दादाजी (बालकाव्य)

दादाजी का कमरा जिसमें बच्चे मौज मनाते हैं।
नित्य नई बातें बच्चों को, दादाजी बतलाते हैं।

इक दिन दादाजी ने बोला, आज पहेली पूछूँगा।
जो भी उत्तर बतलाएगा, उसको मैं टॉफी दूँगा।

गणित विषय का ज्ञाता है वो, झटपट जोड़ बताता है।
घर बैठे हमको दुनियां की, सरपट सैर कराता है।
नाम बताओ उसका है जो, टीचर गाईड ओ ट्यूटर।
सारे बच्चे बोल उठे वो, अपना प्यारा कम्प्यूटर।।
वाह बेटा वाह वाह वाह जी, बोल उठे यूँ दादाजी।
हम बच्चों से बातें करके, होते राजी दादाजी।[…]

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दौरेजहाँ का दर्द

ये षड्यंत्री दौर न जाने,
कितना और गिराएगा।
छद्म हितों के खातिर मानव,
क्या क्या खेल रचाएगा।

ना करुणा ना शर्म हया कुछ,
मर्यादा का मान नहीं।
संवेदन से शून्य दिलों में,
सब कुछ है इंसान नहीं।।[…]

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गुरु अमृत की खान

है वही जो ज्ञान के आलोक को जग में फैलाता।
है वही जो आदमी को आदमी बनना सिखाता।
जो सभी को  प्रेम का संदेश देता है सदा,
उस गुरु के श्रीचरण में लोक अपना सिर झुकाता।। (शक्तिसुत)

‘गुरु’ नाम उस शक्ति का है जो व्यक्ति को सही-गलत, असली-नकली, अच्छे-बुरे, उच्च-निम्न, उत्कृष्ट-निकृष्ट, उचित-अनुचित, प्रासंगिक-अप्रासंगिक, पवित्र-अपवित्र, ग्रहणीय-त्याज्य के बीच फर्क करना ही नहीं सिखाता वरन सत्य के वरण एवं असत्य के क्षरण का विवेक एवं साहस प्रदान करता है। वह ज्ञान रूपी प्रकाश से अज्ञान रूपी तमस को […]

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शिक्षक

सोचो उस दिन देश का, होगा कैसा हाल।
शिक्षक ने गर छोड़ दी, नेकनियति की चाल।।

सतयुग से कलियुग तक देखो, ये इतिहास गवाही देता।
शिक्षक हरदम देता रहता, बदले में कब कुछ भी लेता।।

अपने शिष्यों के अंतस में, जिसकी छवि अभिराम है।
ऐसे शिक्षक के चरणों में, कोटि-कोटि प्रणाम है।।

सच को सच कहने की हिम्मत,जो रखता है वह शिक्षक है।
झूठ-कपट से सच्ची नफरत, जो रखता है वह शिक्षक है।।

संस्कारों की फसल उगाता, यह धरती का लाल अनूठा,
पतझड़ में बासंती फितरत, जो रखता है वह शिक्षक है।।[…]

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अपभ्रंश साहित्य में वीररस रा व्हाला दाखला

आचार्य हेमचंद्र आपरी व्याकरण पोथी में अपभ्रंश रा मोकळा दूहा दाखलै सरूप दिया है। आं दूहाँ में वीर रस रा व्हाला दाखला पाठक नै बरबस बाँधण री खिमता राखै।आँ दूहाँ रो सबसूं उटीपो पख है -पत्नियां रो गरब। आपरै पतियां रै वीरत री कीरत रा कसीदा काढ़ती अै सहज गरबीली वीरबानियां दर्पभरी इसी-इसी उकतियां री जुगत जचावै कै पाठक अेक-अेक उकत पर पोमीजण लागै। ओ इसो निकेवळो काव्य है, जिणमें मुरदां में नया प्राण फूंकण री खिमता है।

