माँ गंगा की स्तुति – महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण
॥भुजङ्गप्रयातम् गीर्वाणभाषा॥
नमस्ते नमस्ते नमो देवि गङ्गे,
नमो जह्नुजे पूतपाथस्तरङ्गे।
नमस्ते कपर्दासने भर्गजाये,
नमस्ते ज्वलत्सम्बरे मूलमाये॥१॥
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॥भुजङ्गप्रयातम् गीर्वाणभाषा॥
नमस्ते नमस्ते नमो देवि गङ्गे,
नमो जह्नुजे पूतपाथस्तरङ्गे।
नमस्ते कपर्दासने भर्गजाये,
नमस्ते ज्वलत्सम्बरे मूलमाये॥१॥
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चारण महात्मा ईसरदास रोहड़िया (वि. सं. 1515 से वि. सं. 1622) को राजस्थान और गुजरात में भक्त कवि के रूप में आदरणीय स्थान प्राप्त है। उनकी साहित्यिक संपदा गुजरात और राजस्थान की संयुक्त धरोहर है। आचार्य बदरीप्रसाद साकरिया यथार्थ रूप में कहते हैं कि-‘हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में जो स्थान गोस्वामी तुलसीदास और कृष्णभक्त कवि सूरदास का है वही स्थान गुजरात, राजस्थान, सौराष्ट्र, सिन्ध, धाट और थरपारकर में भक्तवर ईसरदास का है।’1 भक्त कवि ईसरदास ने उम्रभर भक्ति के विरल स्वानुभवों और धर्मग्रंथों से प्राप्त ज्ञान का सुंदर समन्वय अपने साहित्य में प्रस्तुत किया है। मगर यहाँ ईसरदास रोहड़िया के जीवन में हुए चमत्कारों, पुरस्कारों और शिलालेखों के संदर्भ में ही बातें करनी अभीष्ट है।[…]
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गुजरात और राजस्थान में आणंद करमाणंद का नाम जन-जन की जिह्वा पर है। राजस्थान के अनेक प्रतिष्ठित कवियों द्वारा रचित भक्तमाल में आणंद करमाणंद का उल्लेख हुआ है:
ईसरदास अलुनाथ कविया, करमाणंद, आनंद मीसण, सूरदास।
मांडण दधवाड़िया, जीवानंद, भादा, केसोदास गाडण,
माधवदास दधवाड़िया, नरहरिदास बारहठ१।।
आणंद करमाणंद मीसण रचित उच्चकोटि की काव्य-रचनाओं के कारण इन्हें चारण कवियों की श्रृंखला में, प्रथम पंक्ति में स्थान दिया जाता है:[…]
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अथ मृगया-मृगेन्द्र लिख्यते
।।आर्य्या।।
गंडत्थल मढ लेखा, रजत रोलंभराजि गुंजारन
शोभित भाल सुधान्सु, नमो मेनकात्मजा वन्दन।।1
पर्वतराज की पुत्री के पुत्र गणेश को नमस्कार है जिनके कपोलों पर बहते मद की सुगंध से आकृष्ट हुए भौरों की गुंजार सदा रहती है और जिनके ललाट पर चन्द्रमा सुशोभित है।
।।दोहा।।
गनपति गवरि गिरीश गुरु, परमा पुरुष पुरान।
श्री सरस्वती करनी सकति, देहु उकति वरदान।।2
गणेश, गौर(पार्वती), महादेव, लक्ष्मी, विष्णु, सरस्वती, करणी माता, शक्ति मुझे उक्ति (काव्य रचना) का वर दान दे।
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॥ ઝુલણાં છંદ ॥
લેખ કાગળ લખ્યાં તાત પ્રહલાદ ને, કાળ ને જીતવા કલમ ટાંકી ;
વર્ષો ના વર્ષ વિચાર કરીને લખ્યું, માંગતા નવ રહ્યું કાંઇ બાકી.
દેવ સૌ પાળતા સહી વિરંચી તણી, દેવ નો દેવ એ જગત થાપે ;
રદ બન્યા કાગળો એક એવી ગતિ, ફેંસલો નાથ નરસિંહ આપે. ૦૧[…]
…इसी भक्ति काव्य की डिंगल़ काव्य परम्परा में ईसरदास भादरेश का नाम अग्रगण्य है। ईसरदास के भक्ति काव्य में समन्वय का महान् सूत्र समाहित है जो तुलसीदास के समन्वय से भी व्यापक व विशाल है। यहाँ इन दो कवियों के काव्य में तुलना करना इसलिए समीचीन है क्योंकि अक्सर तुलसी के संबंध में हजारीप्रसाद द्विवेदी के समन्वय विषयक तथ्य को चटकारे लेकर सुनाया जाता है जबकि ईसरदास के काव्य में शामिल नाथपंथी प्रभाव तथा एक ही ग्रंथ (हरिरस) में निर्गुण तथा सगुण का समान रूप से पोषण तथा सबसे अलहदा बात कि मातृ काव्य (देवियाँण) तथा वीर काव्य (हाला झाला रा कुण्डलिया) का तुलसी के काव्य में सर्वथा अभाव है।…
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बना सा री मदील मिजाज करै छै।
सिया निरखत मोद भरै छै, रघुवर री मदील मिजाज करै छै।।
सबहि सहेल्यां चढत महल में, सबहि झरोकाँ झुकै छै।
या छबि देखी राम बना री, चंदा री ज्योत छिपै छै।।
बना सा री मदील……………
जोधपुर महाराजा श्री मानसिंह जी के कविराजा व भाषागुरू श्री बांकीदास जी आशिया बहुत ही प्रखर चिंतक व राष्ट्रवादी कवि थे। उस समय आज से लगभग दो शताब्दी पूर्व जब संचार के साधनों का अभाव था, उस समय में ही कवि भारतवर्ष मे घटित घटनाओं पर अति सूक्ष्मदृष्टि रखता था, साथ ही अपनी कलम व कविता से राष्ट्र के साथ विश्वासघात करने वाले व्यक्तियों की पूरजोर भर्त्सना भी करता था।
भरतपुर महाराजा व अंग्रेजों के बीच हुये युध्द में जब भरतपुर के साथ रह रहे नागा साधू अंग्रेजों के साथ मिलकर भरतपुर राज्य से दगाबाजी कर धोखे से किले के दरवाजे खुलवा कर भरतपुर की प्रत्यक्ष हार के कारक बन गये, तब जोधपुर मे बैठै कवि का ह्रदय अति क्षुब्ध व कुंठित हुआ और कवि ने उनकी काली करतूत का कविता के माध्यम से विसर काव्य लिखा।[…]
(झूलणा छंद)
कुळ रावण तणो नाश किधा पछी
ऐक दी रामने वहेम आव्यो
मुज तणा नामथी पथर तरता थया
आ बधो ढोंग कोणे चलाव्यो ?
ऐ ज विचारमां आप उभा थया
कोईने नव पछी साथ लाव्या
सवॅथी छुपता छुपता रामजी
ऐकला उदधिने तिर आव्या…
।।छंद – भुजंगी।।
नमो ब्रह्मशक्ति महाविश्र्वमाया,
नमो धारनी कोटि ब्रह्मांड काया।
नमो वेद वेदांत मे शेष बरनी,
नमो राज का रंक पे छत्र धरनी।।1
नमो पौनरूपी महा प्राणदाता,
नमो जगतभक्षी प्रले जीव घाता।
नमो दामनी तार तोरा रूपाळा,
नमो गाजती कालिका मेघमाळा।।2[…]