सरस्वती वंदना

।।मत्तगयंद सवैया।।
पंकज-लोचनि! ज्ञान-विरोचनि! हे तम-मोचनि! मां! वरदानी!
श्वेत-मराल बिराजत; छाजत बेद-सितार-कमंडलु-पानी!
नारद आदि विशारद-वंदित, ध्यावत है कवि-कोविद-ज्ञानी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।१।।
कुंकुम भाल सिंदूर ललाट, ‘रु कुंतल व्याल परै पुनि जानी!
झीनि महीन धरै सरसों तन चूनर, औ’ अंगिया-पट-धानी!
मौक्तिक-बुंद तुषार जड़ै, अवली तरु-बेलि न जाय बखानी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।२।।
बौर रसाल ‘रु चंदन केसर, गुग्गल धूप कपूर प्रमानी!
दीप लिए कर किंशुक को, वर संत बसंत करै अगवानी!
कोकिल पंचम राग अलापत, आरति गान करै शुचि बानी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।३।।
सारंग सारंग राग सुनावत, कीर कलावंत जू किरवानी!
मांगणियार मिलिंद महारव मंजुल छेड रह्यो मुलतानी!
झिंगुर झाँझ पखाज बजावत, तोहि रिझावन को सुररानी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।४।।
चक्क-कपोत-मराल लगै मनु, व्यास-वशिष्ठ खड़ै मुनि ध्यानी!
ऋत्विज चातक होम करै, वर मंत्र सुनावत है द्विज ज्ञानी!
गावत है बिरुदावलि चारण-भृंग, गुंजार करै शुचि बानी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।५।।
मानस मंजु मराल करो मन, मातु मुझै अपनो सुत मानी!
क्षीर ‘रु नीर को पाऊँ विवेक, चुगौं वर-मुक्तक! पुस्तक-पाणी!
झंकृत आप करो उर-तार, रु छेड़हु सप्तक तान सुहानी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।६।।
आप धरो जिनके सिर पे कर, होत सहस्त्र-शतं-अवधानी!
वेद-विशारद, गायक, वादक, पंडित, तापस, विज्ञ, पुराणी!
ज्ञान-विवेक जगावहु हों घट, अंतर नेकु दया उर आनी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।७।।
मौ रसना-अरविंद-सुआसन, बेगि बिराजहु आखरदानी!
अक्षर-अक्षर ओज भरो जननी, पुनि छंद में देहु रवानी!
नूतन भाव भरो नित ही नरपत्त” के अंतस नौ-रस-दानी!
काव्य-सुधा सरसावन, पावन! दो मनभावन भाव भवानी!।।८।।
~~©डा नरपत आशिया “वैतालिक”
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