दीपमालिका का दीपक

मानव इस सृष्टि मे ईश्वर की सुंदरतम कृति है और वह अपने विवेक के लिए विश्ववरेण्य है। प्राणिजगत में मानव अन्य प्राणियों से अलग है तो वह अपने विवेकसम्मत व्यवहार के कारण है। विवेक मनुष्य को बुद्धिमान, व्यावहारिक एवं श्रेष्ठ बनाता है। यही कारण है कि मानव ने अन्य प्राणियों की बजाय अपने जीवन को अधिक नियोजित किया है। उसने हर कदम पर अपनी खुशियों का इजहार करने तथा आनंद लेने का प्रावधन भी किया है। हमारे यहां प्रचलित सभी त्योंहार तथा पर्व इसी कड़ी की लड़ियां हैं। होली, दीपावली, दशहरा, ईद इत्यादि सब त्योंहार इसी क्रम में उल्लेखनीय है।[…]

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बाती को मत फूंक लगा

दीपों की जगमग ज्योति के माध्यम से संसार को ज्ञान, प्रेम, सौहार्द, समन्वय, त्याग, परोपकार, संघर्ष, कर्तव्यपरायणता, ध्येयनिष्ठा एवं रचनात्मकता का पाठ पढ़ाने वाले विशिष्ट त्योहार दीपोत्सव की हार्दिक बधाई के साथ अनंतकोटि शुभकामनाएं। भारतीय संस्कृति में संतति यानी संतान रूपी दीपक को यश, प्रतिष्ठा एवं कीर्ति दिलाने हेतु माता-पिता बाती के रूप में पारिवारिक कुलदीपक कह कर पुकारा गया है। हमारे सामाजिक ढांचे को ठीक से समझें तो लगता है कि माता-पिता स्नेह-घृत के सहारे अंतिम समय तक रोशन रहते हुए अपने आपको धन्य मानते हैं। जलती तो बाती है लेकिन नाम दीपक का होता है। […]

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आज रो समाज अर सराध रो रिवाज

सराध रो रिवाज आपणै समाज में जूनै टेम सूं चालतो आयो है अर आज ई चालै। जे आज री बात करां तो इयां मानो कै अबार रो जुग तो सराध रो स्वर्णिम जुग है। पैली रै जमानैं में तो मायतां रै देवलोक गमण करण रै बाद में ही सराध घालणा सरू हुया करता पण आज री पीढ़ी तो इतरी एडवांस है कै जींवता मायतां रा ई सराध करणा सरू कर दिया। बातड़ी कीं कम गळै ऊतरी दीखै पण आ बात साच सूं खासा दूर होतां थकां ई साच-बायरी कोनी। इणमें साच रा कीं न कीं कण कुळबुळावै। लारलै दिनां री बात है। अेक नामी-गिरामी अफसर आपरी जोड़ायत सागै मोटी अर मूंघी कार में वृद्धाश्रम आयो। भागां सूं बठै म्हारै जाण-पिछाण वाळी अेक समाजसेवी संस्था रा कई मानीता सदस्य भी वृद्धाश्रम री आर्थिक मदद करण सारू बठै गयोड़ा हा। मैनेजर वां सगळा सदस्यां सूं बात करै हो, इतरै तो वृद्धाश्रम रै दरवाजै कनैं अेक कार रुकी।[…]

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राज बदळियां के होसी

कांई फरक पड़ै कै राज किण रो है ?
राजा कुण है अर ताज किण रो है ?
फरक चाह्वो तो राज नीं काज बदळो !
अर भळै काज रो आगाज नै अंदाज बदळो !
फकत आगाज’र अंदाज ई नीं
उणरो परवाज बदळो !
आप – आप रा साज बदळो
न्यारा – न्यारा नखरा अर नाज बदळो !
इत्तो बदळ्यां पछै चाह्वो
तो राजा बदळो
चाह्वै राज बदळो‘र
चाह्वै समाज बदळो ।[…]

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*समय को पहचानो*

हे मित्र! समय को पहचानो,
बस इतना सा कहना मानो,
आलस से यारी मत करना,
ज्यादा होंशियारी मत करना।

ये क्षण में सबको छलता है,
पल पल में रूप बदलता है।
ये टाले से नहीं टलता है,
अपनी ही गति से चलता है।[…]

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बालक हूं बुद्धू मत मानो

इक दिन उपवन में आयुष जब,
घूम रहा था मस्ती करता,
कलियों-पुष्पों से कर बातें,
कांटों पर गुस्सा सा करता।

तभी अचानक उसके कानों,
इक आवाज पड़ी अनजानी,
बचा-बचाओ मुझे बचाओ,
बोल रही थी कातर बानी।[…]

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जाती रही – गजल

हाथ जब थामा उन्होंने, हड़बड़ी जाती रही।
जिंदगी के जोड़ से फिर, गड़बड़ी जाती रही।

‘देख लूंगा मैं सभी को’ हम भी कहते थे कभी,
आज अनुभव आ गया तो, हेंकड़ी जाती रही।

जो दिलों को जोड़ती थी स्नेह बन्धन से सदा,
घात का आघात खाकर, वो कड़ी जाती रही।[…]

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बुद्धि के दाता:गणपति

हुई जब हौड़ नापे कौन जग दौड़,
सारे काम धाम छोड़ बड़े भ्राता बोले ध्यान दे।
मूषक सवार देख धरा को पसार,
तो से पड़ेगी ना पार क्यों न खड़ी-हार मान ले।
एकदंत एकबार कर ले पुनः विचार,
छोड़ अहंकार याके सार को तु जान ले।
‘शक्तिसुत’ षडानन-गजानन बीच ऐसे,
हुई थी जो हौड़ वाको कहूँ सुनो कान दे।।[…]

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छात्रसंघ-निर्वाचन

नेतृत्व का चयन प्रबंधन,
की प्रामाणिक धूरी है।
कैसे कह दें छात्रसंघ, निर्वाचन गैर जरूरी है।

कोई भी हो तंत्र तंत्र का,
अपना इक अनुशासन है
अनुशासन के लिए तंत्र में
अलग-अलग कुछ आसन है।
आसन पर आसीन कौन हो,
इसकी एक व्यवस्था है।
जहाँ व्यवस्था विकृत-बाधित,
हाल वहीं के खस्ता हैं।
साँप छोड़ बाँबी को पीटे,
समझो अक्ल अधूरी है।
कैसे कह दें छात्रसंघ, निर्वाचन ग़ैर-जरूरी है।[…]

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