गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-सोळहवौ अध्याय
सोळहवौ अध्याय – दैवासुरसम्पद्विभागयोगः ।।श्लोक।। अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति:। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।१।। ।।चौपाई।। निडर होय अंतस सुध सागै थित हुय ग्यान ध्यान में लागै। सत्व दान, मन वश, यज सै’वै तन मन वयण शुद्ध हुय बै’वै। १।। ।।भावार्थ।। भगवान् कह्यौ-निडर होय’र अंतस सूं शुद्ध व्हैय, तत्व ग्यान खातर ध्यान योग में लगोलग दृढ़ स्थिति होय अर सात्त्विक दान, इन्द्रियाँ रौ दमन, भगवान्, देवतावां रौ हवन कर ‘ र उत्तम कर्मों रौ आचरण, वेदां रौ पढणौ भगवान् रा नाम अर गुरुवां रौ भजन करणौ कर्त्तव्य पालण खातर कष्ट सहन करणौ सागै इन्द्रियाँ अर अंतस री सरलता।। ।।श्लोक।। अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम्। दया […]
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