गीत सैणलाराय रो – पन्नारांमजी मोतीसर जुडिया कृत
।।गीत – संपखरो।।
भुजां साहियां त्रसूल़ झूल़,सगत्यां स तेज भाण,
केवियां कैवांण पांण हटावै कंकाल़।
आराधियां आवै ताल़,तीसरी ईसरी आप,
कीजै माहेश्वरी रिच्छा आरोहा लंकाल़।।[…]
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।।गीत – संपखरो।।
भुजां साहियां त्रसूल़ झूल़,सगत्यां स तेज भाण,
केवियां कैवांण पांण हटावै कंकाल़।
आराधियां आवै ताल़,तीसरी ईसरी आप,
कीजै माहेश्वरी रिच्छा आरोहा लंकाल़।।[…]
दुर्गा अष्टमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। यह नवरात्री एक और कारण से विशिष्ठ है क्योंकि चार वर्ष पूर्व शारदीय नवरात्री में ही माँ भगवती की प्रेरणा से www.charans.org साईट का शुभारम्भ किया गया था। आज इसकी चौथी वर्षगांठ है।
एक छोटा सा पौधा जो चार वर्ष पूर्व शारदीय नवरात्री स्थापना के दिन लगाया गया था, आज आप सभी के सहयोग एवं उत्साहवर्धन से निरंतर प्रगति कर रहा है। कुछ तथ्य प्रस्तूत हैं:[…]
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श्री करणीमाता के पिता मेहाजी जो किनिया शाखा के चारण थे। उनको मेहा मांगलिया से सुवाप नामक गाँव उदक में मिला था, जो जोधपुर जिले की फलौदी तहसील में पडता है। मेहाजी को सुवाप गाँव मिलने से पहले यह गाँव सुवा ब्राह्मण की ढाणी कहलाता था। बाद में मेहाजी ने इस गाँव का नाम बदलकर सुवाप रखा था। इसी गाँव में लोकदेवी श्रीकरणीमाता का जन्म हुआ।
मेहाजी किनिया का विवाह बाड़मेर के मालाणी परगने में अवस्थित वर्तमान बाड़मेर जिले के बालोतरा के पास आढ़ाणा (असाढ़ा) नामक एक प्राचीन गाँव के स्वामी माढा आढ़ा के पुत्र चकलू आढ़ा की पुत्री देवल देवी के साथ हुआ था। कुछ लोग इस प्राचीन गाँव का उल्लेख जैसलमेर की सीमा पर स्थित ओढाणिया गाँव के रूप में भी करते है जो कि एक शोध का विषय है। निष्कर्षतः यह विवाह वि.सं. 1422-23 के आस-पास हुआ था। इस आढ़ी देवल देवी को भी चारण जाति में शक्ति का अवतार माना जाता है।[…]
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પાપ ભર્યો ગરવાપતિ, કહ્યું ન માન્યો કેણ,
દેવી દુભાતે દિલે, વદતી નાગઇ વેણ
।।છંદ – સારસી।।
મનખોટ મહિપત મેલ માજા,અમ ધરાં પર આવિયો,
રજવટ તણી નહિ રીત રાજા,લાવ લશ્કર લાવિયો,
હું ભીન ભા તું પુણ્ય પાજા,ધરણ કાં અવળી ફરી
નકળંક અશરણ શરણ નાગઇ,હરણ દુઃખ હરજોગરી
જીય હરણ દુઃખ હરજોગરી….(૧)[…]
માતૃપૂજાની શરૂઆત તો સૃષ્ટિના આરંભ સાથે જ થઈ હશે. ભારતમાં તો આદિકાળથી જ માતૃપૂજા થતી આવી છે.
ઋગ્વદમાં પણ જગદંબાને સર્વદેવોના અધિષ્ઠાત્રી આધાર સ્વરૂપ, સર્વને ધારણ કરનારા સચ્ચિદાનંદમયી શક્તિ સ્વરૂપે વર્ણવ્યા છે.