आप-आपरै वीर जोधार पतियां री बधतायां गिणावती वीरबानियां में सूं अेक बोलै-“हे सखी! म्हारो सायबो इण भांत रो सूरमो है कै जद बो आपरै दळ नैं टूटतो अर बैरी-दळ नैं आगै बढतो देखै तो चौगणै उछाह रै साथै उणरी तलवार तण उठै अर निरासा रै अंधकार नैं चीरती ससीरेख दाईं पिसणां रा प्राण हर हरख मनावै-
भग्गिउ देक्खिवि निअअ वलु, वलु पसरिअउ परस्सु।
उम्मिल्लइ ससिरेह जिंव, करि करवालु पियस्सु।।[…]

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अपभ्रंश साहित्य रो सिणगार वर्णन

सिणगार तो हर भाषा रै लिखारां रो प्रिय विषै रैयो है। अपभ्रंश साहित्य रा थोड़ाक सिणगार रस प्रधान दूहा आप विद्वानां रै सामी प्रस्तुत है। अपभ्रंश भाषा में मोकळा पण्डित कवि होया है पण जिण दूहां री चरचा आगै होवणी है, वै इण भांत रै पंडितां रा लिखेड़ा नीं लागै। हां हो सकै कै आं दूहां रा लिखारा पारंगत पंडित हा पण दूहां रै सिरजण रै समै वै पंडिताई सूं ब्होत ऊपर उठेड़ा हा। सहज भाव ब्होत कठोर साधना सूं मिलै। कीं दाखलां सूं बात स्पष्ट होवैला।

अेक विरह-व्याकुळ प्रिया कैवै कै “जियां-कियां ई जे मैं म्हारै प्रिय नैं पा लेवती तो अेक इसो खेल रचती, जिसो आज लग नीं रचिजियो। प्राणपीव रै रूं-रूं में इयां रम जावती जियां माटी रै नयै सिकोरै में पाणी पैठ जावै अर उणरै अंग-प्रत्यांग नैं भीनो कर जावै“-
जइ केबइं पावीस पिउ, अकिआ कुड्डु करीसु।
पाणिउ नवइ सरावि जिबं, सब्बंगे पइसीसु।।[…]

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बोधिसत्व री मैत्रीभावना

।।बोधिसत्व री मैत्रीभावना।।

भूखा खाली पेट पकड़ियां,
है सोवण हित मजबूर जका।
तिस मरता पाणी बिन रोवैै,
तड़पैै है बिना कसूर जका।

धीरज छूटण सूं पैली ही,
कछु हाय! इसी जे बण पावै।
प्यासोड़ा ठंडो जळ पीवै,
भूखोड़ा भोजन पा जावै।[…]

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गुण-गर्जन

गरजा बादल गगन में,
घटा बनी घनघोर।
उमड़-घुमड़ कर छा गए,
अम्बुद चारों ओर।

सुन कर गर्जन समुद्र को,
आया क्रोध अपार।
मूढ़ मेघ किस मोद में,
गर्जन करत गंवार।।

मेरे जल से तन बना,
अन्य नहीं गुण एक।
मो ऊपर गर्जन करत,
लाज न आवत नेक।।[…]

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रक्तिम स्याही से लिखने वाले कवि मनुज की क्रांति-चेतना

मेरे हृदय के ये उद्गार उस क्रांतिचेता कवि के लिए है, जिसकी लेखनी ने समय के अन्याय का प्रबल प्रतिकार करते हुए शोषण की दीवारों को समूल नष्ट करने का विकल्प तथा भव के अभिनव निर्माण का संकल्प चुना। अपने अनुभव एवं उम्र से कहीं अधिक गुणा समझ का परिचय देने वाला यह कवि राजस्थान की जनवादी परंपरा का एक ऐसा सशक्त स्तम्भ है, जो अकेले अपने दम पर जनवादी-ज्योति को जलाए रखने में सक्षम है। महलों के मोहक मायाजाल से दृष्टि हटाकर झौंपड़ियों के अंतरतम की पीड़ा को पहचानने वाला कवि मनुज सच्चे अर्थों में जनकवि है। […]

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कवि मनुज देपावत का आह्वान

जिसने जन-जन की पीड़ा को,
निज की पीड़ा कर पहचाना।
सदियों के बहते घावों पर,
मरहम करने का प्रण ठाना।
महलों से बढ़कर झौंपड़ियां,
जिसकी चाहत का हार बनी।
संग्राम किया नित सत्ता से,
वो कलम सदा तलवार बनी।[…]

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