मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

सिकुड़ती परछाइयाँ, धूमिल-मलिन गोधूलि-बेला !
डगर पर भयभीत पग धर चल रहा हूँ मैं अकेला !
ज़िंदगी की साँझ में मधु-दिवस का यह गान कैसा ?
मोह-बंधन-मुक्त मन पर स्नेह-तंतु-वितान कैसा ?

मरण-बेला में मिलन-संगीत लेकर क्या करूँगा ?
मैं किसी आकुल-ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा ![…]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – पंचदश मयूख

।।पंचदश मयूख।। शल्यपर्व वैशंपायन उवाच दोहा संजय और युयुत्सु दोउ, आये नृप कौं लैन। त्रियन युक्त कुरुखेत हित, बड़ी बधाई दैन।।१।। वैशंपायन कहने लगे कि हे जन्मेजय! युद्ध के सम्पूर्ण होने पर संजय और युयुत्सु ये दोनों, गांधारी आदि स्त्रियों सहित, राजा धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र ले जाने को तथा बधाई देने को हस्तिनापुर में आए। संजय उवाच कवित्त भीम कौं दयो हो विष ता दिन बयो हो बीज, लाखागृह भये ताको अंकुर लखायो है। द्यूतक्रीड़ा काल बिसतार पाय बड़ो भयो, द्रौपदी हरन भये मंजरी तैं छायो है। मच्छ गाय घेरी जबै पुष्प फल भार भयो, तैंने ही कुमंत्र जल सींचिकै […]

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आज होली जल रही है !

राज्य-लिप्सा के नशे में, विहँसता है आज दानव !
दासता के पात में जो, पिस रहा है आज मानव !
आज उसकी आह से धन की हवेली हिल रही है !
आज होली जल रही है ![…]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – चतुर्दश मयूख

।।चतुर्दश मयूख।। कर्णपर्व (उत्तरार्द्ध) दोहा अर्जुन के द्रष्ट न पर्यो, धर्मपुत्र ध्वजदंड। कह्यो भीम तैं शोधि करि, कित हैं नृप बलबंड।।१।। संजय बताने लगा कि हे राजा! दुःशासन के वध के पश्चात् अर्जुन ने रणभूमि में चारों ओर देखा और जब उसे युधिष्ठिर का ध्वजदंड नजर नहीं आया तो उसने भीमसेन से पूछा कि हे भाई! बलवान धर्मराज कहाँ हैं? जाओ उनकी खबर लाओ। भीमोवाच मो अरि भर्गल मानिहैं, तुम ही शोधहु तात। आयो डेरन बीच रथ, लखि नृप चित हरखात।।२।। यह सुन कर भीमसेन ने कहा कि हे भाई! मेरे जाने से शत्रु यह कहेंगे कि मैं भाग गया […]

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आज जीवन गीत बनने जा रहा है !

आज जीवन गीत बनने जा रहा है !
ज़िंदगी के इस जलधि में ज्वार फिर से आ रहा है !

छा गई थी मौन पतझड़ की उदासी,
गान जब से बन गए मेरे प्रवासी !
आज उनको मुरलिका में पुनः कोई गा रहा है !
आज जीवन गीत बनने जा रहा है ![…]

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – त्रयोदश मयूख

।।त्रयोदश मयूख।। कर्णपर्व (पूर्वार्द्ध) वैशंपायन उवाच दोहा लखि द्वै दिन को युद्ध पुनि, संजय परम सयान। कहि नृप तैं तव पुत्र को, कट्यो कर्न तनत्रान।।१।। वैशंपायन कहने लगे, हे जन्मेजय! फिर दो दिन का युद्ध देख कर परम सुजान संजय ने हस्तिनापुर में आ कर, धृतराष्ट्र से कहा कि तुम्हारे पुत्र का कवच वह कर्ण आज फट (मारा) गया। संजय उवाच कवित्त भीम वाडवागि जाको नेक हू न कीनो भय, सात्यकि तिमिंगल को त्रास हू न मान्यो राज। नकुल सहदेव धृष्टद्युम्न रु शिखंडी जैसे, महाबाहु ग्राहन को चिंत्यौ ना कछू इलाज। किरीटी के कोप वायु चंड खंड खंड कीनी, गांजिव […]

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भव का नव निर्माण करो हे !

भव का नव निर्माण करो हे !
यद्यपि बदल चुकी हैं कुछ भौगोलिक सीमा रेखाएँ;
पर घिरे हुए हो तुम अब भी इस घिसी व्यवस्था की बोदी लक्ष्मण लकीर से !
रुद्ध हो गया जीवन का अविकल प्रवाह तो;
और भर गया कीचड़ के लघु कृमि कीटों से गलित पुरातन संस्कृति का यह गन्दा पोखर ![…]

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Learning

🌺डोकरी – गज़ल🌺 नरपत आसिया “वैतालिक” बैठी घर रे बार डोकरी! किणनें रही निहार डोकरी! हेत हथाई अपणायत री, टाबर रे रसधार डोकरी! गिरधरदान रतनू “दासोड़ी” थाकी बैठी आज डोकरी। राखी घर री लाज डोकरी।। वडकां बांधी, भुजबल पोखी। काण कायदै पाज डोकरी।। डॉ गजादान चारण “शक्तिसुत” हाथां पकड़्यो भाल डोकरी मोडा खाग्या माल डोकरी हेत जताकर जमीं हड़प ली, फंसी कुजरबी चाल डोकरी।

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पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – द्वादश मयूख

।।द्वादश मयूख।। द्रोणपर्व (उत्तरार्द्ध) युधिष्ठिर उवाच कवित्त तेरे काज बन ही मैं कहतो किरीटी मोसों, सात्यकि के जो ही तैं शत्रुन कौं मारिहौं। कृष्ण बलदेव जोपै होहिं न सहाय तो हू, एक शयनेय ही तैं सबै काज सारिहौं। सोई काज आज कोस द्वारश लौं द्रौनव्यूह, तो बिन तरैया को है ताहितैं पुकारिहौं। देवदत्त गांजिव को घोष ना सुनौंहौं तेरे, गुरु बिना पृथा कौं मैं का मुख दिखारिहौं।।१।। युद्धभूमि में अर्जुन की शंख ध्वनि नहीं सुनाई देने से, युधिष्ठिर व्याकुल हो कर सात्यकि से कहने लगे कि हे युयुधान (सात्यकि)! हम जब वनवास में थे तब अर्जुन तुम्हारे लिए कहता था […]

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आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

नभ में घिरती मेघ-मालिका,
पनघट-पथ पर विरह गीत जब गाती कोई कृषक बालिका !
तब मैं भी अपने भावों के पिंजर खोल उड़ाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?[…]

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