भवानी नमो – हिंगऴाजदानजी कविया सेवापुरा

।।छंद भुजंङ्ग प्रयात।।

भवानी नमो स्वच्छ श्रृंगार अंगा !
भवानी नमो सुन्दरी शिम्भु संगा !
भवानी नमो कासरिद्रारी हन्ता !
भवानी नमो आसि आभा अनंता !!1!!

भवानी नमो ब्रह्मजा बुध्दि धामा !
भवानी नमो शिम्भु संहारि स्यामा !
भवानी नमो भूत कैलास बासी !
भवानी नमो ओज अम्भोज आसी !!2!![…]

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इंद्र बाईसा का शिखरणी छंद – हिंगऴाजदानजी कविया

।।छंद-शिखरणी।।
ओऊँ तत्सत इच्छा बिरचत सुइच्छा जग बिखै।
लखै दृष्टि सृष्टि करम परमेष्टि पुनि लिखै।।
तुहि सर्जे पालै हनि संभाऴै उतपति।
अई इन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवति।।1।।

क्रतध्वंसी विष्णु कमलभव जिष्णु स्तुति करै।
हिमांसू उष्णांसू पदम-पद पांसू सिरधरै।।
हगामां हमेशां बजत त्रिदवेसां नववती।
अई इंन्दू अम्बा जयति जगदम्बा भगवती।।2।।

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कवि का विलक्षण व लाजवाब उत्तर !

एक बार श्रीमान हिंगऴाजदान जी कविया सेवापुरा को एक सजातिय चारण सरदार ने काव्यात्मक रूप से निम्न स्तर की रचना भेज दी जो कि शोभायमान नहीं थी, उसमें भेजने वाले कवि महोदय का दम्भ अभिमान व अनुशासनहीनता परिलक्षित प्रकट हो रही थी। उसे पहली बार देख कर।

क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात

के अपने उच्च सिध्दान्त को निर्वहन करते हुए कविया साहब ने क्षमा कर दिया। भेजने वाले कवि ने अपनी मनोदशा में इसे हिंगऴाजदान को डरा हुआ मान लिया व अपने स्वभावगत दूसरी बार फिर निम्नस्तर कविता महाकवि को इंगित करते हुए भेज दी। हिंगऴाजदान जी ने उत्तर देना आवश्यक मान कर उसे जो उत्तर लिख कर भेजा वह आप को लिखकर मैं प्रैषित कर रहा हूँ।

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महाकवि हिंगलाज दान कविया

हिंगलाज दान कविया सेवापुरा के रामप्रताप जी कविया के दो पुत्रो में ज्येष्ठ थे। उनका जन्म माघ शुक्ला १३ शनिवार सम्वत १९२४ को सेवापुरा में हुआ था। तब उनके दादा नाहर जी कविया विद्यमान थे और उन्ही से इन्होने अपनी आरंभिक शिक्षा पाई। जब वे साढ़े तीन वर्ष के थे तो पिता बारहठ रामप्रताप कविया ने उन्हें बांडी नदी के बहते हुए जल में खड़ा करके जिव्हा पर सरस्वती मन्त्र लिख दिया था। बांडी सेवापुरा के पास हो कर ही बहती है और इस में बरसात में ही पानी आता है। बहता पानी निर्मल गंगा की तरह ही पावन माना जाता है। बांडी नदी के प्रवाह के प्रति भावना व आस्था के साथ पिता ने जो मन्त्र दिया, उसने अपना चमत्कारिक प्रभाव दिखाया। पांच वर्ष की अल्पायु में ही हिंगलाज दान की कवित्व-शक्ति प्रस्फुटित हो गयी और अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति तथा वंशानुगत संस्कारों के फलस्वरूप वे डिंगल के सर्वश्रेष्ठ महाकवि के रूप में प्रतिष्ठित और मान्य हुए।[…]

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