हेत बिन होळी अधूरी

मानज्यो आ बात पूरी
हेत बिन होळी अधूरी।
फगत तन रा मेळ फोरा,
मेळ मन रा है जरूरी।।

वासना री बस्तियां में
प्रीत-पोळां नीं मिलै,
रूप रूड़ा लोग कूड़ा,
साफ़ दिलडां बीच दूरी।। हेत बिन होळी अधूरी।।[…]

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वक्त – ग़ज़ल

कौन किसकी बात को किस अर्थ में ले जाएगा
यह समूचा माजरा तो वक्त ही कह पाएगा।

आसमां में भर उड़ानें आज जो इतरा रहे हैं,
वक्त उनको भी धरातल का पता बतलाएगा।

जिंदगी की चाह वाले मौत से डरते नहीं,
कौन कहता है परिंदा आग से डर जाएगा?[…]

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विजयी एवं पराजयी मानसिकता

युवाओं के हृदय सम्राट एवं भारतीय मनीषा के महनीय आचार्य स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन करने पर सार रूप में यह समझ आया कि व्यक्ति की हार एवं जीत में उसकी मानसिकता का अहम योगदान रहता है। कबीर ने भी ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत‘ कह कर इस तथ्य को पूर्व में ही स्वीकृति दी है। स्वामीजी के अनुसार मानव समाज में दो तरह की मानसिकताएं सदैव साथ-साथ काम करती है। एक ही काम, एक ही व्यक्ति एवं एक ही विषय पर हमारी अलग-अलग राय के पीछे ये मानसिकताएं ही काम करती है। ये हैं – 1. विजयी मानसिकता एवं 2. पराजयी मानसिकता। इसे हम सकारात्मक एवं नकारात्मक भी कह सकते हैं तो आशावादी एवं निराशावादी मानसिकता भी कह सकते हैं।[…]

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बन्द करिए बापजी – गजल

हर बात को खुद पे खताना, बन्द करिए बापजी।
बिन बात के बातें बनाना, बन्द करिए बापजी।

बीज में विष जो भरा तो फल विषैले खाइए,
ख़ामख़ा अब खार खाना, बन्द करिए बापजी।

सागरों की साख में ही साख सबकी है सुनो!
गागरों के गीत गाना, बन्द करिए बापजी।

लफ़्ज वो लहज़ा वही, माहौल ओ मक़सद भी वो,
चोंक जाना या चोंकाना, बन्द करिए बापजी।[…]

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प्रशंसा

प्रशंसा बहुत प्यारी है,
सभी की ये दुलारी है,
कि दामन में सदा इसके,
खलकभर की खुमारी है।

फर्श को अर्श देती है,
उमंग उत्कर्ष देती है,
कि देती है ये दातारी,
हृदय को हर्ष देती है।[…]

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उर में मत ना लाय उदासी

इळ पर नहचै वो दिन आसी,
गीत रीत रा सो जग गासी,
राख याद घातां री रातां,
उर में मत ना लाय उदासी।

करमहीण रै संग न कोई,
काबो मिलै न मिलणी कासी।
पुरसारथ रो पलड़ो भारी,
इणमें मीन न मेख जरासी।[…]

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बध-बध मत ना बोल

बध-बध मत ना बोल बेलिया,
बोल्यां साच उघड़ जासी।
मरती करती जकी बणी है,
पाछी बात बिगड़ जासी।।

तू गौरो है इणमें गैला,
नहीं किणी रो कीं नौ’रो।
पण दूजां रै रोग पीळियो,
साबित करणो कद सौ’रो।[…]

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साची बात कहूँ रे दिवला

साची बात कहूँ रे दिवला,
थूं म्हारै मन भावै।
दिपती जोत देख दिल हरखै,
अणहद आणंद आवै।

च्यारुंमेर चड़ूड़ च्यानणो,
तेज तकड़बंद थारो।
जुड़ियाँ नयण पलक नहं झपकै,
आकर्षक उणियारो।[…]

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दिवला! इसड़ो करे उजास

दिवला! इसड़ो करे उजास
जिणमें सकल निरासा जळ कर,
उबरै बधै ऊजळी आस।

मन रो मैल कळुष मिट ज्यावै,
वध-वध दृढै विमळ विश्वास ।
झूठ कपट पाखंड जळै सब,
पाप खोट नहं आवै पास।।[…]

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मांडणा

उर रख कोड अपार, रीझ कर त्यार रँगोली।
प्रिया-विष्णु पधार, बहुरि मनुहार सुबोली।
सिंधुसुता सुखधाम, नाम तव है घणनामी।
तोड़ अभाव तमाम, अन्न-धन देय अमामी।
कवि अमर-सुतन ‘गजराज’ कह, मांडै धीवड़ माँडणा।
बेटियां हूंत घर व्है बडा, ओपै मनहर आँगणा।।[…]

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