माँ गंगा की स्तुति – महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण
॥भुजङ्गप्रयातम् गीर्वाणभाषा॥
नमस्ते नमस्ते नमो देवि गङ्गे,
नमो जह्नुजे पूतपाथस्तरङ्गे।
नमस्ते कपर्दासने भर्गजाये,
नमस्ते ज्वलत्सम्बरे मूलमाये॥१॥
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॥भुजङ्गप्रयातम् गीर्वाणभाषा॥
नमस्ते नमस्ते नमो देवि गङ्गे,
नमो जह्नुजे पूतपाथस्तरङ्गे।
नमस्ते कपर्दासने भर्गजाये,
नमस्ते ज्वलत्सम्बरे मूलमाये॥१॥
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वंश-भास्कर तो महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण की अक्षय कीर्ति का आधार स्तम्भ है, ग्रन्थ रचना के समय ही कवि की ख्याति यातायात एवं संचार के अभाव में भी दूर दूर तक फैल चुकी थी। सूर्यमल्ल एवं कर्नल टॉड विगत शताब्दी के महान इतिहासकार रहें हैं। कर्नल टॉड के साथ राजकीय प्रतिष्ठा एवं शासन का प्रभाव था, जबकि सूर्यमल्ल के पास थी अपनी असाधारण लोकोसर प्रतिभा जिसने उन्हें प्रतिष्ठित किया था। “वंश-भास्कर” के प्रकाशन के पूर्व ही इसकी ख्याति दूर दूर तक फैल चुकी थी।[…]
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भारतीय डाक विभाग द्वारा महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण के सम्मान में जारी डाक टिकट एवं विवरणिका (Brochure):
भारतीय डाक विभाग की वेबसाइट पर महाकवि के बारे में लिखे विवरण को पढने के लिए यहाँ क्लिक करें।
यह छंद महाकवि सूर्यमल्ल रचित खंडकाव्य राम रंजाट से लिया गया है। उल्लेखनीय है कि महाकवि ने इस ग्रन्थ को मात्र १० वर्ष की आयु में ही लिख डाला था।
।।छंद – त्रिभंगी।।
सौलह सिनगारं, सजि अनुसारं, अधिक अपारं, उद्धारं।
कौरे चख कज्जळ, अति जिहिं लज्जळ, दुति विजज्जळ, सुभकारं।।[…]
विश्वविख्यात ग्रंथ वंशभास्कर के रचयिता महाकवि सूर्यमलजी बहुत ही मनमौजी स्वभाव के कविराजा थे और उन्हे मद्यपान का बहुत ही शौक था, उनके लिऐ तत्कालीन समय के राजन्य वर्ग व कुलीन खानदान के मित्रगण अच्छी किस्म की अति उम्दा आसव कढवा कर भिजवाते ही रहते थे। इसी क्रम मे ऐक बार भिणाय के राजा बलवन्तसिंह जी ने इनकी सेवा में बहुत ही मधुर मद्य भेजा था, जिसकी प्रशंसा में सूर्यमलजी ने उनको ऐक कवित्त लिखकर भेजा था। यथाः…[…]
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मालव मुकुट बलवंत ! रतलाम राज,
तेरो जस जाती फूल खोलैं मौद खासा कों।
करण, दधिचि, बलि केतकी गुलाब दाब,
परिमल पूर रचै तण्डव तमासा कों।
मोसे मधुलोभिन कों अधिक छकाय छाय,
महकि मरन्द मेटै अर्थिन की आसा कों।
चंचरीक सु कवि समीप तैं न सूंघ्यो तो हू,
दूरि ही सों दपटि निवाजें देत नासा कों।।७८।।[…]
१८५७ की आजादी की क्रांति के समय के बूंदी के महाकवि सूर्यमल्ल मीसण के जयन्ती सप्ताह के उपलक्ष्य में दिनांक २३-२४ अक्टूबर को कोटा-राजस्थान में साहित्य अकादमी नई दिल्ली की और से दो दिवसीय संगोष्टी आयोजित की गयी। इसमें कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़, चितौड़गढ़, उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर सहित अन्य जिलों के ५० से अधिक वरिष्ठ साहित्यकार शामिल हुए।
उदघाटन सत्र में मुख्य अतिथि रहे पद्मश्री डा. चन्द्र प्रकाश देवल ने महाकवि के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय में प्रजातंत्र होते हुए भी सत्ता पक्ष के खिलाफ बोलने में कवियों, साहित्यकारों को पांच बार सोचना पड़ता है लेकिन सूर्यमल्ल मिश्रण ने रियासतकाल में भी छत्र राज करने वाले हाडा वंश के राजाओं के विरोध में लिखने में कोई कसर नहीं छोडी। उन्होंने ५३ वर्ष में वंश भास्कर[…]
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उम्मेद भूपति अंग में,
रसबीर संकुलि रंग मैं,
बरबीर बारह सै प्रबीरन चक्क लै चहुवान।
जयनैर सम्मुह जोर सों,
भिलि खग्ग झारीय भोर सों,
बर गुमर असिबर समर,
लगि झर कुनर छरतर हुनर
हत कर जबर खर सर गजर
जय धर अडर भर भिलि कचर-
घन कर अमरपुर मचि दवर
दरबर उदर भर मिलि मुखर
पलचर खचर चय अर खपर
खरभर पहर इक बजि टकर धरपर घोर इम घमसान।।1।।[…]
करकि करकि कोप तरकि तरकि तोप,
लरकि लरकि लोप करन लगी।
करखि करखि कत्ति परखि परखि पत्ति,
हरखि हरखि सत्ति हरन लगी।
समर लखन आय अमर गगन छाय,
भ्रमर सुमन भाय निकर जुरे।
सरजि सरजि सोक लरजि लरजि लोक,
बरजि बरजि ओक दिगन दुरे।।1।। […]
उमामूर्ति थप्पी सु पूजि अब, सप्तम दिन बित्तत जिम्मे सब।
अंबा की प्रतिमा के अग्गैं, ज्वलन हविस्य धूप जहं जग्गैं।।
बाद्य पटह दुन्दुभि मुख बग्गैं, लक्खन बिध पद्यन नुति लग्गैं।
भीरु सुनत सिंधुन स्वर भग्गैं, मरुप उदय पीठहु डगमग्गैं।।
अस्त्रन मैं हु उमा आवाहन, करिकरि कढ्ढि जजन लग्गे जन।
बैठैं सबन निसा सु बिहाई, इम इच्छित बेला ढिग आई।।
अर्धउदित रवि जानि तजन असु, सिवगृह सिर थप्प्यो गोविन्द सु।
खिल रहि मैं न लखो इतनों खय, इम गल छेदि गिर्यो सु इनोदय।।
पिक्खि गिरत गोबिंदहि दृढपन, तित तित मरन लगे जाचक जन।
वह खाटिक दुल्लह बिच आयो, बप्प तनय जुग मरन बतायो।।