पिया घन बरसत अनराधार!

।।प्रोषितभर्तुका का पावस राग।।
।।गीत।।
उमड़ घुमड़ नभ बादल छाए, रिम झिम पड़ै फुहार!
बरछी भाला लगती तुम बिन, बारिश की बौछार!!
पिया! घन बरसत अनराधार!१
रिम झिम रिम झिम रूम झुम रुम झुम, बाजै बूंद-सितार!
कल कल स्वर में झरने गाते, सुर मय मेघ मल्हार!
पिया! घन बरसत अनराधार!२
तिरकिट मेघ मृदंगम्, छम छम, पग पायल झंकार!!
बादल के संग बिजली नाचै, पहने नौलख हार!
पिया! घन बरसत अनराधार!३
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल अमुवा डार।
मत तरसाओ! झट पट आओ, करते यही पुकार!
पिया! घन बरसत अनराधार! ४
धरती ओढ़ चुनरिया धानी, बनी नवेली नार।
निज प्रियतम को चली रिझाने, मैं बैठी मन मार।
पिया!घन बरसत अनराधार! ५
सावन में आवन का साजन, भेजो चिट्ठी तार।
बिरहा सतावै जियरा जलावै, उर बिच अगन अपार।।
पिया!घन बरसत अनराधार। ६
तुम बिन सावन सूखा लागै, भादौ है बेकार!
ओ परदेसी घर आओ अब, छोड़ो कारोबार!
पिया! घन बरसत अनराधार! ७
~~©डा नरपत आशिया “वैतालिक”
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