आउवा सत्याग्रह – वंश भास्कर

उमामूर्ति थप्पी सु पूजि अब, सप्तम दिन बित्तत जिम्मे सब।
अंबा की प्रतिमा के अग्गैं, ज्वलन हविस्य धूप जहं जग्गैं।।
बाद्य पटह दुन्दुभि मुख बग्गैं, लक्खन बिध पद्यन नुति लग्गैं।
भीरु सुनत सिंधुन स्वर भग्गैं, मरुप उदय पीठहु डगमग्गैं।।
अस्त्रन मैं हु उमा आवाहन, करिकरि कढ्ढि जजन लग्गे जन।
बैठैं सबन निसा सु बिहाई, इम इच्छित बेला ढिग आई।।
अर्धउदित रवि जानि तजन असु, सिवगृह सिर थप्प्यो गोविन्द सु।
खिल रहि मैं न लखो इतनों खय, इम गल छेदि गिर्यो सु इनोदय।।
पिक्खि गिरत गोबिंदहि दृढपन, तित तित मरन लगे जाचक जन।
वह खाटिक दुल्लह बिच आयो, बप्प तनय जुग मरन बतायो।।

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इन्द्रवा रा सोरठा – डॉ. शक्तिदान जी कविया कृत

नर नारी मे नेह. घर मे व्हे संपत घणो।
गिणो सुरग ज्यू गेह. अंतस भरियो इन्द्रवा।।१
धौलो दूध न धार, सब पीलो सोनो नही।
सांग घणा संसार, ओलखणा झट इन्द्रवा।।२
घण सुख री घडियोह, सगली दुनिया साथ दे।
पण अबखी पडियोह, आवै विरला इन्द्रवा।।३
माथे रो अभिमान. पगां पडतो पेखियो।
सब दिन व्हे न समान.आ मत भूले इन्द्रवा।।४

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🌹गणितिक प्रहेलिका काव्य🌹

समंदर में २८ नाविक एक जहाज में थे| जहाज जब डूबने लगा तो नाविक कहने लगे की इस जहाज में से अगर चौदह आदमी कम होंगे तभी नाव किनारे तक पहुँचेगी वरना सारे डूब जाएगे| तो जो चौदह हब्शी (अश्वेत) नाविक थे वे श्वेत नाविक लोगों को बलात बाहर फेंकने लगे तो एक चतुर श्वेत अंग्रेज को युक्ति सुझी और उसनें सबको समझाया कि कृपया झगडे नहीं| उसने सबको कहा कि हम सब २८ लोग एक वर्तुल बनाकर बैठते है फिर मैं गिनती करके नौ(९) नंबर तक गिनुंगा| जिसका गिनती में नवां नंबर आएगा उस को समंदर में फैक देंगे| इस तरह एक से लगाकर नौ तक की गिनती हम चौदह बार करेंगै| श्वेत अंग्रेज की इस बात के छलावे में सारे निग्रो(अश्वेत) लोग आ गए, और गिनती में जिसका नंबर ९ आए उसने समंदर में कूदना पडेगा इस बात को कुबूल कर लिया|

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गडरा

बाड़मेर जिले का सीमांत गांव गडरा, जो कि न केवल हमारे देश की सीमा पर स्थित सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं बल्कि इसका इतिहास भी मातृत्व, वीरता युक्त शान्ति और सह-अस्तित्व की भावना के कारण आज भी सुप्रसिद्ध हैं। वर्तमान में गडरा रोड़ भारत में हैं, जबकि गडरा सीटी पाकिस्तान में स्थित हैं जो कि आजादी से पहले एक ही हुआ करता था। इसका उल्लेख कुछ इस तरह मिलता हैं कि किसी समय में यहाँ घना जंगल था जिसमें भयंकर जंगली और विषेले जानवर रहते थे। जंगल के आस पास ढाणियों में रहने वाले लोग भेड़-बकरियाँ रखते थे। बताते हैं […]

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गीत – हंसावळो – इशरदासजी कृत

परथम अजर अमर अपरमरा
जररा जरण भगतरा जोर
नररा नंग नागरा नाथण
नमो निगमरा अणगम नोर

खळरा दळण लंकरा खेधण
कळरा अकळ कंसरा काळ
गिरिरा धरण मोहरा गाळण
प्रमरा अप्रम प्रजारा पाळ […]

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🌹श्री ध्यान चिंतामणि घनश्यामाष्टक🌹

देखत बड भाग लाग, पोत सरस नवल पाग,
अंतर अनुराग जाग, छबि अथाग भारी।
अति विशाल तिलक भाल, निरखत जन हो निहाल,
उन्नत त्रय रेख जाल, काल व्याल हारी।
विलसत भुँह श्याम वंक, चिंतत उर जात शंक,
मृग मद भर बीच पंक, अंक भ्रमर ग्यानी।
जय जय घनश्याम श्याम, अंबुज द्रग क्रत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी॥१

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तत्व ज्ञान – कवि भंवर दान जी झणकली

अवल शब्द ॐ कार सूं रची काया अलख ।
सोहम मन मोह सूं रची स्वासा ।
स्वास् सूं सोहम कर ॐ ओउम् कर सोहँ सो ।
ॐ सूं सब्द ररंकार आसा ।।[…]

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माताजी के कवित्त – अज्ञात कवि

जाके सुर शरन को वंदत चरन मुनी निगम नाहिं गम वाके नर नारी की।
खगपति बैलपति कमलयोनि गजपति गावै पै न पावै गति जग महतारी की।
एरे मन मोरे बोरे काहे को उदास होत धरे क्यों न आश अम्बेदास सुखकारी की।
दोय भुज वारे नर शरन बचाय लेत गही है शरन मैं तो बीसभुज वारी की।। […]

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सूर्यमल्ल जी मीसण रा मरसिया – रामनाथ जी कविया

मिल़तां काशी माँह, कवि पिंडत शोभा करी।
चरचा देवां चाह, सुरग बुलायौ सूजडौ।।१।।

निज छलती गुण नाव, मीसण छौ खेवट मुदै।
अब के हलण उपाव, सुकवी भरतां सूजडौ।।२।।

करता ग्रब कविराज, मीसण नित थारौ मनां।
सुरसत दुचित समाज, सुकवी मरतां सूजडौ।।३।।[…]

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लाख़ा जमर रौ जस – स्व श्री भंवर दान झणकली कृत

किरनाल़ कुल़ रौ कलंक राजा,कंश बनकर कौफीयौ।
निकलंक गढ़ जौधाण़ रौ नव कुंगरौ नीचौ कीयौ।
माॉघण़ा छौड़ौ दैश मुड़धर, हुकम घरघर हाल़ीया ।
धनवाद चारण़ जात उण दिन लाख जीवण जालिय़ा ।[…]

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