नर्मदा स्तुति / रेवा गीतम – वसंततिलका
विन्ध्याचले अमरकंटक रुप बाला!
पहेरी वहे तरु-लता-द्रुम नो दुशाला!
प्रादुर्भवी जगतने सुख मोक्ष देवा!
नौमि! त्वदीय पद पंकज मात रेवा!!१
[…]
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विन्ध्याचले अमरकंटक रुप बाला!
पहेरी वहे तरु-लता-द्रुम नो दुशाला!
प्रादुर्भवी जगतने सुख मोक्ष देवा!
नौमि! त्वदीय पद पंकज मात रेवा!!१
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!!छंद नाराच!!
गळे विशाळ मुक्त माळ शीश पाघ सोहती!
मुखाकृति मनोहरं वळी रहै विमोहती!
सवार लीले घोड़लै धजा सुश्वेत ना धणी!
घणी खमा श्री रामदेव बार बीज ना धणी!!१
खमा घणी! खमा घणी! खमा घणी! खमा घणी!
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राजस्थानी भाषा की विशालता व समृद्धि की जब बात करें तो स्वामी स्वरूपदास चारण (बड़ली अजमेर, १८०१) का स्मरण प्रथमत: करना ज़रूरी हो जाता है। स्वरूपदास ऐसे चरित्र थे जिन्होंने भारतीय मनीषा के ऋषि शब्द को पूर्ण चरितार्थ किया है। अन्य कई कवियों की भांत वे केवल काव्य में ही ईश-उपासना नहीं करते रहे बल्कि आजीवन साधुता धारण की तथा ईश्वरोपासना में लीन रहे।[…]
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धर्म पूछ कर गोली मारी, इससे ज्यादा क्या होगा? थर्राई मानवता सारी, इससे ज्यादा क्या होगा? चार दिनों का मौन प्रदर्शन नारे और जुलूस यही, जान चुका है अत्याचारी, इससे ज्यादा क्या होगा? कैसे कोई करे भरोसा, इन ऐसे हालातों में, है मजहब के हाथ कटारी, इससे ज्यादा क्या होगा? अच्छा हो आतंकी सारे, पाकिस्तानी ही निकलें, गर निकले घर में गद्दारी, इससे ज्यादा क्या होगा? हिन्दुस्तां की रीत यही है, हाथोंहाथ हिसाब करे, हो जाने दो आरी-पारी, इससे ज्यादा क्या होगा? आठ दशक से झेल रहे हैं, पाक परस्ती की पीड़ा मिल चुकी बेअंत बीमारी, इससे ज्यादा क्या होगा? […]
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सूरां मरण तणो की सोच?
वीर को मृत्यु की क्या चिंता?
संदर्भ–पहलगाम में गोली के भय से कलमा पढ़कर प्राण बचाने के संदर्भ में
मैं आथूणै राजस्थान का निवासी हूं। जहां पग-पग पर ऐसे नर-नाहरों की पाषाण पूतलियां स्वाभिमान से सिर ताने खड़ी है, जिन्होंने धर्म, धरती, गौरक्षा और स्त्री सम्मान की रक्षार्थ सिर कट जाने पर भी रणांगण में शत्रुओं का संहार करते रहे। उन्होंने मृत्यु के आगत भय से धर्म की ध्वजा को नहीं छोड़ा। उन्होंने मरणा श्रेयष्कर समझा पर दूसरे धर्म का कलमा पढ़ना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट उद्घोषणा की कि-[…]
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आजका संदर्भ-जाओ मोदी को बता देना।
हम पढ़ते, कहते और सुनते भी है कि काश्मीर हमारा भारत का मुकुट मणि है। लेकिन हर दूसरे दिन ऐसी दिल दहलाने वाली घटनाओं के विषय में सुनते और पढ़ते हैं तो लगता नहीं कि कश्मीर हमारा है।
कविराज बद्रीदानजी कविया ने कश्मीर पर कुछ दोहे लिखे तो उनमें से एक यह था कि-
लड़ पंजाबी बंगाल ली, सातूं लीनी सिंध।
काश्मीर लेवण कसै, हार हुई कै जयहिंद।।
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।।मत्तगयंद छंद।।
हे इकदंत! सुसेवित संत! अनादि! अनंत! गणाधिप! प्यारै।
सिंधुर आनन! नाथ गजानन! श्रीगिरजा शिव राजदुलारै!
गान प्रबीन! पखावज बीन, लिए मुझ दीन के गेह पधारे!!
श्रीगणनायक! सिद्धि विनायक! देव! हरो दु:ख द्वंद हमारे!!१!!…
गीत – बडो साणोर
अजब फेसबुक वाटसफ टवीटर ओपिया,
ग्राम इंस्टा गजब रचे गोटा।
सोसयल मीडिया तणा रांगड़ सजे,
मचाया मुलक में ख्याल म्होटा।।१[..]
।।गीत – प्रहास साणोर।।
विगत रयो रूढीपणा तणे वड ग्रासगत,
मिळी हिंदवांण नै आज मुगती।
वरण विग्यान रौ चहुंदिश वापर्यौ,
संचरी रिवगरण रूप सगती।।1[…]
एक गाँव, गाँव में दसवीं तक रो इसकूल, इसकूल में तीन सौ टाबर पढणने आवै। हेडमास्टर समेत इग्यारे मास्टर जका टाबरां ने हेत अर लगन साथे पढाई करावे।
इसकूल रे साथेई गांव में पटवार-घर अर पंचायत-भवन भी हुया करै है। पटवारी अर गाँव सचिव आपूआप रा काम करै अर इसकूल रा मासटर आपरो।
गाँव रा लोग पटवारी अर गाँव सचिव रो तो आदर माण करे क्यां के आ हूं हरेक रो काम पड़े, काम भलाईं पईसा देर कराओ।
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