ईश्वर से प्रश्न पूछने के साहसी भक्ति कवि ईसरदास. . .। – तेजस मुंगेरिया

…इसी भक्ति काव्य की डिंगल़ काव्य परम्परा में ईसरदास भादरेश का नाम अग्रगण्य है। ईसरदास के भक्ति काव्य में समन्वय का महान् सूत्र समाहित है जो तुलसीदास के समन्वय से भी व्यापक व विशाल है। यहाँ इन दो कवियों के काव्य में तुलना करना इसलिए समीचीन है क्योंकि अक्सर तुलसी के संबंध में हजारीप्रसाद द्विवेदी के समन्वय विषयक तथ्य को चटकारे लेकर सुनाया जाता है जबकि ईसरदास के काव्य में शामिल नाथपंथी प्रभाव तथा एक ही ग्रंथ (हरिरस) में निर्गुण तथा सगुण का समान रूप से पोषण तथा सबसे अलहदा बात कि मातृ काव्य (देवियाँण) तथा वीर काव्य (हाला झाला रा कुण्डलिया) का तुलसी के काव्य में सर्वथा अभाव है।…

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जगदंबा स्तवन – कवि वजमालजी मेहडू

।।गीत चितइलोल़।।

पाताळ सातूं परठ पीठे,
कमठ धारण कोल।
इक्कीस व्रहमंड किया उभा,
भ्रगट मांही भूगोल।
तो हिंगोळ जी हिंगोळ, हरणी संकट भव हिंगोळ।।1[…]

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मेघवाल़ बिनां धण्यां रो नीं है

[….]जब हम मध्यकालीन राजस्थान के मौखिक इतिहास का श्रवण करते हैं तो तत्कालीन सत्ता और सत्ता के कारिंदों के अत्याचारों की ऐसी-ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती है कि सुनकर हमारा हृदय करुणार्द्र हो जाता है।
ऐसी ही एक घटना है झांफली गांव की गोमा माऊ की।
गोमा माऊ का जन्म बाल़ेबा के पूनसी बारठ जसराजजी के घर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ था। यहां यह उल्लेख्य है कि जसराजजी को संतान प्राप्ति प्रौढावस्था में हुई थी। इस खुशी में उन्होंने तमाम स्थापित परंपराओं को त्यागते हुए बेटी के जन्म पर न केवल गुड़ बंटवाया अपितु ढोलियों को बुलाकर मंगल गीतों के साथ खुशियां भी मनाई।[…]

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मैं जैसी तेरी मा वैसी ही जालमे की

ऐसी ही एक घटना है, लोकहितार्थ अपना तन अग्नि को समर्पित करने वाली अमरां माऊ की। अमरां माऊ का जन्म वि. की उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में कोडां गांव के रतनू हरदासजी धनजी रां के घर हुआ था। अमरां माऊ का ससुराल पुसड गांव में था। पुसड़ में मीसण जाति के चारण हैं। पुसड की सीमा धारवी गांव से लगती है और धारवी खाबड़िया राठौड़ों का गांव है। यहां के निवासी होने के कारण यह धारोइया कहलाते हैं।
पुसड के चारण धनवाल़ तो थे ही साथ ही खेती भी खूब करते थे लेकिन आए चौमासे सूरो और कलो धारोइयो इनके खेतों में उजाड़ कराते थे जिसके कारण हमेशा विवाद रहता था।[…]

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बेटी का अपमान असह्य है (कलू माऊ)

…कोडा गांव की धरती के रजमे का ही कारण है कि यहां आई और जाई दोनों में देवीय गुणों के समुज्ज्वल दर्शन होते हैं। इन्होंने अन्याय, अत्याचार, शोषण, और साधारणजन के हितार्थ जमर की ज्वालाओं में अपने प्राण समर्पित करते समय किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट महसूस नहीं करके पश्चिम राजस्थान में ‘आ कोडेची है’ के गौरवपूर्ण विरुध्द से अभिमंडित हुई। इसी श्रृंखला में एक नाम आता है कलू (कल्याण) माऊ का।
कलू माऊ का जन्म वि. की अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कोडा गांव के रतनू गजदानजी के घर हुआ था-
प्रसिद्ध डिंगल कवि कैलाशदानजी झीबा अपनी रचना ‘कलू मा रा छंद’ में उल्लेख करते हैं-

धन ऊजल़ कोडा धरा, दूथी धन गजदान।
धन्न धन्न कलु धीवड़ी, उण घर जनमी आय।[…]

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अड़वाँ नैं ओळमा

हा रूप रूपळा रूंख रूंख री, डाळी डाळी हेत भरी।
हो हरियो भरियो बाग बाग में, बेल लतावां ही पसरी।
खिलता हा जिणमें फूल, फूल वै रंग रंग रा रळियाणां।
पानां पानां पर पंछीडा, मंडराता रहता मन भाणां।
बो बाग दिनो दिन उजड़ै है, सो कहो कठै फ़रियाद करां।
(म्हे) लिखां ओळमा अड़वाँ नैं, या खुद माळी सूं बात करां।।[…]

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गीत भाटी तेजमालजी रांमसिंहोत रो

इमां अथग आतंक रो घालियो अवन पर, चहुवल़ घोर अनियाव चीलो।
बहंता जातरु घरां में बाल़ पण, हियै सुण बीहता नांम हीलो।।1
असुर उण हीलियै बीहाया अनेकां, कितां नै लूंटिया सीस कूटै।
घणां रा खोसनै मार पण गीगला, लखां नै उजाड़्या लियै लूंटै।।2[…]

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भारत री छत्राणी

थारै मन री बात लाडेसर, म्हारै सूं अणजाणी के।
जे आँख्यां में पाणी ल्याऊं, भारत री छत्राणी के।

कन्त हजारी बाग जेळ में, बेटो जेळ बरेली में।
देवर जी जंगळ में भटकै, गोरा घुसिया हेली में।
जामाता जूझै गोरां सूं, सगळां मन में ठाणी के।
जे आँख्यां में पाणी ल्याऊं, भारत री छत्राणी के।[…]

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बीज अर माटी री बंतळ

जद बीज जमीं में गाडीज्यो,
अंतस अकुलायो दुख पायो।
बचबा रा गेला बंद देख
रोयो घबरायो पछतायो।
तद माटी उण सूं यूं बोली
रे बीज मती ना घबरावै।
जो जुड़ै जमीं सूं जड़ उणरी
कोई पण काट नहीं पावै।[…]

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