लिखिया सुभट।
रगत तणी इल़ रेख, खेंची खुद रा खड़ग सूं।।4।।[…]

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सियावर रामचंद्र

बरसां सूं अजोध्या नगरी मांय उदासी छायोड़ी है। सगळा लोग-बाग आप-आपरै धरम-करम मांय रच्या-पच्या, आयै दिन रा काम-काज नीत-सास्तरां रै बतायै मुजब कर रिया है। घर-गिरस्थी वाळा लोग अतिथियां री सेवा, माता-पिता रो माण अर गुरुवां रो सनमान पूरै मनोयोग सूं करता आपरो जीवण जीवै। किणीं नैं किणीं सूं कोई अड़ी-ईसको नीं, कोई खींचताण नीं, कोई सिकवा-सिकायत नीं, कोई कोरट-कचेड़ी रो काम ई नीं।[…]

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आवड़ाष्टक

।।छंद-रोमकंद।।
घर मामड़ आणिय देस उग्राणिय,
होफर ताणिय गाज हली।
सत रूप सवाणिय जाणिय जोगण,
भाणिय मैरख भ्रात भली।
बसु बात बखाणिय कीरत वाणिय,
ढाणिय वाहर लार ढल़ी।
अइ आवड़ रूप विख्यात इल़ा पर, मात दिपै मनरंगथल़ी।।1[…]

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