जगदंबा स्तवन – कवि वजमालजी मेहडू
।।गीत चितइलोल़।।
पाताळ सातूं परठ पीठे,
कमठ धारण कोल।
इक्कीस व्रहमंड किया उभा,
भ्रगट मांही भूगोल।
तो हिंगोळ जी हिंगोळ, हरणी संकट भव हिंगोळ।।1[…]
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।।गीत चितइलोल़।।
पाताळ सातूं परठ पीठे,
कमठ धारण कोल।
इक्कीस व्रहमंड किया उभा,
भ्रगट मांही भूगोल।
तो हिंगोळ जी हिंगोळ, हरणी संकट भव हिंगोळ।।1[…]
महाराणा प्रताप द्वारा प्रदत्त प्रस्तुत ताम्रपत्र मुंशी देवीप्रसाद हो प्राप्त हुआ था। जिसको उन्होने सरस्वती, भाग १८ पृष्ठ ९५-९८ पर प्रकाशित करवाया। ताम्रपत्र में कुल ७ पंक्तियां हैं। ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि महाराणा प्रताप के आदेश से, भामाशाह द्वारा कान्हा नामक चारण को फाल्गुन शुक्ला ५ संवत् १६३९ को मीरघेसर (मृगेश्वर) नाम ग्राम प्रदान किया गया था।
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असपत नूं लिखै नवाब इनायत, दाव घाव कर थाकौ दौड़।
मारूधरा मांहै मुगलां नूं, ठौड़ ठौड़ मारै राठौड़।।
कारीगरी न लागै कांई, घाव पेच कर दीठा घात।
किलमां नूं मारता न संकै, मरवि सूं न डरै तिलमात।।[…]
…किले की नींव का प्रथम शिलास्थापन भवभय भंजनी भगवती करनल किनियाँणी के कर कमलों द्वारा कराकर आगत अदृष्य अनिष्ट से अपने पीढीयों को आरक्षित करने के उद्देश्य से अमराजी चारण को माता जी को आंमत्रित कर के लाने हेतु भेजा व जब जगदम्बा पधारी तो उनके हाथो से वि. सं. १५१५ जेष्ठ माह की उजऴी ग्यारस को दुर्ग की स्थापना करवायी।
पन्दरा सौ पन्दरोतरै, जेठ मास जोधाण।
सुद ग्यारस वार शनि, मंडियो गढ महराण।।
मारवाड़ के प्रसिन्द इतिहासकार पं. विश्वेश्वरनाथ रेउ ने लिखा है कि ख्यातों मे लिखा है कि करनीजी नाम की चारण जाति की प्रसिध्द महिला द्वारा किले का स्थान बताया जाना व उसीके द्वारा उसका शिलारोपण होना भी लिखा है।…
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…राजस्थानी भाषा के इन युवा कवियों के बीच एक नौजवान और प्रगतिशील कविता की उभरती हुई बुलंद आवाज है-तेजस मुंगेरिया की।
यथा नाम तथा गुण। गिरधर दान जी के शब्दों में कहूं तो ‘बीज की बाजरी ‘ अर्थात बहुत ही अनमोल।
तेजस मुंगेरिया राजस्थानी कविता और खासकर डिंगल की उस प्राचीन विशिष्ट काव्य शैली का भरोसेमंद नाम है।…
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शियाले सोरठ भलो, उनाले गुजरात।
चोमासे वागड भली, कच्छडो बारे मास।।
इसी कच्छ के महाराव लखपति सिंह (सन १७१०-१७६१ ई.) ने गुजरात/राजस्थान की काव्य परंपरा को सुद्रढ़ एवं श्रंखलाबद्ध करने का अभूतपूर्व कार्य किया जिसका साहित्यिक के साथ साथ सांस्कृतिक महत्त्व भी है। उन्होंने भुजनगर में लोकभाषाओँ एवं उनके काव्य-शास्त्र के अध्ययन एवं अध्यापन के लिए सन १७४९ ई. में “रा. ओ. लखपत काव्यशाला, भुजनगर” की स्थापना की जो “डिंगळ-पाठशाला” एवं “भुज नी पोशाळ” अथवा “भुज की पाठशाला” के नाम से लोकप्रिय हुई। यह पाठशाला स्वातंत्र्य-पूर्व काल अर्थात सन १९४७ ई. तक कार्य करती रही।
अपने लगभग २०० वर्षों के अंतराल में भुज की इस अनौखी काव्यशाला ने काव्य जगत को सैंकड़ों विद्वान् कवि दिए जिन्होंने अनेकों ग्रन्थ रचे एवं डिंगल/पिंगल काव्य परंपरा को नयी ऊँचाइयों पर पहुचाया।[…]
आखे ‘मान’ सुणो अधपतियाँ, खत्रियाँ कोइ न कीजे खीज।
बिरदायक मद-बहवा बारण, चारण बड़ी अमोलक चीज।।
जोधपुर महाराजा मानसिंह का ये कथन चारण समाज के बारे में एक प्रमाणिक तथ्य प्रकट करता है कि, चारण शब्द ही सम्मान करने योग्य है। वैसे तो हर जाति का अपना इतिहास है, लगभग सभी जातियों के लोग अपने-अपने इतिहास पर गर्व करते हैं और करना भी चाहिए। चारण जाति का इतिहास बहुत पुराना इतिहास है। चार वर्ण से इतर है ये जाति, जिसे कमोबेस ब्रह्मा की सृष्टि से बाहर भी माना जा सकता है।[…]
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कच्छ के महाराव लखपति सिंह (सन १७१० – १७६१ ई.) ने गुजरात/राजस्थान की काव्य परंपरा को सुद्रढ़ एवं श्रंखलाबद्ध करने का अभूतपूर्व कार्य किया जिसका साहित्यिक के साथ साथ सांकृतिक महत्त्व भी है। उन्होंने भुजनगर में लोकभाषाओँ एवं उनके काव्य-शास्त्र के अध्ययन एवं अध्यापन के लिए सन १७४९ ई. में “रा. ओ. लखपत काव्यशाला, भुजनगर” की स्थापना की जो “डिंगळ-पाठशाला” एवं “भुज नी पोशाळ” अथवा “भुज की पाठशाला” के नाम से लोकप्रिय हुई एवं स्वातंत्र्य-पूर्व काल अर्थात सन १९४७ ई. तक कार्य करती रही।
अपने लगभग २०० वर्षों के अंतराल में भुज की पाठशाला ने काव्य जगत को सैकड़ों विद्वान् कवि दिए जिन्होंने अनेकों ग्रन्थ रचे एवं डिंगल/पिंगल काव्य परंपरा को नयी ऊँचाइयों पर पहुचाया। इस पाठशाला के पाठ्यक्रम में पढाये जाने वाले ग्रंथों की सूची एवं यहाँ से पढ़े विद्वान् कवियों के द्वारा रचित ग्रंथों की सूची नीचे दी गयी है।…