लहू सींच के हमने अपना ये सम्मान कमाया है – मनोज चारण ‘कुमार’

आखे ‘मान’ सुणो अधपतियाँ, खत्रियाँ कोइ न कीजे खीज।
बिरदायक मद-बहवा बारण, चारण बड़ी अमोलक चीज।।

जोधपुर महाराजा मानसिंह का ये कथन चारण समाज के बारे में एक प्रमाणिक तथ्य प्रकट करता है कि, चारण शब्द ही सम्मान करने योग्य है। वैसे तो हर जाति का अपना इतिहास है, लगभग सभी जातियों के लोग अपने-अपने इतिहास पर गर्व करते हैं और करना भी चाहिए। चारण जाति का इतिहास बहुत पुराना इतिहास है। चार वर्ण से इतर है ये जाति, जिसे कमोबेस ब्रह्मा की सृष्टि से बाहर भी माना जा सकता है।[…]

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भुज-कच्छ की ऐतिहासिक डिंगळ पाठशाला के पाठ्यक्रम एवं वहां पढ़े कवियों द्वारा रचित ग्रंथों की सूची

कच्छ के महाराव लखपति सिंह (सन १७१० – १७६१ ई.) ने गुजरात/राजस्थान की काव्य परंपरा को सुद्रढ़ एवं श्रंखलाबद्ध करने का अभूतपूर्व कार्य किया जिसका साहित्यिक के साथ साथ सांकृतिक महत्त्व भी है। उन्होंने भुजनगर में लोकभाषाओँ एवं उनके काव्य-शास्त्र के अध्ययन एवं अध्यापन के लिए सन १७४९ ई. में “रा. ओ. लखपत काव्यशाला, भुजनगर” की स्थापना की जो “डिंगळ-पाठशाला” एवं “भुज नी पोशाळ” अथवा “भुज की पाठशाला” के नाम से लोकप्रिय हुई एवं स्वातंत्र्य-पूर्व काल अर्थात सन १९४७ ई. तक कार्य करती रही।
अपने लगभग २०० वर्षों के अंतराल में भुज की पाठशाला ने काव्य जगत को सैकड़ों विद्वान् कवि दिए जिन्होंने अनेकों ग्रन्थ रचे एवं डिंगल/पिंगल काव्य परंपरा को नयी ऊँचाइयों पर पहुचाया। इस पाठशाला के पाठ्यक्रम में पढाये जाने वाले ग्रंथों की सूची एवं यहाँ से पढ़े विद्वान् कवियों के द्वारा रचित ग्रंथों की सूची नीचे दी गयी है।…

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वैश्विक महामारी “कोरोना”

वैश्विक महामारी “कोरोना” से निजात पाने के लिए सभी अपने अपने स्तर से प्रयासरत हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे हैं, राजनेता इस चुनौती का सामना करने के अनुरूप नीतियाँ बना रहे हैं, सरकारी कर्मचारी अथक प्रयास करके इन नीतियों को कार्य रूप में परिणित कर रहे हैं, व्यवसायी इस विषम परिस्थिति से जूझ रहे तन्त्र को आपदा राहत कोष में आर्थिक मदद कर रहे हैं, स्वयंसेवी संस्थाएं इस परिस्थिति के मारे अपार जन समुदाय को भोजन एवं रात्रि विश्राम जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करने की दिशा में जमीनी स्तर पर कार्य कर रही है, चिकित्सक इस महामारी से संक्रमित मरीजों […]

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चढ़ाऊ गीत – मुलक सूं पळकियो काढ़ माता – बिड़ददान जी बारहट (नाथूसर)

।।गीत – साणोर।।

उरड़ उण तार बिच बार करती ईदग।
बीसहथ लारली कार बगती।।
आंकड़े अखूं आधार इक आपरो।
सांकड़े सहायक धार सगती।।[…]

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ભગવતી આઈ શ્રી વાનુમા – મોરઝર (भगवती आई श्री वानुमा मोरझर)

માતૃપૂજાની શરૂઆત તો સૃષ્ટિના પ્રારંભ સાથે જ થઈ હશે. ભારતમાં તો આદિકાળથી જ માતૃપૂજા થતી આવી છે.

વેદોમાં પણ જગદંબાને સર્વદેવોના અધિષ્ઠાત્રી, આધાર સ્વરૂપ સર્વને ધારણ કરનારા સચ્ચિદાનંદમયી શક્તિ સ્વરૂપે વર્ણવામાં આવ્યા છે.

લોકજીવનમાં પરંપરાગત શક્તિ-પૂજા સાથે ચારણો ના ઘેર જન્મ લેનાર શક્તિ અવતારોની પૂજાનું પણ વિશિષ્ટ અને મહત્ત્વપૂર્ણ સ્થાન છે.[…]

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नसीहत री निसाणी – जाल जी रतनू

किसी का बिन जाणिये, विश्वास न कीजै।
गैणा गांठा बेच के, अन सूंगा लीजै।
पढवाचा कीजै नही, बिन मौत मरीजै।
ठाकुर से हेत राखके, हिक दाम न दीजै।
भांग शराब अफीम का, कोई व्यसन न कीजै।
दुसमण की सौ बीनती, चित्त ऐक न दीजै।

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गीत कुशल जी रतनू रे वीरता रो बगसीराम जी रतनू रचित

राजस्थान मे चारण कवि ऐक हाथ मे कलम तथा दूसरे हाथ मे कृपाण रखते थे। महाराजा मानसिंह जी जोधपुर के कहे अनुसार रूपग कहण संभायो रूक। ऐक बार मानसिंह जी का भगोड़ा बिहारी दास खींची को भाटी शक्तिदान जी ने साथीण हवेली मे शरण दी, इस पर मान सिह जी ने क्रुद्ध होकर फोज भेज दी। शरणागत की रक्षा हेतु भाटी शक्तिदान जी ऐवं खेजड़ला ठाकुर सार्दुल सिंह जी ने सामना किया। इस जंग मे मेरे ग्राम चौपासणी के उग्रजी के सुपुत्र कुशल जी रतनू ने पांव मे गोली लगने के बाद भी युद्व किया।
उनकी वीरता पर तत्कालीन कवि बगसीराम जी रतनू ने निम्नलिखित डिंगल गीत लिखा जो यहाँ पेश है।

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अमर रहे गणतन्त्र हमारा – राजेश विद्रोही

भाई का दुश्मन है भाई
मन्दिर मस्जिद हाथापाई
हिन्दुस्तानी सिर्फ रह गये
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई
कौमी यकजहती रोती है
गया भाड़ में भाईचारा।
मगर हमें इन सब से क्या है
अमर रहे गणतंत्र हमारा।।[…]

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पुस्तक समीक्षा – प्रकृति-संस्कृति री ओपती सुकृति-‘रूंख रसायण’ – महेन्द्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’

पुस्तक समीक्षा – प्रकृति-संस्कृति री ओपती सुकृति-‘रूंख रसायण’ – महेन्द्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’
लेखक – डॉ. शक्तिदान कविया

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