वाहर करणी वीसहथी

।।छंद – त्रिभंगी।।
मरूधरा मँझारम धिन देह धारम, वण कल़ु वारम करतारम।
सगती साधारम सकल़ संसारम, भोम उतारम अघ भारम।
संकट रा कारम तुंह सुधारम, आंण उबारम वेग अती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।१[…]

» Read more

फागुन के सवैया

गल गुंजनमाल, रू नैन विशाल, चलै गजचाल सदा शुभ जो री।
कटि फेंट धरी मुरली, पटपीत, लिये लकुटी कर में लखियो री।
मुकुटं सिर सुंदर मोरपखा मुख मंजुल चोरत है मति मोरी।
रँग डाल गुलाल अबीर उछाल सखी नँदलाल रचावत होरी।।१।।

बरसे रंग आज सखी ब्रजमें, उर आनंद की सरिता सरसे।
सरसे सब गोपिन के तन के तरू, पल्लव पात नये दरसे।
दरसे दसहू दिस लाल गुलालअबीरन गाल पिया परसे।
परसे हुई आज निहाल अली! ब्रजबाल पे लाल कृपा बरसे।।२।।[…]

» Read more

फागुन छाया है सखी

आज बिरज में धूम है, जन जन करे धमाल।
फागुन छाया है सखी!, बरसे लाल गुलाल।।१

गोरी गोरे गाल की, जिसके नैन विशाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नंद लाल।।२

सिर पर छोटी बेंदुली, चमके जिसका भाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नँदलाल।।३

बातें मिसरी की डली, लगती मोहनथाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नंद लाल।।४

आँखें है जादूगरी, नेह नीर के ताल।
उससे होरी खेलता, नागरिया नंद लाल।।५[…]

» Read more

केसर भवानी वंदना

।।छंद त्रिभंगी।।
नाकां नथवाळी, कानां बाळी, मां मुकुटाळी कनकाळी।
सिंदूर कपाळी, कंकण वाळी, नेह निहाळी, नयणांळी।
कुम कुम सिर वाळी, लोवडियाळी, ललित लटाळी, रूप उमा।
मरतोली वाळी, लाल धजाळी, तूं ममताळी, चेहर मां।१

माता मतवाली, पीवै प्याली, बासण वाळी बिरदाळी।
डोकर डाढाळी, छिण वपु बाळी, जोबनवाळी, जोराळी।
पातक परजाल़ी, वदी वडाल़ी, नमो निराल़ी, निरमल मां।
मरतोली वाल़ी, लाल धजाल़ी, तूं ममताल़ी, चेहर मां।।२[…]

» Read more

खातो महाराज पदमसिंह रो साख सूरज री

सेल त्रिभागो झालियां मूंछां वांकड़ियांह। आंखड़ियां देखां पदम सुख्यारथ घड़ियांह।। इण दूहै रै रचणहार कवि एकदम सही कही है कै जिण बगत पदमसिंह नैं देखूं बा घड़ी सुख री होवै। बीकानेर महाराजा कर्णसिंह रा सपूत पदमसिंह महान वीर, उदार पुरुष अर क्षत्रिय गुणां सूं मंडित राजपूत हा। उदारता अर वीरता इणां नैं वंश परंपरा में मिली – दादो रायांसिंघ है नांनो राव रतन्न। प्रिथी वडाल़ा पदमसी दियण वडाल़ा दन्न। उणां री वीरता विषयक घणी ई बातां इतिहास में संकलित है पण म्है उणां री अदभुत उदारता री बात बताय रैयो हूं। मगरै रै गांव मोखां रा बीठू गोगदान रै घरै नादारगी […]

» Read more

म्है भाई नीं, बड जानी हूं

किणी कवि सही कैयो है कै देणो मरणै सूं ई दोरो। इणी कारण ओ दूहो चावो है कै जिकै समझदार होवे उणां सूं तीन काम संज नीं आवै दैणो, मरणो अर मारणो। ऐ काम तो काला होवै बै ई कर सकै –

नर सैणां सूं व्है नहीं, निपट अनैखा नाम।
दैणा मरणा मारणा, कालां हंदा काम।।

ऐड़ो ई एक प्रसंग है बीकानेर महाराजा गजसिंहजी रै खास मर्जीदान कवि गोपीनाथजी गाडण रो। गोपीनाथजी गाडण आपरी बगत रा मोटा कवि जिणां महाराजा गजसिंहजी री वीरता अर उदारता नै वर्णनीय विषय बणाय “ग्रंथराज ” नामक ग्रंथ बणायो। […]