ચારણ આઈઓની ઉજળી ગૌરવશાળી અને ભવ્ય પરંપરા રહી છે. ચારણ તો મુળથી જ જગદંબાનો ઉપાસક રહ્યો છે. તેથી જ ચારણ દેવીપુત્રલેખાય છે. દેવી ઉપાસનાને કારણે જ ચારણોમાં નારીને ભાગ્યા નહીં પુજનીય ગણવામાં આવે છે. સ્ત્રી સન્માનને કારણે જ ચારણ પુત્રીઓ તપ – સાધના – આરાધના કરી આઈનું જગદંબાનું પદ પામી પુરાવા લાગી. ચારણોનું આ નારીતત્ત્વ સંયમ, શીલ, સદાચાર, માનવપ્રેમ, વિઘાર્થન, નિયમ અને તપને કારણે પ્રાપ્ત થયેલી આત્મશક્તિને આભારી છે અને એટલે જ કદાચ આવી ચારણપુત્રીઓ પરમ શક્તિની વાહક બની છે. તેમની આત્મશક્તિ એવી હતી કે તેઓ જે વચન બોલી જાય તેને સાચા પાડવા પ્રકૃતિને પણ તેનો નિયમબદલવો પડે. એટલે જ મેઘાણીજી નોંધે છે કે “આવું નારીતત્ત્વ જગતના ઈતિહાસના અન્ય કોઈ વિર સ્તુતીકાર સંસ્થા સાથે જોડાયેલું જડતું નથી.”[…]
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गाँव धणारी के राठौड़ मूऴजी करमसोत, जोधपुर महाराजा जसवन्तसिंह द्वितीय के समय नागौर के हाकिम थे, वे बहुत उदारमना एंव काव्य-प्रेमी तथा चारणों का अति-विशिष्ठ सम्मान करने वाले व्यक्ति थे। उन्हे नागौर किले में गड़ा हुआ धन मिला था, अतः उन्होने अपनी दाढी छंटाने के उत्सव पर 151 ऊँट तत्कालीन प्रसिध्द चारण कवियों को भेंट-स्वरूप उनके घर पर भेजे थे। “वीरविनोद” (कर्णपर्व) के रचयिता महाकवि स्वामी गणेशपुरीजी महाराज ने भी इस दानवीर की प्रशंसा में यह दोहा कहा था-
।।दोहा।।
सांगै री कांबऴ सही, हाड दाधिच कहाय।
करहा मूऴ कमंध रा, जातां जुगां न जाय।।[…]
।।गीत।।
विमल देह धारीयां सगत जांगल धर विराजै,
थांन देसांण श्री हाथ थाया।
उठै कव भेजियो राज करवा अरज,
जोधपुर पधारो जोगमाया।।१।।
विनती सुणै रथ जुपायो बेलीयां,
सहस फण सेलियां जदन सारा।
तेलीयां वीर सुत वाजता टांमका,
लाख नव फैलीया व्यूह लारा।।२।।[…]
।।छन्द – भुजंगी।।
कया वैण सो काळवीं क्यों न केनों,
धरा भूप ले जावंत बाल धेनों।
महा दुष्ट खींची गयो मांह मोड़ै,
जबे पाल घोड़ी मांगी हाथ जोड़ै।।१।।
द्यों काळवीं मुज्झ नों बैण दीजै,
करै वाहरु धेन रा बोल कीजै।
भणै अम पाबू सुणो हो भवानी,
ममु वेण दीजै तमों साच मानी।।२।।[…]
घर जुगता गरजी घणा,अरजी करे अपार।
मरजी राजा मान री,सरजी सरजण हार।।
ऊगै रिव ऐतीह,पूगै ताय सेती पवन।
जुगता धर जैतीह,तेती कीरत ताह री।।
मरजी राजा मान री,जुगता ऊपर जोर।
कर रीझां अनरिण कियो, रयो न कबडी रोर।।
पाडलाऊ तांबांपत्रा,मौने बगसी मांन।
दै हाथी सांसण दिया,दीना लाखां दान।।[…]
ठहीं भींत सोवण तणी तटी रे ठकाणे,
कुटि रे ठकाणे महल कीना।।
मिटी रे आंगणे जड़ी सोनामणि,
दान कंत रूखमणी तणे दीना।।1।।
झांपली हती ओठे प्रोळ आवे झकी,
जिका न ओळखी विप्र जाहे।।
बाँह गहे सुदामो तखत बेसाड़ियो,
मलक रो धणी कियो पलक मांहे।।2।।[…]