» Read more

कवि री बात राखण नै, कियो जैसलमेर माथै हमलो

 बीकानेर रा राव लूणकरणजी वीर, स्वाभिमानी अर उदार नरेश हा। केई जंगां में आपरी तरवार रो तेज अरियां नैं बतायो तो दातारगी री छौल़ा ई करी। राव लूणकरणजी रै ई समकालीन कवि हा लालोजी मेहडू। बीकानेर रा संस्थापक राव बीकैजी रै साथै आवणियां में एक मेहडू सतोजी ई हा। इणी सतोजी रा बेटा हा लालोजी मेहडू। सतोजी नै राव बीकाजी खारी गांव दियो। लालोजी मेहडू आपरी बगत रो मोटा कवि अर बलाय रो बटको हा। एकर लालोजी जैसलमेर गया। जैसलमेर रावल देवीदासजी, बीकानेर राव लूणकरणजी रा हंसा उडाया अर आवल़िया बकिया। लूणकरणजी रा हंसा सुण र लालैजी नैं रीस आयगी बां […]

» Read more

ऐड़ो ई करड़ा हो तो भेल़ू जावो नीं

जूनी बगत री जूनी रीतां। कवियां री आपरी ठसक अर मठोठ क्यूंकै उण बगत री सत्ता अर सत्ता रै कर्णधारां रै अतंस में कवियां रै प्रति घणो सम्मान। कवियां रो सम्मान करणियो ऐड़ो ई एक ठिकाणो खिंदासर। बीकानेर महाराजा सुजाणसिंह रा समकालीन खिंदासर ठाकुर इंद्रसिंह। खाग अर त्याग सूं अनुराग। कवि रुघजी रतनू रै आखरां में – खींदासर खिंया दीपे रावां देवण रेस। अमलां वेल़ा आपनैं रँग भाटी इँदरेस।। इणां रा ई समकालीन कवि शंभुदान रतनू दासोड़ी। जिणां रो बीकानेर दरबार सुजाणसिंह ई घणो सम्मान करता। जिणां रो राजा सम्मान करै वांरो ठाकुर तो सम्मान करणो ई हा। शंभुदान रतनू […]

» Read more

जिण नैं मिलियो जय जंगल़धर पातसाह रो विरद

बीकानेर रो जूनो नाम जांगल अथवा जंगल। जद १५४५ में महावीर वीकै आपरै नाम सूं नगर थापियो तद सूं इण रो नाम बीकानेर।इण धरा रै सपूत राव जैतसी कामरान रा कांधा भांग कीरत लीनी। इणी जैतसी रै पोतै महाराजा रायसिंह आपरी उदारता रै पाण उण कवेसरां रै घरै हाथी बंधा दिया जिणां रै घरै बकरी बंधण रा सराजाम नीं हा। कवि रंगरेला वीठू रै सबदां में- रायसिंघ नां जच्चियो पाधर रो पतसाह। जिण घर अजा न बंधती सो गजबंध कियाह।। इणी रायसिंह रै सूरसिंह अर सूरसिंह रा बेटा हा कर्णसिंह। वि.सं.१६८८ सूं १७२६ तक राज कियो। महान वीर, स्वाभिमानी, साहसी, […]

» Read more

भभूता सिद्ध रा छंद

राजस्थान रै लोक देवतावां में एक नाम भभूता सिद्ध रो ई है। उन्नीसवें शताब्दी रै पूर्वार्द्ध में भभूता सिद्ध रो जनम चारणवाल़ा रा सोलंकी गोमसिंह रै घरै होयो। कविवर शंकर रै आखरां में – गोमा सुतन प्रगट गढ कोटां मोटा भूपत मानै। मेवा मिसठान पतासा मिसरी थिरू चढावै थानै।। कवि रुघजी रतनू आपरै रंग रै दूहां में इण भांत लिखै – सातम है सिद्धराज री, चहुंकूंटां व्है चाव। अमलां वेल़ा आपनै, रंग सोलंकी राव।। सर्पदंश सूं भभूता सिद्ध देवलोक होया। काल़ीनाडी मुख्य स्थान है। आथूणै समूल़ै राजस्थान में घणी मानता। गांव गांव थान। म्हारै दादोसा (गुणजी हरदानजी रा) रा दादोसा […]

» Read more
1 70 71 72 73 74 91